राजस्थान में सदियों पुरानी परंपरा कायम, मिट्टी-गोबर लेप और चूल्हा पोतन से मिलती नैचुरल कूलिंग

सदियों पुरानी परंपरा कायम, मिट्टी-गोबर लेप से मिलती है नैचुरल कूलिंग
Desi Chulha Tradition: भरतपुर के गांवों में आज भी पारंपरिक जीवनशैली पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है. यहां महिलाएं चूल्हे पर भोजन बनाकर उसे मिट्टी से पोतती हैं, जिसे स्वच्छता और कीटाणुनाशक माना जाता है. साथ ही घरों की दीवारों और आंगन को गोबर और मिट्टी के गारे से लीपने की परंपरा भी जारी है. ग्रामीणों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल घर को साफ रखती है, बल्कि गर्मियों में प्राकृतिक ठंडक भी प्रदान करती है. महिलाएं सप्ताह में दो से तीन बार यह कार्य करती हैं, जिससे घर का वातावरण स्वच्छ और संतुलित बना रहता है. यह परंपरा पर्यावरण के अनुकूल है और किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलाती. आधुनिक साधनों के दौर में भी भरतपुर के गांवों में यह देसी तकनीक स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम बनी हुई है.




