बच्चा हकलाने लगे तो कब समझें कि यह अपने आप ठीक नहीं होगा, किस डॉक्टर के पास दिखाएं, जानिए सब कुछ

How does stuttering Cure: हकलाना 1-2 साल के बच्चों में आम है. 3 साल आते-आते बच्चों की आवाज एकदम स्पष्ट हो जाती है. कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जिनमें हकलाने की समस्या देर तक रहती है. अपने आस-पास आप एक-आध ऐसे लोगों को भी जरूर देखें होगे जो ताउम्र हकलाते हैं. अगर समय रहते उनका इलाज हो जाता तो हकलाने की समस्या आजीवन नहीं रहती. असल में लोग यही नहीं समझ पाते है कि कब हकलाना अपने आप ठीक होने वाला नहीं है. यूं तो हकलाने की 70 प्रतिशत से ज्यादा समस्या अपने आप ठीक हो जाती है. बाकी जो 30 प्रतिशत बच जाता है अगर उनका समय पर अगर इलाज कर दिया जाए तो यह भी आसानी से ठीक हो जाएगा. हकलाना कब समस्या बन जाती है और कब यह आजीवन रह जाता है. कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी हो जाता है, इन सब बातों को जानने के लिए हमने फोर्टिस अस्पताल में पैडिएट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अनिसा गोयल से बात की.
हकलाना है क्या
सबसे पहले तो हम यह जानते हैं कि हकलाना वास्तव में है क्या. डॉ. अनिसा गोयल बताती हैं कि यह एक स्पीच प्रोबल्म है. इस समस्या में बच्चों को शब्दों को बोलने में दिक्कत होती है. बच्चा अधूरा शब्द बोलता है. जैसे अगर बच्चा मम्मी बोलने की कोशिश करता है तो म तो पूरा बोल लेगा लेकिन इसके बाद की ध्वनि को निकालने में वह जूझता रहेगा. बच्चे के मुंह से स्मूथली वह शब्द नहीं निकल पाता है. हालांकि बच्चों के दिमाग में यह फिट रहता है कि इस शब्द को बोलने के लिए किन-किन ध्वनियों की आवश्यकता होगी. वह उन ध्वनियों से भलीभांति परिचित भी रहता है. लेकिन वह पूरी तरह से शब्दों को निकाल नहीं पाता है. ध्वनियों के बीच में उसे बहुत पॉज लेना पड़ता है. हकलाने की समस्या में शब्दों को निकालने में तीन तरीकों से दिक्कतें हैं. जैसे जब बच्चा बोलना चाहता है कि मम्मी मुझे खाना दो. इसमें मम्मी बहुत कोशिश करने के बाद बोल तो लेता है लेकिन इसके बाद के शब्द ‘मुझे’ नहीं बोल पाता है और फिर बाद के शब्दों में ‘खाना दो’ में ‘ना’ और ‘दो’ बोल पाता है. दूसरा-बच्चे बहुत बार एक शब्द को बोलने में बहुत लंबा पॉज ले लेता है. जैसे उसे कहना होता है कि ‘मम्मी मुझे खाना दो’. इसमें मम्मी को कहने में ही लंबा पॉज लेता है, हालांकि उसे पता होता है कि क्या बोलना है लेकिन मुंह से निकल नहीं पाता. तीसरा-बच्चे के मुंह से वाक्यों के कुछ शब्द निकल ही नहीं पाते है और उन शब्द को बोले बगैर वह आगे बढ़ जाता है.
तीन प्रमुख लक्षण
रिपीटिशन (Repetitions): म-म-म-मम्मी.
प्रोलॉन्गेशन (Prolongations): म् म्म म् म् अ् अ् म्मी (ध्वनि को लंबा खींचना).
ब्लॉक (Blocks): मुंह खुला रहने या बंद रहने पर भी आवाज बिल्कुल न निकल पाना.
हकलाने की बीमारी क्या दिमागी है
डॉ. अनिसा गोयल कहती हैं कि यह ब्रेन से संबंधित एक बीमारी तो है लेकिन ब्रेन में कोई बीमारी हो, ऐसा नहीं है. दिमाग का वह हिस्सा जिसमें लैंग्वेज वाला एरिया होता है वहां से बोलने वाले अंगों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान सही से नहीं हो पाता है. इसलिए इसे स्पीच मोटर कंट्रोल का असंतुलन कह सकते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बच्चे के दिमाग की बुद्धिमता में कोई कमी नहीं है. वह शब्द सोच तो लेता है लेकिन मस्तिष्क से बोलने वाली मांसपेशियों जैसे कि जीभ, होंठ, वोकल कॉर्ड तक जाने वाला सिग्नल मिलीसेकंड्स के लिए बाधित हो जाता है. इसमें ब्रेन का लैग्वेज वाला केंद्र और बोलने की मांसपेशियों के बीच का एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिस्कनेक्ट है. इसमें लैंग्वेज वाले एरिया में कौन सा पार्ट स्टीमुलेट होगा जिससे साउंड प्रोड्यूज हो, इसके बीच कॉर्डिनेशन कमजोर हो जाता है. दूसरी ओर इसमें कुछ मानसिक समस्या भी हो सकती है. जैसे जब बच्चा बीच के शब्द को कहे बिना आगे बढ़ जाता है तो यह कोई शारीरिक या बायोलॉजिकल अयोग्यता नहीं है बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक अनुकूलन है. इसमें जब बच्चे को पता चलता है कि वह किसी विशेष शब्द पर अटक जाएगा, तो वह उस शब्द को छोड़ देता है या उसकी जगह कोई आसान शब्द इस्तेमाल कर लेता है.
