Famous Temple: 800 साल पुराना मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर, जहां ऋषि मार्कण्डेय ने की थी तपस्या, जुड़ी है अनोखी मान्यता

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800 साल पुराना मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर, जहां ऋषि मार्कण्डेय ने की थी तपस्या
Last Updated:August 17, 2026, 07:17 IST
Sirohi Famous Markundeshwar Mahadev Temple: राजस्थान के सिरोही जिले में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित निचलागढ़ का प्राचीन मारकुंडेश्वर महादेव मंदिर इतिहास, आस्था और प्राकृतिक खूबसूरती का अनोखा संगम है. करीब 800 साल पुराने इस शिवालय को लेकर मान्यता है कि ऋषि मार्कण्डेय ने यहां तपस्या की थी. गुफा में बने मंदिर में प्राचीन प्रतिमाएं, शिलालेख और ऐतिहासिक अवशेष आज भी मौजूद हैं. मंदिर परिसर में बना जलकुंड भी श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है. गाय के मुख की आकृति से निकलने वाली जलधारा पहाड़ों से आती है और मान्यता है कि यह जल कभी नहीं सूखता. भक्त इसे गंगा के समान पवित्र मानते हैं और चर्म रोग समेत कई तकलीफों में लाभकारी मानकर इसका पानी ग्रहण करते हैं. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु यहां तांबे के नाग भी चढ़ाते हैं. मंदिर की देखरेख और महाशिवरात्रि मेले का आयोजन जनजाति समुदाय करता है.
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सिरोही: श्रावण मास में जिले के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ बढ़ रही है. वैसे तो जिले में कई प्राचीन शिवालय बने हुए हैं, लेकिन सिरोही जिले के निचलागढ़ गांव में करीब 800 वर्ष पुराना शिव मंदिर जनजाति समुदाय में भी आस्था का केंद्र है. मान्यता है कि यहां बाल ऋषि मार्कण्डेय ने तपस्या की थी. इसी वजह से मंदिर का नाम मारकुंडेश्वर हो गया. इस स्थान के अलावा जिले के अजारी गांव और पाली जिले में भी मार्कण्डेय ऋषि के तपस्या करने की मान्यताएं है. इन स्थानों पर भी मारकंडेश्वर महादेव मंदिर बने हुए है. श्रावण मास में इस मंदिर में दर्शन के लिए कई भक्त पहुंचते हैं.
आबूरोड शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर बसे निचलागढ़ गांव के इस मंदिर की खास बात ये है कि यह मंदिर अरावली की पहाड़ी में बनी एक गुफा में बना हुआ है. मंदिर के पुजारी मंगल महाराज ने बताया कि यह स्थान मार्कण्डेय ऋषि की तपोस्थली है. यहां एक प्राचीन शिलालेख और पुरानी शिव, पार्वती समेत अन्य प्रतिमाएं भी है. जो इस मंदिर के इतिहास को बताता है. मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था. इसके बाद समय समय पर जीर्णोद्धार करवाया गया.
जनजाति समाज करता है मंदिर का संचालन
निचलागढ़ गांव गरासिया जनजाति बहुल इलाका है और आसपास जनजाति बहुल गांव भी है. इस वजह से जनजाति के लोगों में भी इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है. मंदिर की संचालन समिति और पूजा पाठ का काम भी जनजाति के लोग ही संभालते हैं. यहां महाशिवरात्रि को लगने वाले विशाल मेले की जिम्मेदारी भी जनजाति समुदाय ही संभालता है.
जलकुंड के पानी से ठीक होती है कई तकलीफें
मंदिर परिसर में एक प्राचीन जलकुंड भी बना हुआ है. जिसमें गाय के मुख की आकृति की प्रतिमा से निरंतर जलधारा बहती है, जो आसपास के पहाड़ों से आती है. इस कुंड का पानी, गर्मी हो या कोई और मौसम, ये पानी कभी नहीं सूखता है. मान्यता है कि इसके पानी को गंगा जितना पवित्र माना जाता है. भक्तों का ये भी मानना है कि इस कुंड के पानी से चर्म रोग समेत कई तकलीफें ठीक होती है. भक्त यहां मन्नत पूरी होने पर तांबे के नाग चढ़ाते है. मंदिर परिसर में कई धातु के नाग देखने को मिलते हैं.
About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Sirohi,Rajasthan
First Published :
August 17, 2026, 07:17 IST
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.



