1000 में 3 सेरेब्रल पाल्सी के शिकार! क्यों होती है यह बीमारी, न्यूरो डॉक्टर ने बताया वो सच जो बच्चे को ताउम्र बना देती हैं लाचार

Cerebral Palsy: करीब एक हजार बच्चों में 3 बच्चे सेरेब्रल पाल्सी के शिकार हो जाते हैं. सेरेब्रल पाल्सी जिस बच्चे में होती है उनमें से अधिकांश बच्चा जीवन भर लाचार रहता है. ऐसे बच्चों को चलने-फिरने, खेलने-कूदने यहां तक कि बोलने में दिक्कत आती है. कुछ का हाल और भी बुरा हो जाता है. दरअसल, सेरेब्रल पाल्सी की बीमारी पेट में पल रहे गर्भ के समय ही हो जाती है या जन्म लेने के तुरंत बाद होती है. इसमें प्रेग्नेंसी के दौरान इंफेक्शन या ऑक्सीजन की कमी होती है तो दिमाग का वह हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है जिसका संबंध शरीर के मूवमेंट और मांसपेशियों के संकुचन से जुड़ा हुआ है. इसके अलावा बच्चे के जन्म के तत्काल बाद कुछ गलतियों से भी यह बीमारी हो सकती है. ऐसे में हमें यह जानने की जरूरत है कि क्या इस बीमारी से बचा जा सकता है. हम ऐसा क्या करें कि किसी भी बच्चे को इस तरह का दुःस्वप्न में जीना न पड़े. इसके लिए न्यूज 18 डिजिटल ने बेहद खास न्यूरोलॉजिस्ट फोर्टिस अस्पताल में न्यूरोलॉजी एंड न्यूरोवैस्कुलर इंटरवेंशन डिपार्टमेंट के डायरेक्टर एंड हेडडॉ. विनीत बांगा से बात की.
सेरेब्रल पाल्सी क्या है
डॉ. विनीत बांगा ने बताया कि सेरेब्रल पाल्सी के कई कारण हो सकते हैं. दरअसल, भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां बच्चे की डिलीवरी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की निगरानी में नहीं होती. गांवों में तो अधिकांश ऐसा ही होता है. यहां एमबीबीएस डॉक्टरों की निगरानी में बच्चे का जन्म होता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पहले की तुलना में इस मामले में बहुत सुधार किया है. अब पहले की तरह हमारे यहां शिशु मृत्यु दर नहीं है लेकिन अब भी हमें बहुत सुधार करने की जरूरत है. जहां तक सेरेब्रल पाल्सी का संबंध है तो 90 प्रतिशत मामलों में इस बीमारी को रोका जा सकता है. इसका मतलब यह हुआ कि 90 प्रतिशत सेरेब्रल पाल्सी की बीमारी प्रेग्नेंसी और प्रसव के दौरान लापरवाही की वजह से होती है. इसमें मां की कोई गलती नहीं होती लेकिन जिस तरह से हम डिलीवरी को हैंडल करते हैं, उनमें ये गलतियां होती है. इन गलतियों की वजह से बच्चे के दिमाग में किसी न किसी तरह से ऑक्सीजन कम पहुंचती और सेरेब्रल पाल्सी हो जाती है. आसान शब्दों में कहें तो सेरेब्रल पाल्सी मस्तिष्क के उस हिस्से में क्षति या असामान्य विकास के कारण होता है जो शरीर की गतिविधियों और मांसपेशियों को नियंत्रित करता है. वास्तव में जब बच्चा मां के पेट में रहता है तो वहां गर्भनाल के माध्यम से सांसें लेता है लेकिन जैसे ही बच्चा मां के गर्भ से बाहर आता है, मां से कनेक्शन कट जाता है और बच्चे को खुद सांस लेनी होती है. इस दौरान कई तरह की जटिलताएं आती हैं. अगर प्रशिक्षित और स्पेशलाइज्ड डॉक्टरों की निगरानी में प्रसव कराया जाए तो इन जटिलताओं को आसानी से हैंडल कर लिया जाता है लेकिन अगर प्रसव सामान्य स्थितियों में हो तो गड़बड़ियों का चांस ज्यादा रहता है. कई ऐसे वाक्ये होते हैं जिनमें बच्चों को ऑक्सीजन ग्रहण करने में कठिनाइयां आती है.
इन स्थितियों में सेरेब्रल पाल्सी
अगर बच्चा जन्म के समय मल को मुंह में ले लेता है (मेकोनियम एस्पिरेशन) तो इससे ऑक्सीजन को अंदर जाने में दिक्कत होती है.
