बचपन में ही चल बसे मां-बाप, झाड़ू-पोछा करते-करते सीखी गायकी, पूरे देश को बनाया अपनी आवाज का दीवाना

Last Updated:August 08, 2026, 04:01 IST
मशहूर गायिका सिद्धेश्वरी देवी की आवाज में दर्द, प्यार और भावनाओं की ऐसी गहराई होती थी कि सुनने वाला खुद को उस संगीत से जुड़ा हुआ महसूस करता था. उन्होंने बचपन में अपने मां-बाप को खो दिया था. गायिका ने घर के काम करते हुए संगीत सीखा था. उन्हें ‘ठुमरी की रानी’ कहा जाता था. उनकी कला का बड़े-बड़े कलाकारों ने सम्मान किया. उनके जीवन से जुड़ा एक चर्चित किस्सा भी है, जब मशहूर गायक केएल सहगल ने खुद मंच पर आकर लोगों से सिद्धेश्वरी देवी को सुनने की अपील की थी.
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नई दिल्ली: दिग्गज गायिका सिद्धेश्वरी देवी का परिवार संगीत से जुड़ा था. उनकी दादी मैना देवी मशहूर गायिका थीं. उनका जन्म 8 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था. बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी राजेश्वरी देवी ने किया. वह भी संगीत की अच्छी जानकार थीं. कहा जाता है कि सिद्धेश्वरी देवी का संगीत की दुनिया में आना भी एक खास घटना से जुड़ा था. शुरुआत में उनकी मौसी की बेटी संगीत सीखती थीं और सिद्धेश्वरी घर के छोटे-मोटे काम करती थीं. एक दिन जब उनकी बहन एक कठिन धुन नहीं गा पाईं तो गुरु पंडित सियाजी महाराज नाराज हो गए. उस समय सिद्धेश्वरी ने वही धुन आसानी से गाकर सबको हैरान कर दिया. उनकी प्रतिभा देखकर पंडित सियाजी महाराज ने उन्हें संगीत की शिक्षा देने का फैसला किया.
पंडित बड़े रामदास को मानती थीं अपना गुरुसिद्धेश्वरी देवी ने सबसे पहले मशहूर सारंगी वादक पंडित सियाजी महाराज से संगीत सीखा. इसके बाद, उन्होंने उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान जैसे बड़े कलाकारों से भी ट्रेनिंग ली. हालांकि, वह पंडित बड़े रामदास को अपना गुरु मानती थीं. उनकी गायकी में बनारस घराने की मिठास और भावनाओं की गहराई साफ दिखाई देती थी. सिद्धेश्वरी देवी की पहचान सबसे ज्यादा ठुमरी गायिका के रूप में बनी. ठुमरी में शब्दों के साथ भावनाओं को बहुत महत्व दिया जाता है. प्रेम, विरह, भक्ति और जीवन की छोटी-बड़ी भावनाओं को वह अपनी आवाज के जरिए लोगों तक पहुंचाती थीं. इसके अलावा, वह ख्याल, दादरा, कजरी, चैती, होरी और भजन भी गाती थीं.
केएल सहगल जब खुद मंच पर आएसिद्धेश्वरी देवी के करियर से जुड़ा एक बेहद चर्चित किस्सा साल 1930 का है. जब सिद्धेश्वरी देवी लाहौर में प्रस्तुति देने पहुंची थीं, तब वहां लोग मुख्य रूप से मशहूर गायक केएल सहगल को सुनने आए थे. जब मंच से एक युवा गायिका के रूप में सिद्धेश्वरी देवी का नाम घोषित हुआ तो कुछ लोग उन्हें सुनने को लेकर रोमांचित नहीं थे. बताया जाता है कि उस समय केएल सहगल खुद मंच पर आए और उन्होंने दर्शकों से कहा कि वे सिद्धेश्वरी देवी की गायकी जरूर सुनें. इसके बाद लोगों ने शांत होकर उनका कार्यक्रम सुना और उनकी आवाज से प्रभावित हुए. यह किस्सा कई आर्टिकल में मिलता है.
एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने उनसे सीखी थीं भजन गायकी की बारीकियां धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि पूरे देश में फैल गई. उन्होंने राजाओं के दरबारों से लेकर बड़े संगीत समारोहों तक अपनी कला का प्रदर्शन किया. वह ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन से भी जुड़ी रहीं. उनकी गायकी सुनने के लिए लोग देर रात तक बैठकर इंतजार करते थे. दक्षिण भारत की महान गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी उनसे भजन गायकी की बारीकियां सीखी थीं. संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्मश्री से सम्मानित किया. इसी साल उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला. इसके अलावा, उन्हें रविंद्र भारती विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट की उपाधि और विश्व भारती विश्वविद्यालय से ‘देशिकोत्तम’ सम्मान भी दिया गया. जीवन के अंतिम वर्षों में उनका स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा. 1976 में उन्हें लकवा हुआ, जिसके बाद उनकी चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हुई. 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया.
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अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और…
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First Published :
August 08, 2026, 04:01 IST



