सूरज की रोशनी से कैंसर का इलाज! CUSB गयाजी के वैज्ञानिकों ने खोजा नैनो तकनीक, मिला पेटेंटे

Last Updated:August 30, 2026, 14:47 IST
CUSB nano technology: CUSB प्रोफेसरों ने 12 साल के शोध के बाद एक पेटेंटेड, पर्यावरण-अनुकूल नैनो तकनीक विकसित की है. यह 40-62nm खोखले सिल्वर नैनोशेल का उपयोग कर सौर ऊर्जा से कैंसर और वस्त्र उद्योग के अपशिष्ट को तेजी से विघटित कर जल शोधन करती है. यह तकनीक लागत प्रभावी है.
गयाजी: बिहार के गयाजी जिले में स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUSB) के प्रोफसर की टीम ने कमाल किया है. रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अमिया प्रियम और इनकी टीम के द्वारा नैनो प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक ऐसी तकनीक और प्रोडक्ट की खोज की गई है. जिससे कैंसर उपचार और वस्त्र उद्योग से निकलने वाले हानिकारक अपशिष्ट को सौर ऊर्जा द्वारा सब पिकोमोलर की अत्यंत सूक्ष्म सांद्रता पर तीव्र गति से विघटन एवं जल शोधन करने में सक्षम है. इस तकनीक एवं खोज को भारतीय पेटेंट कार्यालय के द्वारा सीयूएसबी को पहला भारतीय पेटेंट मिला है. यह तकनीक वस्त्र उद्योग से निकलने वाले रंगीन अपशिष्टों के उपचार में सौर ऊर्जा के प्रभावी इस्तेमाल का रास्ता खोल सकती है. साथ ही, नैनोशेल के विशेष गुणों के चलते भविष्य में इसके पर्यावरण संरक्षण और कैंसर उपचार संबंधी अनुप्रयोगों की संभावनाएं भी तलाशने का अवसर मिलेगा.
12 वर्षों के निरंतर शोध के बाद मिली सफलतालगातार 12 वर्षों के निरंतर शोध के बाद इस मुकाम को हासिल किया है. पेटेंट का शीर्षक संवर्धित सौर उत्प्रेरण हेतु प्रथम एवं द्वितीय निकट अवरक्त क्षेत्र में ट्यूनेबल प्लॅस्मोनिक होलो सिल्वर नैनो शेल्स का शुन्य आरपीएम संश्लेषण है. 2019 में भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय को इसके लिए आवेदन किया गया था और वर्ष 2026 के अगस्त महीने में पेटेंट का सर्टिफिकेट मिल गया है.
तीन वैज्ञानिकों का रहा महत्वपूर्ण योगदानइस प्रोडक्ट की खोज में दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के मुख्य आविष्कारक प्रोफेसर अमिय प्रियम, शोधार्थी भावेश कुमार दाधीच तथा भुवनेश्वर स्थित कालिंग औद्योगिक प्रौद्योगिकी संस्थान के डॉक्टर भव्य भूषण का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. प्रोफेसर अमिय प्रियम ने बताया कि इस तकनीक के सबसे बड़ी विशेषता शून्य घूर्णन गति आधारित हरित संश्लेषण है. इसमें किसी चुंबकीय यांत्रिक सरगर्मी की आवश्यकता नहीं पड़ती. इससे ऊर्जा की खपत पूरी तरह समाप्त हो जाती है और प्रक्रिया अत्यंत लागत प्रभावी तथा पर्यावरण अनुकूल बन जाती है.
40 से 62 नैनोमीटर के हैं नैनोशेलप्रोफेसर प्रियम के अनुसार इससे पहले जापान के एक शोध समूह ने करीब 800 नैनोमीटर तक के क्षेत्र में काम करने वाली संरचना विकसित की थी. लेकिन उनके कणों का आकार लगभग 150 नैनोमीटर तक था. CUSB की टीम ने इसके मुकाबले केवल 40 से 62 नैनोमीटर आकार के खोखले सिल्वर नैनोशेल विकसित किए हैं. इन नैनोशेल में द्वि-प्लास्मोनिक प्रणाली विकसित की गई है. इसमें 450 से 560 नैनोमीटर के बीच क्वाड्रपोल SPR और 780 से 1150 नैनोमीटर के बीच सिमेट्रिक डाइपोल SPR के दो स्पष्ट अवशोषण पीक पाए गए हैं. सरफेस प्लास्मोन रेजोनेंस को 1150 नैनोमीटर तक समायोजित कर इसे दूसरे निकट-अवरक्त क्षेत्र (NIR-II) तक पहुंचाया गया है.
कैंसर उपचार में भी संभावित उपयोगप्रोफेसर अमिया प्रियम ने आगे बतलाया कि NIR-II क्षेत्र में काम करने के कारण यह तकनीक शरीर के अपेक्षाकृत गहरे ऊतकों तक प्रकाश पहुंचाने में उपयोगी हो सकती है. संभावित फोटोथर्मल थेरेपी में लक्षित कैंसर कोशिकाओं का तापमान बढ़ाकर उन्हें नष्ट करने की दिशा में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि कैंसर उपचार में इसके व्यावहारिक उपयोग के लिए आगे प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षण जरूरी होंगे. इस शोध को अमेरिकन केमिकल सोसाइटी (ACS) और रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री (RSC) की प्रमुख शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया है। खोखली संरचना की पुष्टि के लिए आईआईटी खड़गपुर में ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (TEM) का उपयोग किया गया. शोध के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) से अनुदान भी मिला है.
About the AuthorAmit Ranjan
अमित रंजन वर्तमान में में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …
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August 30, 2026, 14:47 IST



