जेन जी लड़कियां कम उम्र में हो रही हैं PCOS बीमारी का शिकार, पटना की डॉक्टर ने बताया बचाव

पटना: बदलती लाइफस्टाइल ने लड़कियों और महिलाओं की सेहत से जुड़ी कई परेशानियों को बढ़ा दिया है. इन्हीं में से एक है पीसीओएस (PCOS) यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे एक्सपर्ट अब पीमॉस यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम के नाम से भी संबोधित कर रहे हैं. खास बात यह है कि इसके लक्षण कई बार किशोरावस्था से ही दिखाई देने लगते हैं. माहवारी शुरू होने के बाद हार्मोनल बदलाव के दौर में अनियमित पीरियड्स, मुंहासे, शरीर पर ज्यादा बाल और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं.
पटना स्थित जय प्रभा मेदांता सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में ओबीएस एंड गायनी विभाग के डायरेक्टर डॉ. मीना सामंत ने लोकल 18 को बताया कि आज जागरूकता बढ़ने के कारण ऐसी समस्याओं को लेकर लड़कियां और परिवार पहले की तुलना में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. हालांकि, किशोरावस्था में दिखाई देने वाले हर लक्षण को तुरंत पीसीओएस मान लेना भी सही नहीं है.
किशोरावस्था से क्यों दिखने लगते हैं लक्षण?डॉ. मीना सामंत बताती हैं कि जब लड़कियों में माहवारी शुरू होती है, उसी दौर में शरीर में प्रजनन से जुड़े हार्मोन बनने और सक्रिय होने लगते हैं. इसी समय हार्मोन में असंतुलन से जुड़े पीसीओएस के शुरुआती लक्षण दिखाई दे सकते हैं. पीसीओएस के पीछे केवल एक वजह नहीं होती. कुछ लड़कियों में इसके लक्षण कम उम्र में ही नजर आने लगते हैं.
हालांकि, एक्सपर्ट के अनुसार, माहवारी शुरू होने के तुरंत बाद पीसीओएस का पक्का निदान करने में सावधानी जरूरी है. किशोरावस्था में प्रजनन तंत्र अभी पूरी तरह मेच्योर नहीं हुआ होता. इसलिए डॉक्टर आमतौर पर माहवारी शुरू होने के करीब छह से आठ साल बाद स्थिति का आकलन कर इलाज करते हैं.
फास्ट फूड और स्क्रीन टाइम बढ़ा रहे परेशानी?डॉ. मीना सामंत के मुताबिक, आज की लाइफस्टाइल में बड़ा बदलाव आया है. फास्ट फूड की ओर बढ़ता रुझान, लंबे समय तक टीवी या मोबाइल की स्क्रीन के सामने बैठे रहना और फिजिकल एक्टिविटीज कम होना इसका हिस्सा है. इन कारणों से वजन बढ़ सकता है और शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या बढ़ सकती है. इसका असर हार्मोन पर पड़ता है और सामान्य मासिक चक्र प्रभावित हो सकता है.
ऐसी स्थिति में अंडे का सामान्य तरीके से मैच्योर होना और ओवुलेशन प्रभावित हो सकता है. नतीजा यह होता है कि कई लड़कियों के पीरियड्स लंबे अंतराल तक नहीं आते. जब आते हैं तो सामान्य से ज्यादा लंबे समय तक चल सकते हैं.
सिर्फ अनियमित पीरियड्स ही संकेत नहींपीसीओएस को केवल पीरियड्स की समस्या समझना सही नहीं है. इसके साथ कई दूसरे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. इसमें वजन बढ़ना या मोटापा, चेहरे और शरीर पर जरूरत से ज्यादा बाल आना, मुंहासे बढ़ना, सिर के बाल कम होना, लंबे समय तक पीरियड्स न आना और पीरियड्स आने पर ज्यादा दिनों तक बने रहना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.
डॉ. मीना सामंत के अनुसार, शरीर में एंड्रोजेन यानी पुरुष हार्मोन का लेवल बढ़ने पर इनमें से कई समस्याएं दिखाई दे सकती हैं. इंसुलिन रेजिस्टेंस, ओवुलेशन में गड़बड़ी और हार्मोनल बदलाव मिलकर इन लक्षणों को बढ़ा सकते हैं.
बचाव का सबसे बड़ा हथियार है लाइफस्टाइलपीसीओएस से निपटने के लिए लाइफस्टाइल में सुधार बेहद महत्वपूर्ण है. एक्सपर्ट के मुताबिक, नियमित शारीरिक गतिविधि को दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए. व्यायाम, योग या ऐसी कोई भी गतिविधि की जा सकती है जिससे शरीर सक्रिय रहे.
खाने-पीने पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है. डाइट में फाइबर वाली चीजों को शामिल करना, नियमित समय पर भोजन करना और फास्ट फूड से दूरी बनाना मददगार हो सकता है. इसके साथ ही ज्यादा चीनी और फैट वाले भोजन को कम करने की सलाह दी जाती है. वजन को कंट्रोल में रखना भी बेहद जरूरी है. खासकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इंसुलिन रेजिस्टेंस से इसका संबंध हो सकता है.
हर मरीज का अलग-अलग इलाजपीसीओएस का इलाज किसी एक दवा या एक तरीके से नहीं होता. डॉक्टर मरीज के लक्षण और उसकी जरूरत के आधार पर उपचार तय करते हैं. डॉ. मीना सामंत बताती हैं कि अगर किसी लड़की को लंबे समय तक पीरियड्स नहीं होते हैं तो हार्मोनल संतुलन बनाए रखने के लिए उपचार दिया जा सकता है. उनके अनुसार, सामान्य स्वास्थ्य के लिए साल में कम से कम चार से छह बार पीरियड्स आना जरूरी माना जाता है और जरूरत पड़ने पर इसके लिए इलाज किया जाता है.
अगर एंड्रोजेन बढ़ने की वजह से चेहरे पर मुंहासे, शरीर पर अतिरिक्त बाल या सिर के बाल कम होने जैसी समस्या है, तो डॉक्टर एंड्रोजेन कम करने वाली दवाएं दे सकते हैं. जिन महिलाओं को गर्भधारण करने में परेशानी होती है, उनके लिए ओवुलेशन बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसके अलावा इंसुलिन रेजिस्टेंस को कंट्रोल करने के लिए वजन कम करने पर विशेष जोर दिया जाता है. जरूरत के अनुसार डॉक्टर इंसुलिन सेंसिटाइजर्स जैसी दवाओं का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
बिहार में भी कम उम्र की मरीज पहुंच रही हैं डॉक्टरों के पासडॉ. मीना सामंत के मुताबिक, मेदांता पटना में आने वाले मरीज सामान्य आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते, क्योंकि यहां मुख्य रूप से समस्या होने पर ही लोग इलाज के लिए पहुंचते हैं. फिर भी उनके अनुभव में युवा उम्र की करीब 15 से 20 प्रतिशत मरीज पीसीओएस या पीमॉस जैसी समस्या वाली हो सकती हैं. उन्होंने बताया कि उम्र के दूसरे वर्गों को भी शामिल किया जाए तो ऐसी मरीजों की संख्या और अधिक नजर आती है. यहां तक कि एक सुबह में ही उन्होंने पांच-छह ऐसी मरीजों को देखा, जिनमें पीसीओएस या उससे जुड़ी समस्या थी.



