अगर नाना पाटेकर के पास होती ये 8 रुपये की दवा तो बच सकती थी जान! CPR भी करता काम, कार्डियोलॉजिस्ट ने बताया उस समय का वो सच

Last Updated:October 08, 2026, 14:44 IST
Nana Patekar Death: मशहूर कलाकार नाना पाटेकर पूरे देश को रुला कर चले गए. कार्डिएक अरेस्ट से उनका निधन हुआ. हार्ट अटैक और फिर कार्डिएक अरेस्ट से लेकर उनके निधन तक शरीर में क्या-क्या हलचलें हुई होंगी, इसे लेकर हमने फोर्टिस अस्पताल में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी से बात की. साथ ही यह भी जानना चाहा कि अगर नाना पाटेकर के पास हार्ट अटैक किट वाली 3 दवाइयां होती तो क्या उनकी जान बच जाती.नाना पाटेकर के निधन की मेडिकल कंडीशन.
Nana Patekar Death: नाना पाटेकर को 2.30 बजे रात में गोवा के अपने घर में सीने में तेज दर्द हुआ. दर्द इतना ज्यादा था कि वे छटपटाने लगे. पास में कोई नहीं था. उन्होंने अपने एक दोस्त को मैसेज किया. दोस्त समय पर इसे नहीं देख पाया. इसलिए आने में देर कर दी. जब आया तब तक सवा चार बज चुका था. एंबुलेंस में डॉक्टरों की टीम आई. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. सीपीआर, माउथ टू माउथ ब्रीद, इलेक्ट्रिकल शॉक जैसी सभी मेडिकल प्रक्रियाएं की गई लेकिन उन्हें इस दुनिया में वापस नहीं लाया जा सका. देश गमगीन हो गया. पर सवाल उठता है कि क्या नाना पाटेकर की जान 8 रुपये वाली हार्ट अटैक किट वाली 3 दवाइयों से बच जाती? क्या तब सीपीआर बेहतर काम करता? आखिर हार्ट में कितनी बड़ी परेशानी हुई कि उन्हें बचाया नहीं जा सका. इन सारे सवालों का जवाब जानने के लिए हमने फोर्टिस अस्पताल में कार्डियोलॉजी एंड इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रिंसपल डारेक्टर और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी से बात की.
किट वाली दवा लेने से गोल्डन आवर बढ़ जाता
डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी बताते हैं कि छाती में तेज दर्द, बिना किसी वजह से बहुत ज्यादा पसीना, सांस लेने में बहुत ज्यादा तकलीफ और ज्यादा डकारें आ रही हैं और इस स्थिति में कोई व्यक्ति हार्ट अटैक किट वाली दवाइयां (नीचे इसके बारे में डिटेल बताया गया है) ले लेता है तो उनके पास अस्पताल पहुंचने के लिए गोल्डन आवर वाला समय बढ़ सकता है. इस स्थिति में बचने का चांस ज्यादा हो जाता है. लेकिन ध्यान रखें कि अगर हार्ट अटैक हुआ है तो ये तीनों दवाइयां अस्पताल पहुंचने तक के समय को तो बढ़ा देगी लेकिन हार्ट अटैक से हार्ट को हुए नुकसान की भारपाई नहीं कर सकती. हार्ट अटैक में हार्ट को खून नहीं मिलता क्योंकि खून वाली नलियां या तो बंद हो चुकी होती है या कम खून सप्लाई करती है. इसमें हार्ट खून को पंप करना लगभग बंद कर देती है. ये दवाइयां नलियों को चौड़ा कर और खून को पतला कर हार्ट तक पहुंचाने की कोशिश तो करती है लेकिन कुछ ही समय के लिए. इसलिए अगर किसी को हार्ट अटैक हुआ है तो हर हाल में जितनी जल्दी संभव हो सके, उतनी जल्दी नजदीकी अस्पताल में पहुंचना अनिवार्य है.
