Independence Day | केसरी सिंह बारहठ: परिवार सहित आजादी को समर्पित महानायक

कोटा. पत्रकार, साहित्यकार और ऊंचे आदर्शों वाले क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महानायक थे, जिन्होंने केवल खुद ही नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार को भी देश की आजादी के यज्ञ में समर्पित कर दिया. वे उन विरले क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने कभी समझौता नहीं किया. आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन, क्रांतिकारी संघर्ष, साहित्यिक योगदान और परिवार के बलिदान को याद किया जा रहा है.
केसरी सिंह बारहठ को ‘राजस्थान केसरी’ के नाम से भी जाना जाता है. उनके परिवार का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान इतना व्यापक रहा कि परिवार के कई सदस्यों ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया.
लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमले में परिवार की भूमिका
केसरी सिंह बारहठ के भाई जोरावर सिंह बारहठ भी प्रमुख क्रांतिकारी थे. 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले में जोरावर सिंह बारहठ की महत्वपूर्ण भूमिका रही. इस क्रांतिकारी योजना से रास बिहारी बोस सहित कई क्रांतिकारी जुड़े थे और केसरी सिंह के पुत्र प्रताप सिंह बारहठ भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे. इस हमले ने ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था. घटना के बाद अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ तेज कर दी. बारहठ परिवार भी अंग्रेजों की नजर में आ गया और परिवार के सदस्यों पर लगातार दबाव बनाया जाने लगा.
पूरा परिवार आजादी के यज्ञ में समर्पितकेसरी सिंह बारहठ ने अपने परिवार को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर राष्ट्र की सेवा के लिए तैयार किया. उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ, पुत्र अमर शहीद प्रताप सिंह बारहठ और दामाद ईश्वरदान आशिया स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे. परिवार की संपत्ति जब्त होने, जेल और अंग्रेजी शासन के दबाव के बावजूद बारहठ परिवार पीछे नहीं हटा. देश की आजादी को परिवार ने व्यक्तिगत जीवन से अधिक महत्वपूर्ण माना.
‘राजस्थान केसरी’ की उपाधि कैसे मिली?केसरी सिंह बारहठ लंबे समय तक अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते रहे और जेल भी गए. जेल से रिहाई के बाद वे वर्धा पहुंचे. उस दौर में स्वतंत्रता सेनानी और उद्योगपति जमनालाल बजाज ने कई राष्ट्रवादी लोगों को वर्धा आने के लिए आमंत्रित किया था. वर्धा में केसरी सिंह बारहठ के सम्मान में विशेष दीपावली अंक प्रकाशित किया गया, जिसमें उनके जीवन और संघर्ष को प्रमुखता से स्थान दिया गया. इसी अवसर पर उन्हें ‘राजस्थान केसरी’ की उपाधि से सम्मानित किया गया. इसके बाद यह नाम उनकी पहचान बन गया.
साहित्य को बनाया अंग्रेजों के खिलाफ हथियारकेसरी सिंह बारहठ केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली साहित्यकार भी थे. उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों में स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाई. उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ शामिल है. इन दोहों के माध्यम से उन्होंने मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह को दिल्ली दरबार में जाने से रोकने का संदेश दिया था. उनकी ‘कुसुमांजलि’ रचना भी चर्चित रही. इसमें लॉर्ड कर्जन और ब्रिटिश शासन पर द्विअर्थी शैली में व्यंग्य किया गया था. उनकी रचनाओं में ऊपर से प्रशंसा का भाव दिखाई देता था, लेकिन भीतर अंग्रेजी शासन के खिलाफ तीखा विरोध छिपा था. उन्होंने युवाओं और क्षत्रियों को भी राष्ट्र की आजादी के लिए जागरूक करने का प्रयास किया. उनकी लेखनी उस दौर में जनजागरण का महत्वपूर्ण माध्यम बनी.
प्रताप सिंह बारहठ की गिरफ्तारी और बरेली जेल की यातनाएं
केसरी सिंह बारहठ के पुत्र प्रताप सिंह बारहठ भी क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय थे. अंग्रेजी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर बरेली जेल भेज दिया. वहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उनसे उनके क्रांतिकारी साथियों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए कई तरह की यातनाएं दीं. अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स क्लीवलैंड ने उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश की. बताया जाता है कि उनसे कहा गया कि उनके पिता जेल में हैं, परिवार की संपत्ति जब्त हो चुकी है और उनकी मां उन्हें याद कर रोती रहती हैं. यदि वे क्रांतिकारी साथियों के नाम बता दें तो उन्हें राहत मिल सकती है. लेकिन प्रताप सिंह बारहठ ने देश के प्रति अपनी निष्ठा से समझौता नहीं किया. उनका जवाब आज भी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में साहस की मिसाल माना जाता है.
“मैं अपनी एक मां को हंसाने के लिए देश की सैकड़ों माताओं को नहीं रुला सकता.”
इसके बाद भी उन्होंने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया. जेल में दी गई यातनाओं के बीच उनका जीवन बलिदान हो गया.
अंग्रेजों के खिलाफ कभी नहीं झुके केसरी सिंहकेसरी सिंह बारहठ ने अंग्रेजी शासन के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना. उन्होंने अपनी लेखनी और क्रांतिकारी विचारों से युवाओं में राष्ट्रभावना पैदा की. उनके लिए देश की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं थी, बल्कि यह स्वाभिमान और राष्ट्रधर्म का प्रश्न था. यही वजह रही कि उन्होंने अपने परिवार को भी इसी विचारधारा के साथ तैयार किया.
देवपुरा में हुआ था जन्मकेसरी सिंह बारहठ का जन्म उनकी पैतृक जागीर के गांव देवपुरा, शाहपुरा में हुआ था. उनके परिवार में राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण की भावना थी.उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे. उनके पुत्र प्रताप सिंह बारहठ ने भी देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया. उनके दूसरे पुत्र रणजीत सिंह बारहठ भी परिवार का हिस्सा रहे.
14 अगस्त 1941 को कोटा के माणक भवन में हुआ निधन
स्वतंत्रता आंदोलन में लंबे संघर्ष और जेल की यातनाओं के बाद केसरी सिंह बारहठ ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष कोटा में बिताए. 14 अगस्त 1941 को कोटा के माणक भवन में उनका निधन हुआ था. उनका जीवन राजस्थान और देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति की मिसाल है. उन्होंने अपनी लेखनी से चेतना जगाई, क्रांतिकारियों का साथ दिया और अपने परिवार को भी देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया. आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है. केसरी सिंह बारहठ और उनके परिवार का बलिदान यह याद दिलाता है कि भारत की आजादी के पीछे केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि हजारों परिवारों का त्याग, साहस और बलिदान छिपा था.



