Famous Temple: 600 साल पुराना मंदिर, 250 साल पुराना दंगल, राजस्थान का यह गांव में धर्म और खेल का है अनोखा संगम

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हिंगलाज माता का 600 साल पुराना धाम, शीतलाष्टमी पर देशभर से आते हैं पहलवान
Last Updated:August 16, 2026, 07:16 IST
600 Year Old Hinglaj Mata Temple Sikar: सीकर के गणेश्वर क्षेत्र का खादरा गांव अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा ऐसा स्थान है, जहां करीब 600 साल पुरानी धार्मिक आस्था और 250 साल पुरानी कुश्ती परंपरा आज भी जीवित है. निमोद की पहाड़ियों पर स्थित हिंगलाज माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. वहीं शीतलाष्टमी पर लगने वाला पारंपरिक मेला और कुश्ती दंगल गांव की अलग पहचान बन चुका है. इस दंगल में राजस्थान के साथ हरियाणा और पंजाब से भी पहलवान पहुंचते हैं. धर्म, लोक संस्कृति और खेल परंपरा का अनोखा संगम खादरा को खास बनाता है.
सीकर जिले के गणेश्वर क्षेत्र का खादरा गांव अरावली की वादियों में बसा एक सुंदर गांव है. यह गांव करीब छह सदियों पुरानी धार्मिक आस्था के कारण पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है. इसके अलावा यह जगह ढाई सदियों पुरानी खेल परंपरा को भी अपने भीतर समेटे हुए है. यहां निमोद की पहाड़ियों पर हिंगलाज माता मंदिर का प्राचीन मंदिर मौजूद है. शीतलाष्टमी पर यहां एक मेले का आयोजन भी होता है.
इस गांव में शीतलाष्टमी पर पारंपरिक कुश्ती दंगल होता है. इस कुश्ती दंगल का आयोजन गांव की मुख्य पहचान है. इस दंगल में पूरे देश से पहलवान आते हैं. इस आयोजन के कारण खादरा गांव पूरे राजस्थान में खास पहचान रखता है. गांव से कुछ ही दूरी पर 600 साल पुराना हिंगलाज माता का मंदिर मौजूद है. मान्यता के अनुसार, तेज गर्जना के साथ पहाड़ी का एक हिस्सा टूट गया था. इसी दौरान माता हिंगलाज की करीब छह इंच की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई.
जब ग्रामीणों ने वहां जाकर देखा तो उसे माता का चमत्कार माना और गांव के लोग यहां पूजा-अर्चना करने लगे. ग्रामीणों की आस्था बढ़ी तो तत्कालीन ठाकुर मूलसिंह ने ग्रामीणों के सहयोग से यहां मठ का निर्माण किया गया. इसके बाद यह मंदिर के शिखर का निर्माण भी कराया गया. इसके बाद यह स्थान लगातार श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. मंदिर में शारदीय नवरात्र के दौरान सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं.
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इन दिनों मंदिर में आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. महावा, निमोद, खादरा, मानपुरा, गांवड़ी और नीमकाथाना सहित दर्जनों गांवों और ढाणियों के लोग माता के दर्शन के लिए यहां आते हैं. नवरात्र के दौरान पहाड़ी क्षेत्र में भक्तिमय माहौल बना रहता है और मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से गुलजार नजर आता है. इस मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में आने से पाकिस्तान के बलूचिस्तान जाने की जरूरत नहीं पड़ती. यहां दर्शन करने से ही भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है.
खादरा की दूसरी बड़ी पहचान शीतलाष्टमी पर लगने वाला पारंपरिक मेला है. इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण कुश्ती दंगल रहता है. इस कुश्ती दंगल की परंपरा करीब 250 वर्षों से चली आ रही है. यानी कई पीढ़ियां इस दंगल को देखते और इसमें हिस्सा लेते हुए बड़ी हुई हैं. समय बदला, मनोरंजन के साधन बदले, लेकिन खादरा के दंगल की मिट्टी में आज भी वही जोश और परंपरा दिखाई देती है. इस पारंपरिक दंगल में राजस्थान के अलावा हरियाणा और पंजाब से भी नामी पहलवान पहुंचते हैं.
यहां अलग-अलग भार और स्तर की कुश्तियों में पहलवान अपनी ताकत, दांव-पेंच और कौशल का प्रदर्शन करते हैं. हर वर्ष यहां 5100 रुपये तक की 60 से अधिक कुश्तियां आयोजित होती हैं. ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपनी पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है. खादरा के धार्मिक आयोजन और दंगल गांव की सामाजिक समरसता को भी मजबूत करते हैं. मेले के दौरान अलग-अलग गांवों से आने वाले लोग एक जगह जुटते हैं और धार्मिक आस्था के साथ खेल परंपरा का हिस्सा बनते हैं.
मंदिर की व्यवस्थाओं और धार्मिक आयोजनों के संचालन के लिए 11 सदस्यों की समिति बनाई गई है. करीब 600 साल पुरानी आस्था, 250 साल पुरानी कुश्ती परंपरा और हर वर्ष लगने वाला शीतलाष्टमी मेला खादरा को राजस्थान की ऐसी विरासत बनाते हैं, जहां धर्म, इतिहास, लोक संस्कृति और खेल एक साथ दिखाई देते हैं. पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव की यही परंपराएं आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है.
First Published :
August 16, 2026, 07:16 IST



