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अरबों-खरबों खर्च किए बिना इस देश ने बनाया ऐसा ‘डिफेंस सिस्टम’, अटैक तो छोड़ो झांक भी नहीं पाते दुश्मन

आज के दौर में जब कोई देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए डिफेंस सिस्टम बनाता है, तो उसमें अरबों-खरबों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं. मिसाइल डिफेंस, राडार और ऊंची-ऊंची कंक्रीट की दीवारों पर बेहिसाब खर्च होता है. लेकिन एक देश ने ऐसा डिफेंस सिस्टम तैयार किया था जिसमें न तो कोई आधुनिक टेक्नोलॉजी थी और न ही अरबों-खरबों का बजट, फिर भी इस सिस्टम के आगे दुश्मन फुस्स हो जाते थे. अटैक तो छोड़ो कोई गलत नीयत से झांक भी नहीं पाता था. सबसे मजेदार बात तो ये है कि ये डिफेंस सिस्टम 4000 साल पुराना है.

क्या है बिना पैसे और मॉडर्न टेक्नोलॉजी से बना डिफेंस सिस्टम?

असल में, वैज्ञानिकों को उत्तर अफ्रीकी देश मोरक्को में 4,000 साल पुराना एक डिफेंस सिस्टम मिला है. मिस्र की नील घाटी के बाहर पूरे उत्तरी अफ्रीका में ये अपनी तरह का सबसे पुराना डिफेंस सिस्टम घेरा है. ये अनोखी खोज मोरक्को की राजधानी रबात से करीब 80 किलोमीटर दूर ‘ओउद बेहत’ नदी घाटी में हुई है. यहाँ इटली, मोरक्को और इंग्लैंड के वैज्ञानिकों की टीम ने खुदाई के दौरान खाइयों, मिट्टी के टीलों और मजबूत दीवारों वाले इस प्राचीन डिफेंस सिस्टम को खोज निकाला है.

इस रिसर्च के लेखक और इटली के आर्कियोलॉजिस्ट गियुलियो लुकारिनी बताते हैं कि इस डिफेंस सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा दक्षिण तरफ बनी एक बेहद मजबूत दीवार है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दीवार का निचला हिस्सा आज से करीब 3,500 से 4,000 साल पहले बनाया गया था.

सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इस विशाल सुरक्षा दीवार को बनाने के लिए किसी महंगे या आधुनिक सामान की जरूरत नहीं पड़ी थी. इसे उस समय उपलब्ध साधारण चीजों जैसे, मिट्टी, राख, सिल्ट और पत्थरों को मिलाकर तैयार किया गया था.

इतनी मजबूत दीवार बनाने की क्या थी वजह? आखिर क्या छिपा था अंदर?

अब सवाल उठता है कि 4,000 साल पहले के लोगों को इतनी मेहनत करके और खाइयां व दीवारें बनाकर सुरक्षा घेरा तैयार करने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर वो किस चीज की रक्षा कर रहे थे?

शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि ये डिफेंस सिस्टम किसी सैन्य अड्डे के लिए नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े प्राचीन कृषि केंद्र की सुरक्षा के लिए बनाया गया था. इस बस्ती के अंदर खेती-बाड़ी, फसलें, मवेशी और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए विशाल भंडारण सुविधाएं मौजूद थीं.

रिसर्चर्स का कहना है कि यह डिफेंस सिस्टम किसी मिलिट्री बेस के लिए नहीं बनाया गया था. इसे तो एक बहुत बड़े पुराने कृषि केंद्र की सुरक्षा के लिए तैयार किया गया था. इस बस्ती के अंदर फसलों, मवेशियों और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए बहुत बड़े-बड़े गोदाम बने हुए थे।

खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को यहां घंटी के आकार के  दर्जनों गड्ढे मिले हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन गड्ढों का इस्तेमाल अनाज जमा करने और सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था. खास बात ये है कि इन गड्ढों में अनाज रखने की क्षमता इतनी ज्यादा थी कि ये सिर्फ उस बस्ती में रहने वाले लोगों की जरूरत से कहीं अधिक थी. इससे पता चलता है कि ये जगह आसपास के पूरे इलाके और एक बड़े समुदाय के लिए अनाज स्टोरेज सेंटर का काम करती थी.

