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Last Updated:June 24, 2026, 10:21 IST

Dhaulpur Mughal Garden Charbagh : धौलपुर का ऐतिहासिक मुगल गार्डन, बाबर द्वारा 1527 में विकसित चारबाग शैली का पहला मुगल गार्डन है. लेकिन अब यह ज्यादातर खंडहर हो गया है. लोग इसके संरक्षण की मांग कर रहे हैं. 25 अगस्त 1527 को बाबर ने दोबारा धौलपुर का दौरा किया. तब तक यहां एक शाही स्नानागार और गर्म पानी का हॉल बनकर तैयार हो चुका था. इसी परिसर में कमल के फूल की आकृति वाला एक अनूठा तालाब भी बनाया गया, जो आज लोटस गार्डन के नाम से प्रसिद्ध है. इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि बाबर ने 15 जनवरी 1528 को इस स्थान का अंतिम दौरा किया था.

धौलपुर. राजस्थान के पूर्वी छोर पर स्थित धौलपुर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों और प्राचीन विरासत के लिए जाना जाता है. इन्हीं धरोहरों में एक है धौलपुर का प्रसिद्ध मुगल गार्डन, जिसे आज कई लोग लोटस गार्डन के नाम से जानते हैं. यह स्थान न केवल धौलपुर, बल्कि पूरे भारत के इतिहास में विशेष महत्व रखता है.

इतिहासकार अरविंद शर्मा ने बताया कि खानवा के युद्ध के बाद मुगल सम्राट बाबर पहली बार वर्ष 1527 में धौलपुर आए थे. उस समय धौलपुर राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र था. ग्वालियर और बयाना की ओर जाने वाले मार्ग धौलपुर से होकर गुजरते थे, इसलिए मुगल शासकों की नजर इस क्षेत्र पर बनी रहती थी.

मुगल गार्डन की स्थापना की कहानीधौलपुर प्रवास के दौरान बाबर सिकंदर लोदी के बांध के पास रुके थे. बाबर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक तुजुक-ए-बाबरी में इस स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यहां उन्हें एक सुंदर चट्टानी क्षेत्र दिखाई दिया. उन्होंने अपने शिल्पकार उस्ताद शाह मोहम्मद को यहां एक किला बनाने का आदेश दिया था. हालांकि जमीन की ऊंचाई कम होने के कारण वहां किले का निर्माण संभव नहीं हो सका. इसके बाद बाबर ने इस स्थान पर एक भव्य शाही उद्यान और तालाब बनाने का निर्णय लिया. मध्य एशियाई स्थापत्य शैली के आधार पर यहां भारत का पहला मुगल गार्डन विकसित किया गया. इस बगीचे में प्रसिद्ध चारबाग पद्धति का उपयोग किया गया था, जिसमें पूरे क्षेत्र को चार भागों में विभाजित कर जल प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की जाती थी. एक ही स्रोत से पानी चारों दिशाओं में पहुंचता था, जो उस समय की उन्नत इंजीनियरिंग का शानदार उदाहरण माना जाता है.

लोटस गार्डन के नाम से मिली पहचान25 अगस्त 1527 को बाबर ने दोबारा धौलपुर का दौरा किया. तब तक यहां एक शाही स्नानागार और गर्म पानी का हॉल बनकर तैयार हो चुका था. इसी परिसर में कमल के फूल की आकृति वाला एक अनूठा तालाब भी बनाया गया, जो आज लोटस गार्डन के नाम से प्रसिद्ध है. इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि बाबर ने 15 जनवरी 1528 को इस स्थान का अंतिम दौरा किया था. इसके बाद यह स्थान मुगल गार्डन के रूप में प्रसिद्ध हो गया. बाबर के शासनकाल में इसकी पहचान पूरे भारत में थी, लेकिन उनके निधन के बाद मुगल साम्राज्य की अस्थिरता के कारण इस उद्यान का विकास रुक गया. वर्ष 1978 में भारत में अमेरिकी राजदूत की पत्नी लेडी मोनियन के प्रयासों से यहां पुरातात्विक खुदाई कराई गई. खुदाई के दौरान कमल की आकृति वाला ऐतिहासिक तालाब और अन्य अवशेष सामने आए, जिससे इस स्थान का महत्व एक बार फिर चर्चा में आया.

संरक्षण की जरूरत, लोग कर रहे मांगआज इस ऐतिहासिक मुगल गार्डन की अधिकांश संरचनाएं नष्ट हो चुकी हैं. चारबाग पद्धति की जल व्यवस्था, शाही इमारतें और स्नानागार लगभग समाप्त हो चुके हैं. केवल कुछ अवशेष और कमलाकार तालाब के चिन्ह ही यहां दिखाई देते हैं. इस स्थान का उल्लेख बाबर के साथ-साथ उनकी पुत्री गुलबदन बेगम ने अपनी पुस्तक हुमायूंनामा में भी किया है. उन्होंने इस बगीचे को शांति और सुकून देने वाला स्थान बताया था. धौलपुर का यह मुगल गार्डन भारत की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर है. इसके संरक्षण की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां धौलपुर के गौरवशाली इतिहास और मुगलकालीन स्थापत्य कला को करीब से जान सकें. यदि समय रहते इस विरासत को नहीं बचाया गया, तो इतिहास का यह महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए खो सकता है.

About the AuthorAnand Pandey

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें

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