Rajasthan

Sikar News: 250 साल पहले पेड़ के नीचे बसा अरनियां, आज दूध, फर्नीचर और आधुनिक खेती से बनाई खास पहचान

Last Updated:August 09, 2026, 16:30 IST

सीकर जिले का अरनियां गांव करीब 250 साल पहले एक पेड़ की छांव में बसा था, लेकिन आज यह पशुपालन, दूध उत्पादन, फर्नीचर कारोबार और आधुनिक खेती के दम पर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुका है. गांव के करीब 60 प्रतिशत परिवार पशुपालन से जुड़े हैं, जबकि 15 प्रतिशत परिवार फर्नीचर उद्योग से अपनी आजीविका चला रहे हैं.

Amazon Prime DayTop Deals Inside

गांव के सीताराम बाड़ीगर के अनुसार करीब 250 साल पहले हरियाणा से हेमाराम महर यहां आए थे. उन्होंने अरण्या यानी औषधीय पेड़ के नीचे अपना बसेरा बनाया और धीरे-धीरे आसपास लोगों की बसावट शुरू हुई. इसी अरण्या के पेड़ के नाम पर गांव का नाम अरनियां पड़ा. समय के साथ छोटी सी बसावट एक गांव में बदल गई. 1958 में ग्राम पंचायत का गठन हुआ. गांव में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मंशा माता मंदिर है.

अरनियां की कहानी सिर्फ खेती और कारोबार तक सीमित नहीं है. गांव की पुरानी चौपाल भी अपनी अलग पहचान रखती थी. ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1984 से पहले गांव की चौपाल को यादवों की हाईकोर्ट कहा जाता था. उस दौर में ग्रामीणों के आपसी विवाद पुलिस या अदालत तक पहुंचने के बजाय पंच-पटेलों की मौजूदगी में चौपाल पर ही सुलझा दिए जाते थे. बुजुर्गों के फैसलों को गांव में काफी सम्मान मिलता था.

अरनियां में खेती के साथ पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है. गांव के बड़ी संख्या में परिवार गाय-भैंस पालन से जुड़े हैं. पशुओं की देखभाल, चारा व्यवस्था और दूध निकालने से लेकर दूध उत्पादन तक के काम में महिलाओं की अहम भूमिका रहती है. घर के कामकाज के साथ महिलाएं पशुपालन को भी जिम्मेदारी से संभालती हैं. गांव में बड़े स्तर पर दूध का संकलन होता है, जिससे परिवारों को नियमित आमदनी मिलती है. इसके अलावा कई किसान सब्जियों की खेती करके अपनी आय के अतिरिक्त साधन भी विकसित कर रहे हैं.

Add as Preferred Source on Google

अरनियां की दूसरी बड़ी पहचान फर्नीचर कारोबार है. करीब 15 प्रतिशत परिवार सीधे तौर पर फर्नीचर उद्योग से जुड़े बताए जाते हैं. स्थानीय कारीगर लकड़ी से अलग-अलग तरह के फर्नीचर तैयार कर अपनी आजीविका चला रहे हैं. पारंपरिक कारीगरी और बदलती बाजार जरूरतों के बीच गांव के कारीगरों ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया है. अनुमान के मुताबिक गांव से सालाना करीब 1 करोड़ रुपए का फर्नीचर कारोबार होता है.

अरनियां में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से कृषि विज्ञान केंद्र भी संचालित है. केंद्र के माध्यम से किसानों को खेती के साथ बागवानी, पशुपालन और प्राकृतिक खेती की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जा रही है. प्रशिक्षण के बाद ग्रामीण पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर बकरी पालन, मशरूम उत्पादन और प्राकृतिक खेती जैसे नए विकल्पों को भी अपना रहे हैं. इससे किसानों को कम लागत में आय के नए तरीके तलाशने में मदद मिल रही है.

अरनियां ने सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है. गांव के स्वर्गीय घीसाराम बाड़ीगर कई बार सरपंच रहे और वर्ष 1989 से 1992 तक श्रीमाधोपुर पंचायत समिति के प्रधान भी रहे. आज अरनियां परंपरा और आधुनिकता के बीच आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है. एक तरफ घर-घर पशुपालन और दूध उत्पादन की पुरानी परंपरा कायम है, तो दूसरी ओर फर्नीचर कारोबार, सब्जी उत्पादन, प्राकृतिक खेती, मशरूम और बकरी पालन जैसे नए रोजगार विकल्प गांव की तस्वीर बदल रहे हैं. करीब 250 साल पहले एक पेड़ के नीचे शुरू हुई बसावट आज आत्मनिर्भर है.

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। राजस्थान की ताजा खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें|First Published :

August 09, 2026, 16:30 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj