न शिवलिंग, न अलग-अलग प्रतिमाएं… एक ही पत्थर में हैं त्रिदेव, 1000 साल से 32 पिलर पर खड़ा है यह अद्भुत मंदिर

चित्तौड़गढ़. राजस्थान के चित्तौड़गढ स्थित विश्व प्रसिद्ध दुर्ग में कई प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन समिधेश्वर मंदिर की पहचान सिर्फ इसकी प्राचीनता तक सीमित नहीं है. करीब 11वीं शताब्दी में बने इस मंदिर ने समय के साथ अपना नाम भी बदला और कई दौर के जीर्णोद्धार के बावजूद अपनी ऐतिहासिक पहचान को संभालकर रखा है. मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह 32 पिलर पर टिका है और इसके गर्भगृह में भगवान शिव की मानवाकार त्रिमूर्ति विराजमान है. एक ही प्रतिमा में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तीन रूप दिखाई देते हैं. मंदिर के निर्माण, जीर्णोद्धार और नाम बदलने की कहानी आज भी इसके शिलालेखों, पिलरों और वास्तुकला में दर्ज है.
समिधेश्वर मंदिर का नाम इतिहास के अलग-अलग दौर में तीन बार बदला. निर्माण के समय इसे त्रिभुवन नारायण मंदिर कहा जाता था. बाद में महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार करवाया, जिसके बाद यह मोकलजी का मंदिर कहलाने लगा. इसके बाद मंदिर के आसपास साधु-संतों और विभिन्न संप्रदायों के संतों की साधना और समाधियों की मान्यता जुड़ी. इन्हीं समाधियों के कारण आगे चलकर मंदिर का नाम समिधेश्वर मंदिर पड़ गया. तब से आज तक यही नाम प्रचलित है. इस तरह मंदिर के तीनों नाम इसके अलग-अलग ऐतिहासिक दौर की पहचान माने जाते हैं.
32 पिलर पर टिका है मंदिर
समिधेश्वर मंदिर की मजबूती का सबसे बड़ा आधार इसके 32 पिलर हैं. हालांकि मंदिर में मौजूद सभी पिलर एक जैसे नहीं हैं. कुछ पिलर मूल निर्माण काल के माने जाते हैं, जबकि समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार के दौरान कुछ पिलर बदले या जोड़े गए. मंदिर में तीन तरह की पिलर संरचना दिखाई देती है. पुराने पिलरों पर बारीक नक्काशी और मूर्तियां हैं, जबकि बाद में जोड़े गए कुछ पिलर अपेक्षाकृत सादे हैं. कुछ पिलरों में पुरानी और नई शैली का मिश्रण भी दिखाई देता है. बताया जाता है कि 1536 के बाद हुए निर्माण कार्यों में भी कुछ पिलर जोड़े गए. बाद के संरक्षण कार्यों में पुरातत्व विभाग ने भी मंदिर के पिलरों से जुड़े काम करवाए.
नींव से ही वास्तु और ज्योतिष का रखा गया था ध्यान
मान्यता है कि मंदिर के निर्माण से पहले राजा भोज ने इसकी पूरी योजना और कुंडली तैयार करवाई थी. इसके लिए ज्योतिष और वास्तु से जुड़े विद्वानों की मदद ली गई. मंदिर की नींव रखने से पहले करीब 40 दिन तक अनुष्ठान किए जाने की भी मान्यता है. मंदिर की नींव में कमल के फूल की आकृति बनाई गई है. इसके बाद अलग-अलग स्तरों पर ऐसी आकृतियां उकेरी गई हैं, जिन्हें मंदिर की मजबूती, सुरक्षा और धार्मिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है. मंदिर की वास्तुकला को पांच प्रमुख स्तरों में समझा जा सकता है. सबसे नीचे कमल की आकृति है, जिसे सृष्टि और भगवान ब्रह्मा से जोड़ा जाता है. इसके ऊपर डायमंड जैसी आकृतियां हैं, जिन्हें मजबूती का प्रतीक माना जाता है. इसके बाद कीचक या ड्रैगन फेस जैसी आकृतियां हैं, जिन्हें मंदिर की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है. इनके ऊपर हाथियों की आकृतियां शक्ति और मजबूती का प्रतीक मानी जाती हैं. मंदिर के बाहरी हिस्से में तत्कालीन जीवनशैली से जुड़ी कई आकृतियां भी दिखाई देती हैं.