किससे था खतरा? कौन थे वो ‘दुश्मन’?

अक्सर सुरक्षा दीवारें बाहरी हमलावरों या लुटेरों से बचने के लिए बनाई जाती हैं. लेकिन ओउद बेहत के मामले में कहानी थोड़ी अलग हो सकती है.

गियुलियो लुकारिनी बताते हैं कि अभी ये पूरी तरह से साफ नहीं है कि यहां के लोग ठीक-ठीक किससे अपनी रक्षा कर रहे थे. उनका कहना है कि शायद ये किसी बाहरी ‘आक्रमणकारियों’ का खतरा नहीं था, बल्कि जमीन और संसाधनों पर कब्जे को लेकर आपस में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, व्यापारिक रास्तों पर नियंत्रण और एक संगठित नेतृत्व की वजह से ये सुरक्षा ढांचा खड़ा किया गया था.

लुकारिनी कहते हैं, ‘इस तरह का विशाल निर्माण कार्य अचानक या बिना सोच-समझ के नहीं किया जा सकता. इसके लिए बहुत बेहतरीन योजना, भूगोल और जमीन की बनावट (Topography) का सही चुनाव, और लंबे समय तक बड़ी संख्या में मजदूरों को एकजुट करने व तालमेल बिठाने की जरूरत होती है.”

इतिहास का ‘खाली पन्ना’ अब भर रहा है

ये खोज केवल एक दीवार की कहानी नहीं है, बल्कि ये उत्तरी अफ्रीका के इतिहास को देखने का नजरिया ही बदल देती है. इस पूरे इलाके को, जिसे अरबी भाषा में ‘मग्रेब’, मॉरिटानिया, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और लीबिया शामिल हैं).कहा जाता है, लंबे समय तक इतिहास का एक खाली पन्ना मान लिया गया था.

गियुलियो लुकारिनी ने बताया कि एक सदी से भी ज्यादा समय से भूमध्यसागरीय इतिहास में मग्रेब क्षेत्र को एक खाली जगह की तरह देखा जाता था. लेकिन नई वैज्ञानिक खोजों ने साबित कर दिया है कि ये सोच सिर्फ वैज्ञानिक जानकारी की कमी के कारण थी.

हाल ही में प्राचीन डीएनए शोध से पता चला था कि करीब 8,500 साल पहले यूरोप से शिकारी-संग्राहक भूमध्य सागर पार करके मग्रेब पहुंचे थे. इसके अलावा, पिछले साल ही वैज्ञानिकों की इसी टीम ने इस जगह से 190 किलोमीटर उत्तर में, जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के पास मोरक्को की रिफ पहाड़ियों में स्थित ‘कच कोच’ नाम के एक प्रागैतिहासिक गांव के अवशेषों की खोज की थी.

यूरोप और अफ्रीका का अनोखा कनेक्शन

7 सितंबर को ‘लिब्यन स्टडीज’ नाम की जर्नल मेंपपबस इस अध्ययन के नतीजे ये भी बताते हैं कि उस दौर में उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के बीच गहरे संबंध थे.

जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के उत्तर में स्थित इबेरिया में प्रागैतिहासिक स्थलों पर हाथीदांत (African Ivory) और शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलके मिले थे, जो ये साबित करते थे कि यूरोप का उत्तरी अफ्रीका से संपर्क था. अब ओउद बेहद की खोज से इस रिश्ते का अफ्रीकी पहलू भी खुलकर सामने आ रहा है.

हालांकि, दोनों तरफ के निर्माण में कुछ अंतर भी थे. उस समय इबेरिया में पहाड़ियों पर बड़े-बड़े किलेबंद शहर थे, जहां कांस्य धातु  और समृद्ध कब्रें समाज में अमीर-गरीब के भेदभाव को दर्शाती थीं. दूसरी ओर, मोरक्को का ओउद बेहद डिफेंस सिस्टम उससे छोटा था.

लुकारिनी के मुताबिक, इसका मतलब ये नहीं है कि दोनों किनारे बिल्कुल एक जैसे दिखते थे, बल्कि ये दिखाता है कि उत्तर-पश्चिमी मग्रेब के समुदाय भी उस दौर में रणनीतिक जगहों पर नियंत्रण और बड़े सामूहिक कामों में निवेश कर रहे थे.

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