Sikar News: डीजे के शोर में गुम होती बीन की धुन, घसीपुरा में चार-पांच कलाकारों तक सिमटी कालबेलिया लोक विरासत

सीकर. सावन का महीना आते ही शिवालयों में घंटियों की गूंज सुनाई देने लगती है. कहीं भोलेनाथ के जयकारे लगते हैं तो कहीं नाग देवता की पूजा के बीच लोकगीतों की स्वर लहरियां माहौल को भक्तिमय बना देती हैं. लेकिन इन्हीं धार्मिक धुनों के बीच राजस्थान की एक पुरानी लोक विरासत का सुर अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है. यह सुर है कालबेलिया समाज की पारंपरिक बीन यानी पुंगी का, जिसकी धुन कभी गांवों की पहचान हुआ करती थी. आज वही बीन घसीपुरा गांव की एक छोटी सी बस्ती में गिने-चुने कलाकारों के हाथों में सिमटकर रह गई है.
सीकर जिले के कांवट क्षेत्र के घसीपुरा गांव की कालबेलिया बस्ती के बुजुर्गों के पास बीन से जुड़ी यादों का पूरा संसार है. वे बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक बस्ती में शायद ही कोई ऐसा परिवार होता था, जहां बीन बजाने वाला कलाकार न हो. मेले हों, धार्मिक आयोजन हों, तीज-त्योहार हों या गांव में कोई विशेष कार्यक्रम, बीन की आवाज सुनते ही लोगों के कदम उस ओर बढ़ जाते थे. सपेरे बीन बजाते और आसपास के लोग उनकी कला देखने के लिए जमा हो जाते थे. उस समय बीन सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं थी. यह कालबेलिया समाज की पहचान और रोजी-रोटी से जुड़ा वाद्य यंत्र थी. पीढ़ी दर पीढ़ी पिता अपने बेटे को बीन बनाना और बजाना सिखाते थे. यही हुनर परिवारों की जिंदगी का आधार बनता था.
मोबाइल और आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने ली लोक वाद्यों की जगह
सावन और नागपंचमी का कालबेलिया समाज से खास सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है. भगवान शिव के गले में नाग विराजमान होने और नाग देवता की पूजा की परंपरा के कारण इस महीने बीन की धुन का महत्व और बढ़ जाता है. गांवों में होने वाले धार्मिक आयोजनों और मेलों में बीन की आवाज वातावरण को अलग ही रंग देती थी. लोक कलाकार राकेश नाथ बताते हैं कि उनके लिए बीन महज एक वाद्य यंत्र नहीं है. यह उनके पूर्वजों की छोड़ी हुई विरासत है. उनके अनुसार, पहले लोग बीन की आवाज सुनने के लिए दूर-दूर से आते थे, लेकिन अब मोबाइल, डीजे और आधुनिक मनोरंजन के साधनों ने लोक वाद्यों की जगह ले ली है.
बीन से जुड़ी थी सांपों को संभालने की पुरानी परंपरा
कालबेलिया समाज की पहचान लंबे समय तक सांपों और बीन से जोड़कर देखी जाती रही है. समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले गांवों में जहरीले सांप निकलने पर कालबेलिया परिवारों को बुलाया जाता था. वे सांपों को पकड़कर आबादी से दूर सुरक्षित स्थानों पर छोड़ने का काम करते थे, हालांकि वन्यजीव संरक्षण कानूनों के बाद सांप पकड़ने की यह पुरानी परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है. इसके साथ ही बीन बजाने और उससे जुड़े पारंपरिक प्रदर्शन का अवसर भी कम होता गया. आज बीन बची है, लेकिन उससे जुड़ी पूरी जीवनशैली धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है.
डीजे के शोर में दब गई बीन की आवाज
बुजुर्ग कलाकारों का कहना है कि पहले किसी भी बड़े आयोजन की कल्पना बीन और लोक संगीत के बिना नहीं होती थी. अब वही जगह डीजे और आधुनिक संगीत ने ले ली है. आयोजनों में तेज आवाज वाला संगीत आसानी से उपलब्ध हो जाता है, जबकि पारंपरिक कलाकारों को बुलाने की जरूरत लोग कम महसूस करते हैं. इसका सीधा असर अगली पीढ़ी पर पड़ा है. जब बीन से आमदनी नहीं होती तो युवा इसे सीखने के बजाय दूसरे रोजगार तलाशने लगते हैं. यही वजह है कि कभी पूरी बस्ती में सुनाई देने वाली बीन अब कुछ ही घरों तक सीमित रह गई है.
घसीपुरा में अब सिर्फ चार-पांच कलाकार
घसीपुरा की कालबेलिया बस्ती इस बदलते दौर की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करती है. बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां कई परिवार बीन बजाने की कला में माहिर थे. बच्चे छोटी उम्र से ही अपने बड़ों के साथ बैठकर बीन की धुन सीखते थे. लेकिन अब पूरी बस्ती में मुश्किल से चार-पांच कलाकार ही ऐसे बचे हैं, जो पारंपरिक तरीके से बीन बजा सकते हैं. यानी यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र के कम होने की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसी लोक परंपरा के सिमटने की कहानी है. लोक कलाकारों का कहना है कि बीन को बचाने के लिए केवल इसे पुरानी कला कह देना पर्याप्त नहीं है. कलाकारों को नियमित मंच, प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अवसर देना होगा. स्कूलों और लोक कला संस्थानों के माध्यम से नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ना भी जरूरी है.



