मलिक शाह दातार दरगाह जालौर

Last Updated:April 18, 2026, 12:18 IST
Malik Shah Datar Dargah: जालौर के ऐतिहासिक सोनगिरी किले की ऊंचाई पर स्थित हजरत मलिक शाह दातार की दरगाह 14वीं सदी से आस्था और साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रमुख केंद्र बनी हुई है. अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौर से जुड़ी इस दरगाह के बारे में मान्यता है कि यहाँ सच्चे दिल से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है. यहाँ बिना किसी धार्मिक भेदभाव के हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु साथ मिलकर इबादत करते हैं. दरगाह की प्राचीन वास्तुकला और पहाड़ी की शांति पर्यटकों व जायरीनों को मानसिक सुकून प्रदान करती है. मन्नत पूरी होने पर लोग यहाँ चादर और प्रसाद चढ़ाकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं. यह स्थान न केवल जालौर के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है, बल्कि राजस्थान की गंगा-जमुनी तहजीब की भी एक जीवंत मिसाल है.
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जालौर. राजस्थान के रेगिस्तानी अंचल की तपती धूप और हवा में उड़ती रेत के बीच, आसमान को छूती एक ऐतिहासिक पहाड़ी के शिखर पर गौरव के साथ खड़ा है जालौर का किला. सोनगिरी के नाम से विख्यात यह किला जितना भव्य है, उतनी ही गहरी इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जड़ें हैं. 8वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य निर्मित यह दुर्ग कई राजवंशों के उत्थान और पतन का मूक गवाह रहा है. 14वीं सदी के उस दौर में, जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं ने इस दुर्ग का घेरा डाला था, तब युद्ध और सत्ता संघर्ष के बीच ही यहाँ एक ऐसी जगह ने आकार लिया जहाँ आज सदियों बाद भी केवल भक्ति और दुआ की गूँज सुनाई देती है. यह स्थान है हजरत मलिक शाह दातार की दरगाह, जो किले की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित है.
हजरत मलिक शाह दातार की दरगाह को लेकर यह अटूट मान्यता है कि यहाँ जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से हाजिरी लगाता है, उसकी हर जायज मुराद पूरी होती है. इस दरगाह की सबसे बड़ी खूबी यहाँ का समावेशी वातावरण है. यहाँ आने वाले जायरीनों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता. धर्म, जाति और मजहब की सीमाओं को लांघकर यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग समान आस्था के साथ मत्था टेकते हैं. यह दरगाह सदियों से मारवाड़ अंचल में सामाजिक समरसता और भाईचारे की एक बेमिसाल मिसाल पेश कर रही है. स्थानीय निवासी रुस्तम खान बताते हैं कि यहाँ की फिजाओं में एक रूहानी सुकून है, जो मानसिक अशांति और चिंताओं को दूर कर देता है.
14वीं सदी की वास्तुकला का वैभवदरगाह परिसर में स्थित मस्जिद और मुख्य मजार 14वीं सदी की वास्तुकला की शानदार झलक पेश करती है. यहाँ के पुराने पत्थर, नक्काशीदार मेहराबें और प्राचीन दीवारें आज भी उस कालखंड की गौरवगाथा बयां करती हैं. किले की कठिन चढ़ाई चढ़कर जब श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं, तो पहाड़ी की ऊंचाई से दिखने वाला जालौर शहर का नजारा और दरगाह की शांति उन्हें एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती है. वास्तुकला के शौकीन और इतिहासकार भी यहाँ के पत्थरों में छिपे इतिहास को पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में पहुँचते हैं. यह स्थान केवल एक धार्मिक स्थल मात्र नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की मिश्रित संस्कृति का प्रतीक भी है.
अनुभवों में छिपी मुरादें और शुक्रियादरगाह से जुड़ी आस्था महज कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों में भी रची-बसी है. स्थानीय लोग बताते हैं कि जब किसी की दुआ कबूल होती है, तो वे यहाँ दोबारा लौटकर शुक्रिया अदा करना नहीं भूलते. कोई अपनी मन्नत पूरी होने पर मजार पर चादर चढ़ाता है, तो कोई खीर का प्रसाद बांटकर अपनी खुशी का इजहार करता है. जालौर के दुर्ग की ऊंचाइयों पर बसी यह दरगाह आज भी लोगों को प्रेम और विश्वास की एक अटूट डोर में बांधे हुए है. यहाँ का आध्यात्मिक प्रभाव इतना गहरा है कि थका हुआ मुसाफिर भी यहाँ पहुँचते ही नई ऊर्जा से भर जाता है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Jalor,Jalor,Rajasthan
First Published :
April 18, 2026, 12:13 IST



