Gulshan Bawra: अतरंगी शर्ट, बिखरे बाल देख डिस्ट्रीब्यूटर ने कहा- बावरा, ऐसे बने हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार

Last Updated:August 07, 2026, 04:11 IST
Gulshan Bawra Death Anniversary: आज दिग्गज गीतकार गुलशन बावरा की पुण्यतिथि है. विभाजन का दर्द सहने और मुंबई में रेलवे क्लर्क की नौकरी करने से लेकर ‘मेरे देश की धरती’ जैसे कालजयी नगमे लिखने तक, जानिए कैसे अपने अतरंगी लुक से उन्हें ‘बावरा’ नाम मिला और उन्होंने हिंदी सिनेमा में इतिहास रचा.
नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा में कालजयी गीतों की सौगात देने वाले महान गीतकार गुलशन बावरा की आज यानी 7 अगस्त को डेथ एनिवर्सरी है. आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे नगमों की मिठास और दार्शनिकता आज भी हर संगीत प्रेमी के दिल में जिंदा है. विभाजन की विभीषिका से निकलकर मुंबई के संघर्षों को पार करते हुए भारतीय सिनेमा में अपने गीतों की अमिट छाप छोड़ने वाले गुलशन बावरा की कहानी किसी इंस्पिरेशन फिल्म से कम नहीं है.
12 अप्रैल 1937 को लाहौर के पास शेखूपुरा में जन्मे गुलशन कुमार मेहता ने बहुत कम उम्र में अपनों को खोने का दर्द झेला. दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर का कवि जग चुका था, लेकिन आंखों में सपने मुंबई नगरी के थे. कोटा में रेलवे नौकरी का मौका हाथ से निकलने के बाद किस्मत उन्हें 1955 में मुंबई ले आई, जहां रेलवे में क्लर्क की नौकरी करते हुए उन्होंने अपने सपनों की नई उड़ान भरी.
अतरंगी लुक ने दे दिया बावरा नाम
मुंबई के संघर्ष के शुरुआती दिनों में गुलशन अपना कमरा एक और उभरते हुए नौजवान के साथ शेयर करते थे, जो आगे चलकर हिंदी सिनेमा के महान गीतकार गुलजार बने. नौकरी के बाद स्टूडियो के चक्कर काटते-काटते उनकी मुलाकात संगीतकार कल्याणजी से हुई, जिन्होंने 1959 में फिल्म चंद्रसेना में उन्हें पहला मौका दिया. इसी साल फिल्म सट्टा बाजार के दौरान एक मजेदार वाकया हुआ. गुलशन अक्सर बेहद चटक, रंग-बिरंगी शर्ट्स पहनते थे और उनके बाल बिखरे रहते थे. उनकी इस अतरंगी वेशभूषा को देखकर डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह लड़का तो बिल्कुल बावरा दिखता है. गुलशन को यह नाम इतना भाया कि उन्होंने गुलशन कुमार मेहता छोड़कर हमेशा के लिए गुलशन बावरा नाम अपना लिया.
तीर्थयात्रा की धुन से जब रचा गया मेरे देश की धरती
गुलशन बावरा की लेखनी में आम बोलचाल का सीधापन भी था और जीवन की गहरी सोच भी. मनोज कुमार की ऐतिहासिक फिल्म उपकार के मशहूर गीत मेरे देश की धरती बनने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है. एक बार तीर्थयात्रा से लौटते वक्त मनोज कुमार ने गुलशन को कुछ पंक्तियां गुनगुनाते सुना था. जब उपकार फिल्म बनने लगी, तो मनोज कुमार की जिद पर उसी भाव से एक गीत तैयार हुआ, जिसने कालजयी राष्ट्रगीत का रूप ले लिया. इसके लिए उन्हें 1968 में फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया. बाद में 1974 में जंजीर फिल्म के सुपरहिट गाने यारी है ईमान मेरा के लिए भी उन्हें दूसरा फिल्मफेयर मिला.
पर्दे पर हारमोनियम का जादू
अपने 42 साल लंबे करियर में उन्होंने सिर्फ 240 के करीब गीत लिखे, क्योंकि वह गिनती से ज्यादा गानों की क्वालिटी पर भरोसा रखते थे. कसमे वादे निभाएंगे हम, प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया और चांदी की दीवार न तोड़ी जैसे गानों ने उन्हें हर पीढ़ी का पसंदीदा गीतकार बना दिया. 1975 के बाद संगीतकार पंचम दा यानी आरडी बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत जगत में तहलका मचा दिया. गीत लिखने के साथ-साथ गुलशन बावरा एक बेहतरीन अभिनेता भी थे. उन्होंने जंजीर और उपकार समेत 21 फिल्मों में काम किया. फिल्म जंजीर के मशहूर गाने दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए में वह खुद पर्दे पर हारमोनियम बजाते हुए नजर आए थे. 7 अगस्त 2009 को 72 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से इस महान फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया.
About the Authorगार्गी द्विवेदीSub Editor
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August 07, 2026, 04:11 IST



