गुरु को आखिरी सलाम देने शिष्यों ने अपनाई अनोखी परंपरा, अर्थी के आगे हुए अखाड़े के करतब, भावुक हो गए सब

Last Updated:September 26, 2026, 14:07 IST
Udaipur Hindi News: उदयपुर में गुरु और शिष्य का यह रिश्ता अखाड़ों की पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है. पहलवान अपने उस्ताद को केवल कुश्ती सिखाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाने वाला गुरु मानते हैं. ऐसे में जब कोई उस्ताद दुनिया से विदा होता है, तो शिष्य उसके सम्मान में अखाड़े की कला को सामने लाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं.
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उदयपुर. शहर में एक ऐसी अंतिम विदाई देखने को मिली, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं. आमतौर पर किसी की अंतिम यात्रा में लोग शांत होकर साथ चलते हैं, लेकिन यहां जब एक उस्ताद पहलवान की अर्थी निकली तो उनके शागिर्दों ने आगे-आगे अखाड़े के पारंपरिक करतब दिखाए. हाथों में शस्त्र थे, शरीर पर पहलवानों का अंदाज था और हर करतब के पीछे अपने उस्ताद के प्रति सम्मान था. यह उदयपुर के पहलवानों की वह परंपरा है, जिसमें वे अपने उस्ताद को अखाड़े की कला के जरिए अंतिम श्रद्धांजलि देते हैं.
यह अंतिम विदाई प्रसिद्ध भित्ति चित्रकार, पारंपरिक तलवारबाज और उस्ताद पहलवान भगवानलाल सेन की थी. 81 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. राव जी का हाटा, हेमराज जी पानेरी की गली निवासी भगवानलाल सेन ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा कला और कुश्ती को समर्पित किया. उस्ताद अपनी तलवारबाजी का प्रदर्शन के खास तौर पर पहचाने जाते थे. उम्र के इस पड़ाव पर भी जब उस्ताद भगवानलाल सेन ने तलवार हाथ में लेकर करतब दिखाए तो देखने वालों ने खूब सराहा जाता जाता था. उन्होंने जलझूलनी एकादशी पर भी अपनी कला का प्रदर्शन किया था. रामरेवाड़ी के बाद जब वे अपने बड़े भाई को घर छोड़कर वापस लौट रहे थे, तभी अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई, उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो उनके शागिर्दों ने अपने उस्ताद को उसी कला के जरिए विदाई देने का फैसला किया, जिसे उन्होंने पूरी जिंदगी सीखा और आगे बढ़ाया.
शिष्यों के लिए यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं अर्थी के आगे पहलवानों ने अखाड़े के पारंपरिक करतब और शस्त्र संचालन का प्रदर्शन किया. हर करतब मानो अपने उस्ताद की सीख को आखिरी बार दोहरा रहा था. शिष्यों के लिए यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस गुरु के प्रति सम्मान था जिसने उन्हें अखाड़े की परंपरा, अनुशासन और कला सिखाई.
अखाड़े की कला को सामने लाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करतेउदयपुर में गुरु और शिष्य का यह रिश्ता अखाड़ों की पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है.पहलवान अपने उस्ताद को केवल कुश्ती सिखाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाने वाला गुरु मानते हैं. ऐसे में जब कोई उस्ताद दुनिया से विदा होता है तो शिष्य उसके सम्मान में अखाड़े की कला को सामने लाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं.
कला और उनकी सीख को आगे बढ़ाते रहेंगेअशोक नगर श्मशान घाट पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भगवानलाल सेन का अंतिम संस्कार किया गया. चित्रकला, तलवारबाजी और कुश्ती की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले उस्ताद भगवानलाल सेन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शागिर्दों के हाथों में नजर आए वही अखाड़े के करतब उनकी कला और उनकी सीख को आगे बढ़ाते रहेंगे.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Udaipur,Rajasthan
First Published :
September 26, 2026, 14:07 IST



