वो मशहूर शायर, जिसने आईसीएस की छोड़ी नौकरी, जेल की खानी पड़ी रोटी, बने उर्दू के पहले ज्ञानपीठ विजेता

Last Updated:August 28, 2026, 04:31 IST
उर्दू शायरी की दुनिया में फिराक गोरखपुरी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है. उनका असली नाम रघुपति सहाय था. अपनी शायरी और गजलों के जरिए उन्होंने उर्दू साहित्य को एक अलग पहचान दी. लेकिन उनकी जिंदगी सिर्फ शेर और गजलों तक ही सीमित नहीं थी. उन्होंने पढ़ाई में शानदार सफलता हासिल की, सरकारी नौकरी की, आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, जेल गए और बाद में साहित्य को अपनी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बना लिया.
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फिराक गोरखपुरी ने छोड़ी थी आईसीएस जैसी नौकरी
नई दिल्ली. फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था. उनका परिवार पढ़ा-लिखा और संपन्न था. उनके पिता गोरख प्रसाद भी साहित्य में दिलचस्पी रखते थे और कविताएं लिखा करते थे. ऐसे माहौल का असर फिराक पर भी पड़ा. उन्होंने बचपन में ही उर्दू और फारसी सीखना शुरू कर दिया था.
बाद में उन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में पढ़ाई की. वह पढ़ाई में काफी होनहार थे. बीए की परीक्षा में उन्होंने पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया. पढ़ाई के साथ-साथ उनका झुकाव साहित्य और शायरी की तरफ भी बढ़ता गया.
प्रेमचंद ने पहचानी शायरी की प्रतिभा
साल 1916 में, जब फिराक करीब 20 साल के थे और बीए की पढ़ाई कर रहे थे, उन्होंने अपनी पहली गजल लिखी. इसी दौरान उनकी मुलाकात मशहूर लेखक प्रेमचंद से हुई. उस समय प्रेमचंद भी गोरखपुर में रहते थे. प्रेमचंद ने फिराक की शायरी की प्रतिभा को पहचाना और उनकी शुरुआती गजलों को आगे पहुंचाने में मदद की. उन्होंने उनकी रचनाएं ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम तक भेजीं. यहीं से फिराक की शायरी को लोगों तक पहुंचने का रास्ता मिला.
आईसीएस जैसी नौकरी भी छोड़ दी
पढ़ाई पूरी करने के बाद फिराक का चयन सरकारी नौकरी के लिए हुआ. वह पीसीएस के साथ आईसीएस के लिए भी चुने गए थे. उस दौर में आईसीएस में चयन होना बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता था. इससे एक तरफ अच्छी नौकरी मिलती थी, तो दूसरी तरफ समाज में काफी सम्मान भी मिलता था. लेकिन उस समय देश अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का फिराक पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला किया और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए. इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा. राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और करीब डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा. जेल से बाहर आने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस के काम से जोड़ा. कुछ समय तक उन्होंने कांग्रेस कार्यालय में अवर सचिव के तौर पर काम किया.
बता दें कि बाद में फिराक ने राजनीति से दूरी बना ली और अपना ध्यान शिक्षा और साहित्य पर लगा दिया. करीब 1930 के आसपास वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े और वहां अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने लगे. फिराक हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार थे. उनकी शायरी में प्रेम, इंसानी रिश्तों, जिंदगी, समाज और आम लोगों की भावनाओं की झलक मिलती है. उन्होंने सिर्फ गजलें ही नहीं लिखीं, बल्कि नज्म, रुबाई और दूसरी काव्य विधाओं में भी अपनी कलम चलाई.फिराक गोरखपुरी को साहित्य में उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले. साल 1960 में उन्हें ‘गुले-नग्मा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद साल 1969 में उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. वह उर्दू साहित्य के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बने.
About the AuthorMunish KumarSenior sub editor
न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…
New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
August 28, 2026, 04:31 IST