दवा से कार्डिएक अरेस्ट तक नहीं पहुंचते नाना
नाना पाटेकर को एसिसटोल (asystole) हो गया. इसका मतलब है कि हार्ट में जो इलेक्ट्रिक करंट है वह ठप्प होने के करीब पहुंच गया. यह स्थिति हार्ट अटैक के बाद होती है. डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी बताते हैं कि यानी इससे पहले नाना पाटेकर को हार्ट अटैक आया होगा. हार्ट अटैक जैसे ही आया उसके 90 मिनट के अंदर अस्पताल पहुंच जाना चाहिए. अगर पल्स चल रहा है इस स्थिति में हम सीपीआर नहीं देते हैं. तुरंत इमरजेंसी ईसीजी करके हमलोग यह पता लगाते हैं कि हार्ट अटैक हुआ है या नहीं. अगर ईसीजी में कंफर्म हो जाता है कि हार्ट अटैक है तो फिर कैथ लैब में लाया जाता है. यहां इमरजेंसी एंजियोग्राफी की जाती है. एंजियोग्राफी के बाद बंद धमनियों को खोलने के लिए बैलून या स्टेंट के जरिए इसे खोला जाता है. इसमें बारीक पाइप घुसाकर खून के प्रवाह को शुरू किया जाता है. इस स्थिति में अगर नाना पाटेकर पहले ही ये तीनों दवाइयां खा लेते तो संभवतः कार्डिएक अरेस्ट तक मामला नहीं पहुंचता लेकिन नाना पाटेकर अस्पताल आने से पहले ही एसिसटोल की स्थिति में आ गए थे. इसका मतलब होता कि हार्ट का इलेक्ट्रिक सिग्नल लगभग ठप्प हो चुका है.
90 मिनट में अस्पताल पहुंच जाते तो बच जाते नाना पाटेकर
जब हार्ट का इलेक्ट्रिक सिग्नल ठप्प हो चुका होता है. यानी हार्ट काम करना बंद कर चुका है. इसमें मरीज का पल्स नहीं दिखता और वह बेहोश हो चुका होता है. इस स्थिति में सीपीआर दिया जाता है. डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी बताते हैं कि इसमें सिर्फ सीपीआर ही नहीं दिया जाता है बल्कि कई तरह के प्रोसेस होते हैं इसे मेडिकल टर्म में रिसुसिटेशन (resuscitation) कहा जाता है. इसमें मरीज को सीपीआर सहित मुंह से सांस दी जाती है. मरीज की कार्डिएक मसाज की जाती है. मरीज को वेंटिलेटर पर डाल दिया जाता है ताकि शरीर में ऑक्सीजेनेशन भी होता रहे. सीपीआर से खून का बहाव बनता है. इससे भी अगर रिस्पॉन्स नहीं मिलता तो वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन या पल्सलेस वेंट्रिकुलर टैचीकार्डिया को ठीक करने के लिए डिफ़िब्रिलेशन या इलेक्ट्रिकल कार्डियोवर्जन दिया जाता है. इसमें 160 जूल की ऊर्जा से मरीज को इलेक्ट्रिकल शॉक दिया जाता है. इस शॉक से हार्ट में अस्त-व्यस्त इलेक्ट्रिकल गतिविधियां नॉर्मल होने लगती है और हार्ट के अंदर जो खुद का पेसमेकर है, वह सही हो जाता है. इसके बाद फिर एंजियोग्राफी और फिर एंजियोप्लास्टी की जाती है. अगर मरीज आधे से एक घंटे में प्रतिक्रिया देने लगता है तो बहुत चांस रहता है कि मरीज जिंदा बचकर घर वापस जा सके. इसलिए सीपीआर या इलेक्ट्रिक शॉक देने का प्रोसेस एक-एक घंटे तक चलता रहता है. इतनी देर के बाद भी अगर मरीज रिस्पॉन्स नहीं देता तो फिर बचना मुश्किल हो जाता है. नाना पाटेकर के केस में संभवतः बहुत देर हो गई. अगर 90 मिनट के अंदर ये प्रक्रियाएं हो जाती तो शायद वे बच जाते.
