AC भी फेल… गर्मी से बचाने का अनोखा तरीका! खस की खुशबू और चंदन से सजाए गए ठाकुर जी, दर्शन से ही मिल रही राहत

Last Updated:May 05, 2026, 10:54 IST
Karauli Hindi News: भीषण गर्मी के बीच धर्मनगरी के मंदिरों में ठाकुर जी को ठंडक पहुंचाने के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं. मंदिरों में खस की टटिया लगाई गई हैं, जिनसे ठंडी हवा का प्रवाह बना रहता है और वातावरण सुहाना हो जाता है. इसके साथ ही भगवान के विग्रह पर चंदन का लेपन कर विशेष शृंगार किया जा रहा है, जिससे उन्हें शीतलता प्रदान की जाती है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और गर्मी के मौसम में खास महत्व रखती है. मंदिरों में आने वाले भक्त भी इस शीतल वातावरण का अनुभव करते हैं और उन्हें मानसिक शांति मिलती है. मनमोहक शृंगार और भक्ति का यह संगम लोगों को आकर्षित कर रहा है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जैसे इंसानों को गर्मी में ठंडक की आवश्यकता होती है, वैसे ही ठाकुर जी को भी शीतलता प्रदान करना सेवा का एक अहम हिस्सा माना जाता है. इसी भावना के चलते यहां हर मंदिर में गर्मी के मौसम में विशेष इंतजाम किए जाते हैं.
जल फव्वारों की ठंडक : करौली के मंदिरों के बाहर लगाए गए फव्वारों से लगातार पानी की फुहारें निकलती रहती हैं, जो वातावरण को ठंडा बनाए रखती हैं. इन फुहारों से गर्भगृह के आसपास का तापमान कम होता है, जिससे ठाकुर जी को ठंडी तासीर मिलती है.
भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए जहां आमजन तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं, वहीं धार्मिक नगरी करौली में भगवान को भी उसी तरह ठंडक पहुंचाने की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है. यहां गर्मी शुरू होते ही मंदिरों में एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है जिसमें ठाकुर जी के लिए शीतल जल के फव्वारे और खस की ठंडी खुशबू से महकता वातावरण गर्भग्रह में उपलब्ध कराया जाता है.
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धार्मिक नगरी करौली में यह व्यवस्था लगभग दो महीने तक चलती है. अक्षय तृतीया से शुरू होकर आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक सभी मंदिरों में फव्वारे लगातार चलते रहते हैं. इसके बाद मौसम में बदलाव के साथ इन्हें बंद कर दिया जाता है.
इस परंपरा की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है. इस दिन से मंदिरों में शीतल जल के फव्वारे चालू कर दिए जाते हैं. श्री राधा गोविंद देव जी पंचायती मंदिर के पुजारी गोपाल गोस्वामी बताते हैं कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि सेवा और श्रद्धा का प्रतीक है.
खस की खुशबू से ठंडक : सिर्फ पानी ही नहीं, बल्कि खस की चादरें भी लगाई जाती हैं. इन पर पानी डाला जाता है, जिससे ठंडी हवा के साथ सुगंधित माहौल बनता है. यह प्राकृतिक कूलर की तरह काम करता है और मंदिर परिसर को शीतल बना देता है.
यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि इसमें छिपा वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी साफ नजर आता है जिसमें पानी और खस के माध्यम से तापमान नियंत्रित किया जाता है.<br />करौली की यह अनोखी परंपरा दर्शाती है कि यहां भगवान को भी परिवार के सदस्य की तरह माना जाता है, जिनकी देखभाल हर मौसम के अनुसार की जाती है.
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