500 बंदूकों का साम्राज्य, करोड़ों की फिरौती और खौफराज; जानिए चंबल के सबसे खूंखार बागियों की कहानी

Last Updated:June 17, 2026, 08:33 IST
Chambal Dacoits History: चंबल के बीहड़ों में दशकों तक राज करने वाले मोहर सिंह गुर्जर, रामबाबू गडरिया, मलखान सिंह, पान सिंह तोमर और निर्भय गुर्जर जैसे बागियों की खौफनाक दास्तान आज भी जीवंत है. 500 डकैतों के गैंग वाले मोहर सिंह से लेकर एथलीट से बागी बने पान सिंह तोमर तक, सभी ने पुलिस को कड़ी चुनौती दी. साल 2005 में आखिरी बड़े डकैत निर्भय गुर्जर के एनकाउंटर के साथ ही चंबल में आतंक के एक बड़े युग का अंत हुआ.
डकैतों की धरती के नाम से मशहूर चंबल के बीहड़ों का इतिहास जितना रोमांचक है, उतना ही खौफनाक भी रहा है क्योंकि जब भी चंबल का नाम लिया जाता है तो लोगों के जेहन में सबसे पहले बंदूक थामे डकैतों की तस्वीर उभरती है. एक समय ऐसा था जब इन बागियों के नाम से गांवों में सन्नाटा छा जाता था और पुलिस तक उनके इलाके में जाने से कतराती थी क्योंकि चंबल की घाटियों में कई ऐसे डकैत हुए जिनका आतंक दशकों तक कायम रहा.
1960 और 70 के दशक में चंबल के बीहड़ों के सबसे खतरनाक डकैतों में शुमार मोहर सिंह गुर्जर ने वर्ष 1965 में माधव सिंह के साथ मिलकर करीब 500 सदस्यों का एक बड़ा गिरोह बनाया था. उस पर 80 से अधिक हत्याओं और 350 से ज्यादा डकैती, लूट व अपहरण के मामले दर्ज थे, जिसके चलते पुलिस ने उसके सिर पर 12 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित कर रखा था, लेकिन आखिरकार वर्ष 1972 में मोहर सिंह ने अपने साथियों सहित आत्मसमर्पण कर दिया.
इसके बाद चंबल के बीहड़ों में रामबाबू गडरिया का नाम तेजी से उभरा जिसके गिरोह में 80 से अधिक डकैत शामिल थे. वर्ष 1997 के बाद उसके गैंग ने कई अपहरणों को अंजाम देकर करोड़ों रुपये की फिरौती वसूली थी, जिसके कारण पुलिस ने रामबाबू और उसके परिवार पर कुल 15 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था, लेकिन आखिरकार वर्ष 2007 में एक पुलिस मुठभेड़ में उसका अंत हो गया.
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चंबल के चर्चित डकैतों में प्रमुख मलखान सिंह का करीब छह फीट लंबे कद, बड़ी मूंछों और खाकी वर्दी में एक अलग ही रौब था. उसके गिरोह पर 35 पुलिसकर्मियों सहित कुल 175 हत्याओं के आरोप लगे थे, लेकिन इसके बावजूद मलखान सिंह की छवि अन्य डकैतों से अलग मानी जाती रही और आखिरकार 1980 के दशक में उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया.
पूर्व राष्ट्रीय एथलीट पान सिंह तोमर की कहानी सबसे अलग रही क्योंकि जमीन विवाद और परिवार पर हुए हमलों के बाद वह बागी बन गया था. उसने चंबल के बीहड़ों का रुख किया और जल्द ही पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया, जिसके बाद वर्ष 1981 में एक पुलिस अभियान के दौरान वह मारा गया.
करीब 15 वर्षों तक अपना दबदबा कायम रखने वाले निर्भय सिंह गुर्जर को चंबल का आखिरी बड़ा डकैत माना जाता है, जिस पर हत्या, अपहरण और डकैती के 100 से अधिक मामले दर्ज थे. वर्ष 2005 में पुलिस ने एक विशेष अभियान चलाकर उसे मुठभेड़ में मार गिराया और उसके खात्मे के साथ ही चंबल में डकैतों के एक बड़े दौर का भी अंत माना जाता है.
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