एक ही प्रतिमा में उकेरे गए हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश
मंदिर के गर्भगृह की सबसे बड़ी खासियत यहां स्थापित भगवान शिव की मानवाकार त्रिमूर्ति है. करीब 9 फीट ऊंची और चौड़ी इस प्रतिमा में तीन अलग-अलग रूप एक ही पत्थर में उकेरे गए हैं. बाईं तरफ ब्रह्मा, बीच में विष्णु और दाईं तरफ भगवान शिव का रौद्र रूप दिखाई देता है. तीनों चेहरों के भाव भी अलग-अलग हैं. ब्रह्मा रूप में चेहरा शांत और मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है. विष्णु रूप में शांति का भाव है, जबकि शिव का चेहरा रौद्र रूप में नजर आता है. प्रतिमा में शिव के नीलकंठ रूप को भी दर्शाया गया है. तीनों रूप एक ही पत्थर में होने के कारण यह प्रतिमा मंदिर की सबसे विशिष्ट पहचान बन गई है.
देश के कई शिव मंदिरों में भगवान शिव के लिंग रूप में दर्शन होते हैं, लेकिन समिधेश्वर मंदिर में मानवाकार त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के दर्शन एक साथ होते हैं. ऐसी मानवाकार त्रिमूर्ति प्रतिमाएं बेहद दुर्लभ मानी जाती हैं. चित्तौड़गढ़ के अलावा मुंबई की एलिफेंटा गुफाओं में भी भगवान शिव की मानवाकार त्रिमूर्ति देखने को मिलती है.
प्रवेश द्वार पर है खास तरह की आकृति
मंदिर के प्रवेश द्वार की सीढ़ियों के दोनों तरफ कीचक की आकृतियां बनाई गई हैं. मान्यता है कि श्रद्धालु इनके बीच से होकर मंदिर में प्रवेश करें, ताकि बाहर की नकारात्मकता वहीं छूट जाए. मंदिर में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले गणेश की आकृति दिखाई देती है. गणेश को रिद्धि-सिद्धि का दाता माना जाता है, इसलिए यहां पहले गणेश का नमन और इसके बाद भगवान शिव की पूजा की परंपरा बताई जाती है. मंदिर में 64 योगिनियों और अप्सराओं से जुड़ी आकृतियों का भी उल्लेख मिलता है. इन्हें श्रद्धालु के मन को एकाग्र और शुद्ध करने की धार्मिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है.
साधु-संतों की साधना स्थली रहा चित्तौड़ दुर्ग
समिधेश्वर मंदिर की पहचान केवल पूजा स्थल के रूप में नहीं रही. मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार पुराने समय में चित्तौड़ दुर्ग साधु-संतों और ऋषि-मुनियों की साधना स्थली रहा है. मंदिर के आसपास भी साधुओं के रहने और साधना करने की मान्यता है. कई साधु-संतों की समाधियां मंदिर के आसपास होने की वजह से ही इसके वर्तमान नाम को समिधेश्वर से जोड़ा जाता है. करीब एक हजार साल का इतिहास समेटे यह मंदिर आज भी चित्तौड़ दुर्ग की ऐतिहासिक विरासत का अहम हिस्सा है. इसके पिलर, शिलालेख, नक्काशी, वास्तुकला और गर्भगृह में विराजमान त्रिमूर्ति प्रतिमा इसे राजस्थान के प्रमुख प्राचीन शिव मंदिरों में अलग पहचान देते हैं.



