स्वतंत्रता दिवस स्पेशल: 1857 में ही सीकर पहुंच गई थी आजादी की लड़ाई, तात्या टोपे ने अंग्रेजों से लिया था लोहा

सीकर. 15 अगस्त 1947 का वह दिन जब भारत ने करीब दो सदियों की गुलामी की बेड़ियां तोड़कर आजादी की सांस ली, लेकिन इस आजादी की नींव इससे 90 साल पहले ही रखी जा चुकी थी. साल 1857 में जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देशभर में क्रांति की चिंगारी भड़की, तब कई वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. इन्हीं महान क्रांतिकारियों में एक नाम था तात्या टोपे, जिनकी वीरता की कहानी राजस्थान के सीकर से भी जुड़ी है.
महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने 1857 की क्रांति में प्रमुख भूमिका निभाई थी, वे नाना साहेब पेशवा और रानी लक्ष्मीबाई के विश्वसनीय सहयोगी थे. वे इस क्रांति के प्रमुख सेनानायकों में शामिल थे, अंग्रेजी सेना लगातार उनका पीछा कर रही थी. ऐसे समय में वे राजस्थान पहुंचे और कई इलाकों में क्रांति की अलख जगाई. टोंक, बूंदी, झालरापाटन, नाथद्वारा, भीलवाड़ा, सलूंबर, बांसवाड़ा, दौसा, सवाई माधोपुर और इंदरगढ़ जैसे क्षेत्रों से होते हुए वे 21 जनवरी 1859 को सीकर पहुंचे.
जब सीकर की धरती पर हुआ अंग्रेजों से सामना
सीकर पहुंचने के बाद तात्या टोपे का सामना कर्नल होम्स की अंग्रेजी सेना से हुआ. संख्या और संसाधनों के लिहाज से अंग्रेजी सेना मजबूत थी, लेकिन तात्या टोपे ने गुरिल्ला युद्ध शैली का सहारा लिया. उनके साथियों ने अदम्य साहस के साथ अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया. सीकर की धरती उस दौर की इस ऐतिहासिक भिड़ंत की गवाह बनी. युद्ध के बाद तात्या टोपे सीकर में ज्यादा समय तक नहीं रुके. वे अपने साथियों के साथ मारवाड़ की ओर बढ़ गए और बाद में मध्यप्रदेश पहुंचे. अंग्रेजों से बचते हुए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले इस महान सेनानायक को आखिरकार विश्वासघात का सामना करना पड़ा.
दोस्त के धोखे से अंग्रेजों के हाथ लगे
अप्रैल 1859 में मध्यप्रदेश के शिवपुरी-गुना क्षेत्र के जंगलों में तात्या टोपे को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया, जब वे सो रहे थे. बताया जाता है कि उनके करीबी मित्र राजा मानसिंह के विश्वासघात के कारण अंग्रेज उन्हें पकड़ने में सफल हुए. इसके बाद शिवपुरी में उन पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ने का मुकदमा चलाया गया. अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया और 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई.
15 अगस्त पर सीकर में याद किए गए क्रांतिकारी
आज सीकर शहर के सूरजपोल के पास स्थित तात्या टोपे पार्क उनकी उसी वीरगाथा की याद दिलाता है. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यहां उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है. लोग उस महान सेनानायक को याद कर रहे हैं, जिसने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी और देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया. आज जब तिरंगा आसमान में शान से लहराता है, तो उसके पीछे तात्या टोपे जैसे अनगिनत वीरों के बलिदान की कहानी भी दिखाई देती है. सीकर की धरती पर उनकी स्मृति इस बात की गवाह है कि आजादी सिर्फ 15 अगस्त 1947 को हासिल नहीं हुई थी, बल्कि उसकी नींव वर्षों पहले ऐसे ही वीरों के संघर्ष और बलिदान से रखी गई थी.



