शादी का वादा रहा अधूरा, ब्रज में आज भी कराया जाता है प्रतीकात्मक विवाह

Last Updated:October 25, 2026, 10:52 IST
love story of Mahabharat hero Barbarik and Jhanjhi: ब्रज क्षेत्र में दशहरे से कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाने वाला टेसू-झांझी का त्योहार महाभारत कालीन वीर बर्बरीक और झांझी की अधूरी प्रेम कहानी से जुड़ा है. बर्बरीक ने युद्ध पर जाते समय झांझी से शादी का वादा किया था, लेकिन मां के वचन के कारण उन्होंने श्रीकृष्ण को अपना शीश दान कर दिया. बर्बरीक के बलिदान पर झांझी ने समाधि ले ली. आज भी ब्रज में टेसू को बर्बरीक और झांझी को उनकी प्रेमिका का प्रतीक मानकर दोनों का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है.
धौलपुर: ब्रज क्षेत्र में दशहरे के बाद टेसू-झांझी का पारंपरिक त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. यह त्योहार केवल बच्चों के उत्साह और खुशियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे महाभारत काल से जुड़ी प्रेम की एक ऐसी भावुक कहानी है, जिसे सुनकर आज भी लोग भावविभोर हो जाते हैं. मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में वीर बर्बरीक और झांझी एक-दूसरे से अटूट प्रेम करते थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण उनका मिलन नहीं हो सका. इसी अधूरी प्रेम कहानी को सुखद अंत देने की परंपरा के तहत आज भी टेसू और झांझी का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बर्बरीक महान योद्धा घटोत्कच के पुत्र और पांडव भीम के पौत्र थे. जब कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध की तैयारियां चल रही थीं, तब बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया कि वे युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष का ही साथ देंगे. इसी वचन के साथ जब वे युद्ध क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे, तब मार्ग में उनकी मुलाकात झांझी से हुई. प्रथम दृष्टि में ही दोनों के बीच प्रेम हो गया. बर्बरीक ने झांझी से वादा किया कि वे युद्ध समाप्त होते ही लौटेंगे और उससे विवाह करेंगे. झांझी भी बर्बरीक के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी.
श्रीकृष्ण का शीश दान और अधूरा वादायुद्ध के मैदान में पहुंचकर बर्बरीक ने देखा कि कौरवों की सेना हार की ओर बढ़ रही है. अपने वचन के अनुसार, उन्होंने कौरवों की तरफ से लड़ने का निर्णय लिया. युद्ध के परिणाम को संतुलित करने और धर्म की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया. वीर बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश काटकर अर्पित कर दिया. इस बलिदान के कारण वे झांझी के पास वापस न लौट सके और उनका शादी का वादा अधूरा रह गया.
समाधि और अधूरी प्रेम कथा का अंतजब झांझी को बर्बरीक के शीश दान और बलिदान की सूचना मिली, तो वे अत्यंत दुखी हो गईं. लोककथाओं के अनुसार, झांझी ने नदी के किनारे समाधि ले ली. इस प्रकार दोनों प्रेमियों की जीवन यात्रा अधूरी रह गई.
टेसू-झांझी उत्सव और प्रतीकात्मक विवाह की परंपराइसी पौराणिक मान्यता से ब्रज क्षेत्र में टेसू-झांझी त्योहार की शुरुआत हुई. इस परंपरा में ‘टेसू’ को वीर बर्बरीक का और ‘झांझी’ को उनकी प्रेमिका का प्रतीक माना जाता है. दशहरे से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक ब्रज के विभिन्न क्षेत्रों में यह उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान बच्चे घर-घर जाकर गीत गाते हैं और अनाज व पैसे मांगते हैं. कार्तिक पूर्णिमा के दिन टेसू और झांझी का प्रतीकात्मक विवाह रचाया जाता है, घरों में पकवान बनते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं. यह अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही अधूरी प्रेम कहानी को एक प्रतीकात्मक सुखद अंत प्रदान करती है.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Dhaulpur,Dhaulpur,Rajasthan
First Published :
October 25, 2026, 10:52 IST