अगर गर्भनाल बच्चे के गले में फंस जाए या दब जाए तो ब्रेन में ऑक्सीजन कम पहुंचती है. ऐसे में प्रसव लंबा खिंचने से ऑक्सीजन की गंभीर कमी हो सकती है.
अगर जन्म के समय बच्चे के सिर में चोट लग जाए तो भी ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो सकती है.
शिशु का 37 सप्ताह से पहले (प्री-मैच्योर) जन्म होना, जिससे मस्तिष्क का विकास अधूरा रह जाता है.
गर्भावस्था के दौरान मां को टॉर्च या रूबेला, खांस, जुकाम, चिकनपॉक्स, बुखार, टायफायड जैसे इंफेक्शन होने पर शिशु का दिमाग प्रभावित हो सकता है.
जन्म के समय बच्चे का वजन 2.5 किलोग्राम से काफी कम है तो भी इस बीमारी का खतरा होता है.
जन्म के तुरंत बाद नवजात को गंभीर पीलिया होना और बिलीरुबिन का मस्तिष्क तक पहुंच जाना.
गर्भवती महिला को थायराइड बढ़ जाए या दौरे पड़े या हाई ब्लड प्रेशर (प्री-क्लैम्पसिया) हो तो भी खतरा है.
शिशु को जन्म के बाद मेनिनजाइटिस या एन्सेफलाइटिस जैसी दिमागी बीमारियों में भी सेरेब्रल पाल्सी का खतरा है.
शिशु के जन्म से पहले या तुरंत बाद दिमाग की नसों में थक्का जमना या ब्लीडिंग होने से भी बीमारी का जोखिम है.
एक से अधिक बच्चे होने पर पोषण संबंधी समस्याएं और जगह की कमी से बी सेरेब्रल पाल्सी का खतरा है.
90 प्रतिशत मामलों में बीमारी को रोका जा सकता है
डॉ. विनीत बांगा बताते हैं कि जैसा कि हमने पहले कहा है कि सेरेब्रल पाल्सी के 90 प्रतिशत मामलों को हम आसानी से रोक सकते हैं. इसके लिए प्रेग्नेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड बहुत जरूरी है. इससे रेगुलर सुपरविजन होता है. इससे हमें यह पता चलता है कि बच्चे का विकास गर्भ में सही से हो रहा है या नहीं. कुछ ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन तो नहीं है. बच्चे जिस स्पीड में बढ़ना चाहिए, वह हो रही है या नहीं. बच्चे के गले में गर्भनाल तो नहीं फंसा है. बच्चे की जगह सही है या नहीं. बच्चे को गर्भ में ऑक्सीजन सही से मिल रही है या नहीं. मां के इंफेक्शन का प्रभाव बच्चे पर तो नहीं पड़ रहा है. इन सब चीजों का पता अल्ट्रासाउंड से लग जाता है. गायनेकोलॉजिस्ट थोड़ी सी जटिलताएं होने पर सही तरीकों से इसे हैंडल कर लेते हैं. इसलिए योग्य गाइनेकोलॉजिस्ट से दिखाना बहुत जरूरी है. अब प्रसव के समय और ज्यादा केयर की जरूरत होती है. प्रसव के समय सही से गर्भनाल को हटाना जरूरी है. इसके लिए प्रशिक्षित नर्स की जरूरत होती है जो न्यूनेटल गाइनकोलॉजिस्ट की देखरेख में काम करती है. जन्म के तुरंत बाद बच्चे का रोना जरूरी है, इसी से सांस लेता है. इसमें समय का बहुत महत्वपूर्ण रोल है. किस समय किस तरह की हरकतें होनी है, यह स्पेशलिस्ट डॉक्टर ही जान सकते हैं. अगर बच्चे में किसी तरह की दिक्कत है. अचानक डिलीवरी कराने की नौबत आती है तो अस्पतालों में आईसीयू, न्यूनेटल केयर और पीडियाट्रीशियन उपलब्ध होते हैं, इसलिए ये सारी परेशानियां दूर हो जाती है. इसलिए अगर योग्य डॉक्टरों की निगरानी में प्रसव हो और प्रेग्नेंसी की रेगुलर निगरानी हो तो सेरेब्रल पाल्सी के 90 प्रतिशत मामलों को होने से रोका जा सकता है.
