उदयपुर में गरबा की अनोखी परंपरा, न DJ और न मूर्ति; कलश पूजा के साथ 48 साल से हो रहा आयोजन

Last Updated:October 15, 2026, 12:09 IST
Udaipur Garba News Sahastra Audichya: उदयपुर में सहस्त्र औदिच्य समाज का पारंपरिक गरबा आज भी बिना डीजे और तेज संगीत के ढोलक की थाप पर आयोजित होता है. साल 1978 से शुरू हुई यह परंपरा मेवाड़ रियासतकाल से जुड़ी है, जहां महाराणा भी दर्शन के लिए आते थे. यहां मूर्ति के स्थान पर गरबा कलश स्थापित कर गुजराती परंपरा से पूजा होती है. 48 वर्षों से निरंतर जारी यह आयोजन अगले वर्ष अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मनाएगा. यह उत्सव नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और भक्ति भावना से जोड़ने का एक अनुठा माध्यम है.
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उदयपुर: राजस्थान के झीलों की नगरी उदयपुर में आधुनिकता और डीजे के शोर-शराबे से दूर एक ऐसा गरबा आयोजन होता है, जो शुद्ध भारतीय परंपरा और अटूट आस्था की मिसाल पेश करता है. सहस्त्र औदिच्य समाज द्वारा आयोजित इस गरबे में न तो डीजे का शोर होता है और न ही चकाचौंध से भरी आधुनिक लाइटें. यहां आज भी केवल ढोलक की थाप, पारंपरिक भक्ति गीत और मां जगदम्बा की आराधना गूंजती है. इस साल भी नवरात्रि के पावन अवसर पर सहस्त्र औदिच्य धर्मशाला में यह पारंपरिक गरबा अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया जा रहा है.
इस ऐतिहासिक आयोजन की शुरुआत वर्ष 1978 में समाज के युवाओं ने एक छोटी सी पहल के रूप में की थी. देखते ही देखते यह आयोजन समाज की सांस्कृतिक पहचान बन गया. आज करीब 48 वर्षों के लंबे समय के बाद भी नई पीढ़ी उसी निष्ठा और उमंग के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है. समाज के वरिष्ठ और युवा सदस्य मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते हैं. युवाओं की उस छोटी सी शुरुआत का यह सफर अब अपने 50 वर्ष पूरे करने की ओर बढ़ रहा है और अगले वर्ष इस गरबा उत्सव का स्वर्ण जयंती वर्ष अत्यंत धूमधाम से मनाया जाएगा.
मेवाड़ रियासतकाल से जुड़ा है इतिहास, महाराणा भी आते थे दर्शन करनेसहस्त्र औदिच्य समाज के इस गरबा आयोजन की जड़ें काफी गहरी हैं और इसका इतिहास मेवाड़ के रियासतकाल से सीधा जुड़ा हुआ है. उस दौर में भी शारदीय नवरात्रि के दौरान गरबा चौक पर समाज की महिलाएं एकत्रित होकर माताजी की विशेष पूजा-अर्चना करती थीं. इस भव्य और धार्मिक आयोजन के दर्शन करने के लिए तत्कालीन महाराणा और मेवाड़ राजपरिवार के सदस्य भी स्वयं उपस्थित होते थे. उस समय यह गरबा केवल मनोरंजन या नृत्य का माध्यम न होकर, पूरे परिवार व समाज की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी एक पवित्र धार्मिक परंपरा थी.
गरबा कलश की स्थापना और गुजराती संस्कृति का सुंदर संगमसहस्त्र औदिच्य समाज का ऐतिहासिक संबंध गुजरात से होने के कारण यहां आयोजित गरबा उत्सव में गुजराती संस्कृति की स्पष्ट और मनमोहक छाप देखने को मिलती है. इस आयोजन की सबसे मुख्य और खास बात यह है कि यहां माताजी की मूर्ति की जगह पारंपरिक गरबा कलश स्थापित किया जाता है. वैदिक विधि-विधान से कलश पूजन के पश्चात ढोलक की मधुर थाप पर महिलाएं और पुरुष समूह में गरबा खेलते हैं. यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़े रखने का एक बेहद मजबूत माध्यम बन चुका है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Udaipur,Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 15, 2026, 12:09 IST



