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Historic Ashwamedha Yajna | जयपुर की इस बावड़ी में भरा गया था अश्वमेघ यज्ञ का घी

Last Updated:July 01, 2026, 13:50 IST

Historic Ashwamedha Yajna: जयपुर के पुरानी बस्ती स्थित ‘यज्ञशाला की बावड़ी’ में 300 साल पहले महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कलयुग का पहला और संसार का आखिरी अश्वमेघ यज्ञ करवाया था. सवा साल चले इस यज्ञ में 3 करोड़ लोगों ने भोजन किया. घी रखने के लिए बर्तन कम पड़े तो पूरी बावड़ी को घी से भर दिया गया था, जिसे ‘घी की बावड़ी’ भी कहते हैं. यहाँ आज भी प्रधान यज्ञ कुंड, गुफा और 13 संतों की समाधियां मौजूद हैं. यज्ञ के मिट्टी के गणेश जी आज गढ़ गणेश मंदिर में विराजमान हैं.

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Jaipur: राजस्थान की राजधानी जयपुर को अपने वैभवशाली इतिहास, वास्तुकला और ऐतिहासिक मंदिरों के कारण ‘छोटी काशी’ के नाम से जाना जाता है. जयपुर के चारदीवारी बाजार में ऐसे कई प्राचीन मंदिर और स्थल हैं, जो सदियों पुराने भव्य धार्मिक अनुष्ठानों के गवाह रहे हैं. ऐसा ही एक ऐतिहासिक और चमत्कारी स्थल चारदीवारी क्षेत्र के पुरानी बस्ती इलाके में स्थित है, जिसे ‘यज्ञशाला की बावड़ी’ कहा जाता है. यह वह स्थान है जहां आज से लगभग 300 साल पहले संसार का आखिरी अश्वमेघ यज्ञ और कलयुग का पहला अश्वमेघ यज्ञ संपन्न हुआ था. इस ऐतिहासिक यज्ञ से पहले, करीब पांच हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल में पांडवों द्वारा अंतिम बार अश्वमेघ यज्ञ करवाने के प्रमाण मिलते हैं.

स्थानीय निवासियों और मंदिर के पुजारियों के अनुसार, जयपुर शहर की स्थापना और नींव रखने से पहले महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने इस भव्य अश्वमेघ यज्ञ का संकल्प लिया था. इस महायज्ञ को शास्त्रोक्त विधि से संपन्न करवाने के लिए गुजरात से विशेष प्रकांड पंडितों और वैदिक विद्वानों को जयपुर आमंत्रित किया गया था. यह धार्मिक अनुष्ठान कोई साधारण आयोजन नहीं था, बल्कि तकरीबन सवा साल (15 महीने) तक अनवरत चलता रहा. इस अश्वमेघ यज्ञ के मुख्य देव के रूप में दक्षिण भारत से विशेष रूप से भगवान विष्णु के स्वरूप ‘वर्धराजन’ की प्रतिमा जयपुर लाई गई थी, जिनके लिए बाद में एक भव्य मंदिर का निर्माण भी कराया गया.

3 करोड़ लोगों ने किया भोजन, बर्तन छोटे पड़े तो घी से भर दी गई बावड़ीइस महायज्ञ से जुड़ा एक बेहद हैरान करने वाला ऐतिहासिक तथ्य भी सामने आता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, सवा साल तक चले इस विशाल धार्मिक अनुष्ठान में देश-दुनिया से आए लगभग 3 करोड़ लोगों ने भोजन प्रसादी ग्रहण की थी. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए भोजन तैयार करने और यज्ञ आहुति के लिए उपयोग होने वाले शुद्ध घी को सुरक्षित रखने के लिए उस समय के पारंपरिक बर्तन और पात्र कम पड़ गए थे. इस समस्या के समाधान के लिए महाराजा ने वहां एक विशाल बावड़ी का निर्माण करवाया और उसे पूरी तरह से शुद्ध घी से भर दिया गया. यही कारण है कि आज भी लोग इस स्थान को ‘यज्ञशाला की बावड़ी’ और ‘घी की बावड़ी’ के नाम से पुकारते हैं.

आज भी जीवंत हैं 300 साल पुराने इतिहास के अवशेष और प्रमाणयज्ञशाला की बावड़ी मंदिर परिसर आज भी अपनी प्राचीन वास्तुकला के साथ इतिहास को समेटे हुए खड़ा है. मंदिर के गर्भगृह और परिसर में आज भी 13 महान संतों की समाधियां, उनके पदचिह्न और मूर्तियां सुरक्षित हैं. इसके अलावा, यज्ञ के मुख्य स्थान पर एक प्राचीन गुफा भी बनी हुई है. इस महायज्ञ के प्रमाण पूरे जयपुर में बिखरे हुए हैं. यज्ञ में पूजे गए भगवान वर्धराजन का मुख्य मंदिर आज आमेर रोड पर जलमहल के ठीक सामने स्थित है, जबकि यज्ञ के दौरान मिट्टी से निर्मित गणेश जी की प्रतिमा प्रसिद्ध गढ़ गणेश मंदिर में प्रतिष्ठित है. स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी से करीब 10 साल पहले त्रिपोलिया गेट के पास खुदाई के दौरान एक सुरंग मिली थी, जिसमें इस अश्वमेध यज्ञ से जुड़ी चौकियां और प्राचीन पेंटिंग्स प्राप्त हुई थीं. हालांकि, 300 साल बीत जाने के कारण अब इस ऐतिहासिक धरोहर के कुछ हिस्से जर्जर हो चुके हैं, लेकिन वर्तमान में यहां एक सुंदर गौशाला संचालित है, जहां रोज़ाना श्रद्धालु गायों की सेवा करने आते हैं.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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