सेरेब्रल पाल्सी में दिमाग में क्या होता
डॉ. विनीत बांगा बताते हैं कि हमें यह समझना होगा की ब्रेन वास्तव में करता क्या है? ब्रेन हमारे पूरे शरीर को कंट्रोल करता. हम कैसे चलते हैं, कैसे बोलते हैं, कैसे सुनते हैं, कैसे समझते हैं, कैसे देखते हैं, कैसे महसूस करते हैं, कैसे किसी चीज को याद करते हैं, कैसे किसी चीज पर राय बनाते हैं, यहां तक कि कैसे सांस लेते हैं, ये सब कुछ ब्रेन करता है. ब्रेन के अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग काम होते हैं. अगर ब्रेन को थोड़ी भी देर के लिए ऑक्सीजन नहीं मिले तो भारी मुश्किल हो सकती है. ब्रेन बहुत कोमल अंग है. हमारे शरीर का जो सबसे कोमल और सबसे महत्वपूर्ण अंग है वो ब्रेन है. ब्रेन से ही सब चल रहा होता है. ऐसे में ब्रेन को अगर थोड़ी देर के लिए भी ऑक्सीजन नहीं मिले तो यह डैमेज हो जाता है.शरीर के अधिकांश अंगों की कोशिकाएं दोबारा बन जाती है लेकिन ब्रेन की कोशिकाएं यदि एक बार मर गई तो यह दोबारा नहीं बन पाती है. इसलिए आपने कई अंगों का ट्रांसप्लांट सुना होगा लेकिन ब्रेन का ट्रांसप्लांट नहीं सुना होगा. ऐसे में जब बच्चे के ब्रेन में ऑक्सीजन की सप्लाई रुकती है तो दिमाग का सेंसरी कॉर्टेक्स, मोटर कॉर्टेक्स, विजन एरिया जैसे अंग डैमेज हो जाते हैं. इन अंगों से चलना, फिरना, बोलना और देखना कट्रोल होता है. डैमेज होने के बाद इस तरह की शारीरिक गतिविधियों में कमजोरी आ जाती है. सेरेब्रल पाल्सी की बीमारी कितनी गंभीर होगी, ये इस बात पर निर्भर करता है कि दिमाग को ऑक्सीजन की सप्लाई कितनी देर तक नहीं हुई. जितनी देर तक ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित होगी, ब्रेन में नुकसान उतना बड़ा होगा और सेरेब्रल पाल्सी भी उतनी ही गंभीर होगी.
कैसे पहचानें कि बच्चे को सेरेब्रल पाल्सी है
डॉ. विनीत बांगा ने बताया कि अगर बच्चे शारीरिक गतिविधियों में किसी भी तरह की कमी दिख रही है तो ऐसे मामलों में डॉक्टरों से दिखाना चाहिए. मसलन बच्चा जन्म के समय से ही हाथ-पैर चलाने लगता है. मुंह से कुछ बोलने की कोशिश में लगा रहता है. थोड़ा बड़ा होने पर ये गतिविधियां बढ़ जाती है. फिर कुछ महीने बाद करवट बदलने का समय आता है, फिर उठने की कोशिश करता है, फिर बोलने लगता है, फिर चलने लगता है. ये सारी गतिविधियां अगर समय पर नहीं हो तो इस कंडीशन में सेरेब्रल पाल्सी हो सकती है. माता-पिता को बच्चों के विकास से जुड़े इन रेड फ्लैग्स पर विशेष ध्यान देना चाहिए. हर बच्चे की गर्दन संभालने, बोलने, सुनने और चलने-फिरने की एक तय समय-सीमा होती है. जैसे 6 महीने में गर्दन न संभाल पाना, साल भर में शब्द न बोलना, या 2-3 साल तक न चल पाना, ये सब गंभीर चिंता का विषय है. अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर अनदेखा कर देते हैं जबकि समय पर कमी को पहचानना बेहद जरूरी है. यदि किसी बच्चे में यह सब देरी से दिखता है तो 1 साल के भीतर डॉक्टर को दिखाना चाहिए. न्यूरोप्लास्टिसिटी शुरुआती उम्र में जब शिशु का दिमाग विकसित हो रहा होता है, तब कई तरह के हस्तक्षेप करते हैं. इसमें सेंसरी और मोटर स्टिमुलेशन थेरेपी से दिमाग के हेल्दी हिस्से प्रभावित हिस्से का काम संभालने लगते हैं, जिससे बच्चे के सुधार की संभावना काफी बढ़ जाती है. हालांकि बच्चे में दिख रहे ऐसे लक्षण हर बार सेरेब्रल पाल्सी ही हों, यह ज़रूरी नहीं है. कई बार ये लक्षण थायराइड की समस्या, हार्मोनल असंतुलन, केमिकल की कमी या किसी जेनेटिक कारण से भी हो सकते हैं. सही समय पर मेडिकल जांच कराने से बीमारी का सही कारण सामने आता है. इसलिए, किसी भी प्रकार का संशय होने पर बिना देर किए विशेषज्ञ डॉक्टर और थेरेपिस्ट से तुरंत संपर्क करना चाहिए.