कार्डिएक अरेस्ट कैसे होता
जब हार्ट अटैक के कारण कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज आती है, तब इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिकल असंतुलन पैदा हो जाता है. इससे हार्ट की धड़कन 200 प्रति मिनट से अधिक हो जाता है. इसे वेंट्रिकुलर टैचीकार्डिया कहा जाता है और यदि यह 300 से ऊपर हो जाए तो वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन कहा जाता है. इसके बाद कार्डिएक अरेस्ट हो जाता है. वेंट्रिकुलर फिब्रिलेशन का मतलब यह है कि हार्ट प्रति सेकंड लगभग 5 बार संकुचित होने का प्रयास करता है लेकिन इतनी अधिक धड़कन के कारण हार्ट पर प्रभावी संकुचन समाप्त हो जाता है और हार्ट में केवल एक हल्का स्पंदन रह जाता है. इस स्थिति में मस्तिष्क और शरीर को खून की आपूर्ति रुकने से मरीज तत्काल अचेत हो जाता है. यदि 1 मिनट के भीतर आपातकालीन सहायता न मिले तो जीवन बचने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है.
कौन सी वो 3 दवाइयां हैं
एस्पिरिन (Aspirin – 300 mg / 325 mg): डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को सीने में तेज दर्द, अत्यधिक पसीना और सांस लेने में गंभीर तकलीफ हो रही हो, तो एस्पिरिन (Aspirin – 300 mg) की दो गोलियां जीभ के नीचे रख लेनी चाहिए.काम: यह एक एंटी-प्लेटलेट दवा यानी Blood Thinners है. यह खून में थक्के बनने की प्रक्रिया को रोकती है, जिससे दिल तक खून का बहाव पूरी तरह बंद न हो.कैसे लें: डॉक्टर की सलाह के मुताबिक इसे पानी से निगलने के बजाय चबाकर खाने की सलाह दी जाती है ताकि यह खून में तुरंत असर दिखाए.
क्लोपिडोग्रेल (Clopidogrel – 75 mg) : क्लोपिडोग्रेल की दो गोली खानी चाहिए. हार्ट अटैक के समय जब दिल की धमनियों में थक्का बनता है, तो ब्लड कोशिकाओं में मौजूद प्लेटलेट्स आपस में चिपकने लगती हैं. क्लोपिडोग्रेल इन प्लेटलेट्स को आपस में चिपकने से रोकती है. यह दवा एस्पिरिन के साथ मिलकर काम करती है. इससे ब्लॉक हो रही नस में खून का प्रवाह पूरी तरह बंद नहीं होता और दिल की मांसपेशियों को ऑक्सीजन मिलती रहती है.कैसे लें : हार्ट अटैक या इमरजेंसी चेस्ट पेन की स्थिति में डॉक्टर क्लोपिडोग्रेल 75 mg की 2 गोलियां (कुल 150 mg) एक साथ खाने की सलाह देते हैं. इसे पानी के साथ साबुत निगलकर खाना चाहिए.
एटोरवास्टेटिन (Atorvastatin – 80 mg): डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी ने बताया कि इसके बाद एटोरवास्टेटिन की एक गोली खानी चाहिए.काम: यह दवा मुख्य रूप से हाई-डोज़ स्टेटिन है. यह कोलेस्ट्रॉल के थक्के को स्थिर करती है और धमनियों में आई सूजन को तुरंत कम करने में मदद करती है.कैसे लें: इसे पानी के साथ निगला जाता है.
फिर भी अस्पताल ले जाना जरूरी
डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी कहते हैं कि इन तीनों गोलियों से जान बचने के चांसेज बहुत बढ़ जाते हैं. हालांकि ये दवाएं कुछ समय तक ही काम करेगा. दवा खाने के बाद भी अस्पताल ले जाना अत्यंत जरूरी है. पूरी तरह से जान तभी बचेगी जब मरीज को अस्पताल ले जाया जाएगा. टाइम मिल जाता है. इसमें 10-15 लाइफ तो बच ही जाती है. कुछ हार्ट अटैक की किट में सॉर्बिट्रेट लेने की सलाह दी जाती है. डॉ. नित्यानंद त्रिपाठी बताते हैं कि सॉर्बिट्रेट गोली नहीं लेनी चाहिए क्योंकि अगर इंफेरियर वाली हो तो डेथ की आशंका बढ़ जाती है.
About the AuthorLakshmi Narayan
मीडिया में 20 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले लक्ष्मी नारायण पत्रकारिता के हर विधा में माहिर हैं. भविष्य की आहट और ट्रेंड्स को समय से पहले भांपने की अद्भुत कला उनके अंदर समाहि…
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October 08, 2026, 13:25 IST



