Darjeeling Hill row Explained: क्या है बंगाल का दार्जिलिंग हिल का मुद्दा? जिस पर अमित शाह ने बनाया स्थायी समाधान का प्लान

समिति का काम सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं रहेगा. उसे संभावित अंतिम समझौते का मसौदा तैयार करने, उसके तौर-तरीके तय करने और समाधान को लागू करने का स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.
इस कदम को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों में गोरखा समुदाय से जुड़े मुद्दे पिछले कई दशकों से राजनीतिक अस्थिरता का कारण रहे हैं.
बैठक में गोरखा समुदाय की अलग पहचान और राजनीतिक मान्यता को प्रमुख मुद्दों के तौर पर रखा गया. केंद्र सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि संवैधानिक व्यवस्था के भीतर रहते हुए पहाड़ी क्षेत्रों को अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता देने या किसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्था की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है.
हालांकि, इसका अंतिम स्वरूप हाईलेवल कमेटी की बातचीत और सिफारिशों के बाद ही सामने आएगा.
अमित शाह ने यह भी भरोसा दिया कि उत्तर बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षों से लंबित इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास संबंधी कमियों को दूर करने के लिए केंद्र पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएगा.
बैठक में गोरखा समुदाय की कई पुरानी मांगों पर भी चर्चा हुई. इनमें खास तौर पर 11 वंचित गोरखा समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग शामिल है. ST दर्जा मिलने से इन समुदायों को आरक्षण और संवैधानिक संरक्षण जैसे लाभ हासिल हो सकते हैं. इसके अलावा गोरखा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया गया.
सुकना में हुई बैठक को इस लिहाज से भी अहम माना जा रहा है कि इसमें केंद्र, राज्य और पहाड़ी क्षेत्र के विभिन्न राजनीतिक पक्षों के प्रतिनिधि एक साथ मौजूद रहे.
बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, दार्जिलिंग के सांसद राजू बिष्ट, राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के प्रमुख बिमल गुरुंग और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के अध्यक्ष मन घीसिंग समेत कई प्रमुख नेता शामिल हुए.
अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं की मौजूदगी को लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे पर संभावित सहमति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और आसपास के पहाड़ी इलाकों में रहने वाली बड़ी आबादी लंबे समय से अपनी अलग गोरखा पहचान, भाषा, संस्कृति और राजनीतिक अधिकारों को लेकर आवाज उठाती रही है.
गोरखालैंड की मांग का तर्क यह रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई परिस्थितियां पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों से अलग हैं. आंदोलन से जुड़े नेताओं का आरोप रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों को लंबे समय तक राजनीतिक और आर्थिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा.
अलग राज्य गोरखालैंड की मांग 1980 के दशक में बड़े आंदोलन और हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आई थी. इसके बाद 2007 और 2017 में भी बड़े आंदोलन हुए.
गोरखालैंड की मांग को शांत करने के लिए पहले भी कई प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनाई गईं. 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया. बाद में 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) अस्तित्व में आया.
हालांकि, पहाड़ी क्षेत्र के कई नेता इन व्यवस्थाओं को पर्याप्त अधिकार नहीं मिलने के कारण प्रभावी नहीं मानते. उनका आरोप रहा है कि प्रशासनिक संस्थाएं आर्थिक और राजनीतिक रूप से कोलकाता पर निर्भर हैं और इनके जरिए पहाड़ी लोगों की मूल मांगों का समाधान नहीं हुआ.
गोरखा पहचान का सवाल सिर्फ राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है. पहाड़ी इलाकों में चाय बागान, पर्यटन, रोजगार, जमीन के अधिकार और मजदूरों की स्थिति भी लंबे समय से बड़े मुद्दे हैं.
कई चाय बागानों के बंद होने, मजदूरी और रोजगार से जुड़ी समस्याओं तथा भूमि अधिकारों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर असंतोष रहा है. इसके अलावा नेपाली भाषा और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं.
अब केंद्र की ओर से स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए हाईलेवल कमेटी बनाए जाने के बाद उम्मीद जगी है कि दशकों पुराने इस विवाद को सिर्फ चुनावी वादों के बजाय संवैधानिक और प्रशासनिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है. हालांकि, असली परीक्षा कमेटी की सिफारिशों और उन्हें लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की होगी.