70 प्रतिशत केस माता-पिता या परिवार से
डॉ. अनिसा गोयल ने बताया कि हकलाने की समस्या का 70 प्रतिशत मामला जीन से संबंधित रहता है. यानी अगर बच्चे के पापा, मम्मी, दादा-दादी, नाना-नानी बचपन में हकलाते होंगे तो इस बात के चांसेज ज्यादा होते हैं कि वह बच्चा भी हकलाए. लेकिन ऐसे सारे केसेज में नहीं होते. कुछ बच्चों में अन्य कारणों से भी हकलाने की समस्या शुरू हो सकती है. अगर बच्चे के दिमाग में कहीं चोट लग गई है, उसे कभी दौरा आया हो या सिर में दर्द रहता है तो इन सबसे भी दिमाग के मोटर कंट्रोल वाले एरिया और बोलने वाले अंगों के बीच कॉर्डिनेशन में बाधा आ सकती है. इसलिए पहले यह तय करना होता है कि हकलाने की असल वजह क्या है.
कब माता पिता को ध्यान देने की जरूरत हैडॉ. अनिसा गोयल के मुताबिक 2-3 साल के बच्चे में ही हकलाने की शुरुआत हो जाती है. 2 साल से पहले बच्चा एक या दो शब्द को जोड़ना शुरू करता है. 2 साल के बाद 3-4 शब्दों को एक साथ जोड़ना शुरू करते हैं. इसलिए यही कॉमन एज है जिसमें बच्चे में हकलाने की समस्या शुरू होती है. यदि पैरेंट को ऐसा लग रहा है कि बच्चा शब्दों को बोलने में जूझ रहा है. परेशान हो रहा है, बोलने से बच रहा है या शर्मा रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि हकलाना कम नहीं हो रहा है बल्कि बढ़ रहा है तो तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए. यदि हकलाना समय के साथ बढ़ रही है. 2 साल में जितना था उससे ज्यादा हो गया है. उसकी वजह से मानसिक समस्याएं हो रही है. दूसरे से बोलने में परेशानी हो रही है तो डॉक्टर से दिखाना चाहिए.
क्या हकलाने का इलाज हैहां, इस बीमारी का पूरी तरह से इलाज है. यदि 5 साल से पहले बच्चे का इलाज करा लिया जाए तो हकलाने की समस्या पूरी तरह से ठीक हो सकती है. इसके लिए स्पीच थैरेपिस्ट से दिखाना होता है लेकिन इससे पहले बच्चे का चेक-अप कराना होगा.
किस डॉक्टर से दिखाएंडॉ. अनिसा गोयल बताती हैं कि इस बीमारी के लिए पहले बच्चे के दिमाग के डॉक्टर के पास जाना चाहिए. यानी आपको पहले पैडिएट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाना पड़ेगा. कई बार हकलाने की समस्या का कारण अलग होता है. इसलिए न्यूरोलॉजिस्ट पहले पूरी तरह से चैक करेंगे कि इसकी असल वजह क्या है. जब यह कंफर्म हो जाएगा कि यह मोटर कंट्रोल की गड़बड़ी है तो आपको इलाज के लिए स्पीच थैरेपिस्ट के पास भेज देंगे. वहां कुछ महीनों में यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाएगी. इसका कोई और इलाज नहीं है.
कब यह बीमारी आजीवन बन जातीडॉ. अनिसा गोयल कहती हैं कि 2 से 4 साल के बच्चों में हकलाने की समस्या का पता चलता है. अगर बच्चा लगातार हकला रहा है तो माता-पिता इसे आसानी से समझ सकते हैं. इस बीच अगर बच्चा लगातार कई महीनों से हकला रहा है तो उसे डॉक्टर के पास जरूर ले जाना चाहिए. अगर 6-7 साल तक बच्चा हकला रहा है और उसका इलाज नहीं हो पाया है तो ऐसे बच्चों में हकलाने की समस्या आजीवन रह सकती है.



