Agriculture: रेगिस्तान में उग रहा सफेद सोना, 4 बीघा में 20 क्विंटल पैदावार, जानें खेती का तरीका

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रेगिस्तान की धरती उगल रही सफेद सोना, 4 बीघा से 20 क्विंटल पैदावार, जानें तरीका
Last Updated:October 30, 2026, 07:26 IST
Bikaner Cotton Farming: रेगिस्तान की तपती धरती पर सफेद सोने की खेती किसानों के लिए कमाई का जरिया बन रही है. बीकानेर के खेतों में इन दिनों कपास यानी नरमा की फसल तैयार है और किसान रुई की चुनाई में व्यस्त हैं. कई वर्षों से नरमा की खेती कर रहे किसान ओमप्रकाश गोदारा ने चार बीघा जमीन में करीब 20 क्विंटल उत्पादन की उम्मीद जताई है. उनका कहना है कि नरमा की खेती में अच्छी पैदावार मिलने पर किसानों को फायदा हो सकता है. इसकी बुवाई मई-जून में होती है, जबकि अक्टूबर से फसल की चुनाई शुरू हो जाती है. रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी की कमी को देखते हुए किसान आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपना रहे हैं. फव्वारा और ड्रिप सिंचाई से पानी का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिलती है. कपास से मिलने वाला प्राकृतिक रेशा कपड़ा उद्योग में इस्तेमाल होता है. हालांकि, किसानों की वास्तविक कमाई फसल की गुणवत्ता, बाजार भाव और खेती की लागत पर निर्भर करती है.
बीकानेर. राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में खेती करना आसान नहीं है. कम बारिश और गर्म जलवायु के बीच किसान अपनी मेहनत और तकनीक के दम पर अच्छी पैदावार हासिल कर रहे हैं. यहां कपास यानी नरमा की खेती किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण जरिया बन रही है. कपास से निकलने वाले सफेद रेशे को सफेद सोना भी कहा जाता है. इन दिनों बीकानेर के खेतों में नरमा की फसल पककर तैयार हो चुकी है. किसान और मजदूर मिलकर पौधों से रुई निकालने में जुटे हैं.
खेतों में कहीं किसान खुद नरमा चुन रहे हैं तो कहीं मजदूरों की टोली फसल एकत्रित करने में लगी है. किसान ओमप्रकाश गोदारा ने बताया कि उन्होंने चार बीघा जमीन में नरमा की खेती की है. इससे करीब 20 क्विंटल नरमा उत्पादन होने का अनुमान है. उनके अनुसार एक बीघा में औसतन चार से पांच क्विंटल तक नरमा निकल जाता है. हालांकि, खेती से होने वाला मुनाफा काफी हद तक बाजार में मिलने वाले भाव पर निर्भर करता है. भाव अच्छे मिलें तो किसानों को बेहतर आमदनी होती है.
मई-जून में शुरू होता है कपास की खेती का चक्र
गोदारा पिछले कई वर्षों से नरमा की खेती कर रहे हैं. उनका कहना है कि दूसरी फसलों की तुलना में नरमा की पैदावार अच्छी मानी जाती है. यही वजह है कि किसान लगातार इस फसल की खेती में रुचि ले रहे हैं. हालांकि, मौसम, सिंचाई, उत्पादन लागत और बाजार भाव भी खेती के फायदे को प्रभावित करते हैं. वे बताते है कि नरमा की खेती का चक्र मई-जून में शुरू होता है. इस दौरान किसान खेत तैयार कर बीज की बुवाई करते हैं. फसल की उचित देखभाल और सिंचाई के बाद अक्टूबर में नरमा चुनने का काम शुरू हो जाता है. इन दिनों खेतों में फसल से रुई निकालने का काम चल रहा है. किसान और मजदूर मिलकर पौधों पर लगे कपास को चुनते हैं और उसे एकत्रित करते हैं. इसके बाद इसे बाजार में बेचने के लिए तैयार किया जाता है.
समय के साथ खेती के तरीकों में भी आया बदलाव
उन्होंने बताया कि समय के साथ खेती के तरीकों में भी बदलाव आया है. किसान अब पानी का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए फव्वारा और बूंद-बूंद सिंचाई जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं. नरमा की खेती में सिंचाई का विशेष महत्व है. पानी का उचित प्रबंधन करने से फसल की देखभाल में मदद मिलती है. हालांकि, उत्पादन और गुणवत्ता पर मिट्टी, मौसम तथा कृषि प्रबंधन का भी असर पड़ता है. गोदारा बताते हैं कि कपास को सफेद सोना इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इससे कपड़ा उद्योग के लिए प्राकृतिक रेशा मिलता है. यह किसानों के लिए नकदी फसल है और इसकी बिक्री से उन्हें आमदनी होती है. कई बार अच्छे बाजार भाव मिलने पर किसानों को बेहतर मुनाफा मिलता है, जबकि भाव कम होने या लागत बढ़ने पर कमाई प्रभावित हो सकती है.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Bikaner,Rajasthan
First Published :
October 30, 2026, 07:26 IST



