Forest Guard Anita Chaudhary Shergarh Sanctuary

Last Updated:April 18, 2026, 08:32 IST
Anita Chaudhary Forest Guard: बारां के शेरगढ़ अभयारण्य में तैनात फॉरेस्ट गार्ड अनीता चौधरी ने वन्यजीव संरक्षण की नई परिभाषा लिखी है. झुंझुनूं की रहने वाली 30 वर्षीय अनीता ने अब तक 500 से अधिक जानवरों को बचाया है और शिकारियों के खिलाफ 50 से ज्यादा FIR दर्ज कराई हैं. रिश्वत और धमकियों के बावजूद उन्होंने अवैध खनन और तस्करी पर लगाम लगाई. उनकी बहादुरी के लिए उन्हें ‘मच्छली नेशनल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है. चिलचिलाती धूप और खतरनाक रास्तों के बीच वे रात-रात भर गश्त कर जंगल की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं.
राजस्थान के बारां जिले में स्थित शेरगढ़ अभयारण्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन दिनों एक ऐसी महिला के कंधों पर है, जिनकी बहादुरी की चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है. 30 वर्षीय फॉरेस्ट गार्ड अनीता चौधरी पिछले दस वर्षों से वनों और वन्यजीवों की सच्ची रक्षक बनी हुई हैं. करीब 9,880 हेक्टेयर में फैले इस विशाल अभयारण्य का 2,949 हेक्टेयर का दुर्गम क्षेत्र अनीता के जिम्मे है.
झुंझुनूं के एक छोटे से गाँव अमरपुरा की रहने वाली अनीता ने न केवल वन विभाग में महिलाओं के प्रति बनी रूढ़िवादी सोच को बदला है, बल्कि माफियाओं और शिकारियों के मन में कानून का खौफ भी पैदा किया है. उनके इन्हीं प्रयासों के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘मच्छली नेशनल अवॉर्ड’ और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है. और इसमें ₹50,000 की पुरस्कार राशि भी शामिल होती है.
अनीता चौधरी अब तक करीब 500 वन्यजीवों को बचाने में सफल रही हैं. जिनमें मगरमच्छ जैसे खतरनाक जीव भी शामिल हैं. उन्होंने कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर इन जानवरों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है. जिससे जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में मदद मिली है.
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2021 में शेरगढ़ में तैनाती के बाद अनीता ने देखा कि जंगल में अवैध शिकार, लकड़ी की तस्करी और पशुओं की अवैध चराई एक बड़ी समस्या थी. शुरुआती दौर में स्थानीय दबंगों और तस्करों ने एक महिला गार्ड को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अनीता के इरादे फौलादी थे. उन्होंने जंगली सूअर के शिकार मामले में पहली FIR दर्ज कराकर साफ संकेत दे दिया कि जंगल में अब मनमानी नहीं चलेगी. तब से अब तक वे 50 से ज्यादा FIR दर्ज करवा चुकी हैं.
अनीता बताती हैं कि उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं, तबादले का डर दिखाया गया और यहाँ तक कि लाखों रुपयों की रिश्वत का लालच भी दिया गया, लेकिन उन्होंने कभी अपने फर्ज से समझौता नहीं किया. अनीता के इस साहस के पीछे उनके पिता रघुवीर सिंह का बड़ा हाथ है, जो सेना से सेवानिवृत्त सूबेदार हैं. उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा सीमा पर तैनात सैनिकों की तरह निडर होकर काम करने के लिए प्रेरित किया. हालांकि शुरुआत में उनकी माँ इस जोखिम भरी नौकरी के खिलाफ थीं, लेकिन आज बेटी की कामयाबी पर पूरा गाँव गर्व करता है.
जब उन्होंने शिकार के मामले में पहली FIR दर्ज करवाई. तो हालात तेजी से बदलने लगे. इसके बाद उन्होंने लगातार कार्रवाई जारी रखी. जिसके कारण तस्करों, पशुपालकों और अवैध खनन करने वालों पर भी कई बार जुर्माना लगाकर जंगल में कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया है.
अनीता चौधरी की कार्यशैली विभाग के अन्य कर्मचारियों से बिल्कुल अलग है. वे गश्त के लिए किसी तय समय का इंतजार नहीं करतीं, बल्कि अक्सर रात के 2 बजे भी अपनी मोटरसाइकिल उठाकर घने जंगलों के निरीक्षण पर निकल जाती हैं. उन्हें जंगल की इतनी गहरी समझ है कि वे मधुमक्खी के छत्तों और दीमक के टीलों तक की गिनती का अंदाजा रखती हैं.
अपने कार्यकाल में उन्होंने अब तक करीब 500 जानवरों को तस्करों और हादसों से बचाया है, जिनमें खूंखार मगरमच्छ भी शामिल हैं. अनीता ने जंगल के अंदर जानवरों के लिए पानी की बोरिंग करवाई, चेक डैम बनवाए और छोटे तालाबों का निर्माण करवाया ताकि वन्यजीव पानी की तलाश में बस्ती की ओर न जाएं.
अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई के चलते अनीता को कई बार ट्रांसफर की धमकियां मिलीं. जान से मारने की धमकी दी गई. और लाखों रुपये की रिश्वत की पेशकश भी हुई. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. और अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटीं.
करीब ₹45,000 की मासिक सैलरी पाने वाली अनीता के लिए पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा है. उनका मानना है कि उनका असली मकसद प्रकृति की रक्षा करना है. और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखना है. अनीता का मानना है कि असली ट्रेनिंग दफ्तर में नहीं बल्कि चिलचिलाती धूप और जंगलों की उबड़-खाबड़ जमीन पर काम करने से मिलती है.
First Published :
April 18, 2026, 08:32 IST



