Multilingual Education in Early Grades: चाय बागानों से ओडिशा के जंगलों तक, 21 जनजातीय भाषाओं में कैसे बदल रही है छोटे बच्चों की पढ़ाई?

नई दिल्ली (Multilingual Education in Early Grades). जब बच्चे पहली बार स्कूल की दहलीज पर कदम रखते हैं तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती किताबों की नहीं, बल्कि भाषा की होती है. सोचिए, 5-6 साल का बच्चा जो घर में सिर्फ लोकल बोली या मातृभाषा बोलता है, वह अचानक स्कूल पहुंचकर बिल्कुल अजनबी भाषा सुनता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) से लेकर तमाम बड़े शैक्षणिक संस्थान पढ़ाई की शुरुआत बच्चे की घरेलू भाषा से करने पर जोर दे रहे हैं.
देश के कई हिस्सों में अनोखे प्रयोग चल रहे हैं. ‘लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन’ और टाटा ट्रस्ट्स की ‘टीचिंग लर्निंग प्रैक्टिस सर्वे’ रिपोर्ट ने प्राइमरी एजुकेशन की नई तस्वीर पेश की है. यह 9 राज्यों के 21 जिलों के 1,050 क्लासरूम की मॉनिटरिंग और टीचर्स के साथ बातचीत पर बेस्ड है. इसमें साबित हुआ कि बच्चों की अपनी भाषा को स्कूल में जगह मिलने से उनकी नींव मजबूत होगी. असम के चाय बागानों से ओडिशा के घने जंगलों और छत्तीसगढ़ के बस्तर तक, क्षेत्रीय भाषाओं और जनजातीय बोलियों में किताबें तैयार हो रही हैं.
बस्तर का मॉडल: स्थानीय बोलियों में पढ़ाई से चमकी बच्चों की किस्मत
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर जिले में शिक्षा को लेकर शानदार बदलाव देखने को मिला है. यहां बच्चों की स्थानीय जनजातीय भाषाओं में किताबें तैयार की गईं. इसके तहत लगभग 13 जनजातीय भाषाओं में किताबें, 900 से ज्यादा दिलचस्प स्टोरीटेलिंग सेशन और 57 स्कूल म्यूजियम डेवलप किए गए. इसका जादुई असर यह हुआ कि वहां के बच्चों की साक्षरता में 31%, Numeracy में 25%, वर्ड रीडिंग में 28%, सुनने की समझ में 35% और लिखने की कला में 33% का जबरदस्त सुधार दर्ज किया गया.
‘साइलेंट गैप’: 73% टीचर भाषा जानते हैं, इस्तेमाल सिर्फ 9% करते हैं!
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला और आंखें खोल देने वाला पहलू है कि सर्वे में शामिल 73% शिक्षकों को पता था कि उनके क्लास के बच्चों की घर की भाषा क्या है और वे उसे समझते भी थे. लेकिन जब क्लासरूम में पढ़ाने की बारी आई तो नियमित रूप से उस स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करने वाले शिक्षक केवल 9% ही निकले. यह बहुत बड़ा Implementation Gap है. लगभग हर चौथा बच्चा स्कूल की भाषा न समझ पाने के कारण क्लास में चुपचाप बैठा रहता है.
ओडिशा से असम तक: 21 जनजातीय भाषाओं में ढल रही ‘बालवाटिका’
मातृभाषा आधारित शिक्षा (Multilingual Education) को बढ़ावा देने के लिए देश के अन्य राज्य भी पीछे नहीं हैं. ओडिशा सरकार ने पारंपरिक ‘बालवाटिका’ की सामग्री को 21 अलग-अलग जनजातीय भाषाओं में ढालकर मिसाल पेश की है. इसे राज्य के 200 स्कूलों में लागू करने की मंजूरी भी दे दी है. वहीं दूसरी तरफ, असम में चाय-बागान समुदायों के बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए खास द्विभाषी वर्कबुक और क्लासरूम भाषा सर्वे तैयार किए गए हैं. इससे वे पढ़ाई से कटा हुआ महसूस नहीं करेंगे.
राजस्थान और त्रिपुरा के नए भाषाई प्रयोग
राजस्थान के 33 जिलों में बच्चों की घरेलू भाषा और स्कूल के माध्यम के बीच की खाई पाटने के लिए ‘लैंग्वेज मैपिंग’ का काम किया गया है. इससे यह समझने में आसानी हुई है कि किस क्षेत्र के बच्चों को किस विशेष भाषाई सपोर्ट की जरूरत है. इसी तरह, त्रिपुरा ने एक कदम आगे बढ़कर शिक्षकों के लिए विशेष रूप से मल्टीलिंगुअल और मल्टीग्रेड सर्टिफाइड ट्रेनिंग प्रोग्राम डिजाइन किया है. इससे राज्य के लगभग 3,000 शिक्षक ट्रेनिंग लेकर बच्चों को उनकी ही बोलियों में सहजता से पढ़ा रहे हैं.
झारखंड का ‘पलाश’ प्रोजेक्ट: हजारों नौनिहालों के लिए उम्मीद की नई किरण
झारखंड में भाषाई विविधता को पाटने के लिए चलाए गए ‘पलाश एमएलए’ (PALASH MLE) प्रोग्राम ने शिक्षा के क्षेत्र में नई लकीर खींची है. इस कार्यक्रम के तहत लगभग 1,000 स्कूलों के 22,600 से अधिक बच्चों तक सीधी पहुंच बनाई गई. साथ ही 1 हजार से ज्यादा टीचर्स को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया. जब बच्चों को अपनी ही भाषा में गिनती और अक्षर पहचानने का मौका मिला तो स्कूल के प्रति उनका डर और झिझक बिल्कुल गायब हो गई.



