सरकारी मदद का इंतजार नहीं, गांव ने खुद उठाया बीड़ा, 1.25 करोड़ से खुद बना रहे 30 फीट गहरा बांध

Last Updated:August 14, 2026, 07:03 IST
Jaipur Pachhudala Village Story: जयपुर जिले के विराटनगर विधानसभा क्षेत्र का पाछूडाला गांव इतिहास, आस्था और जनसहयोग की अनूठी कहानी समेटे हुए है. स्थानीय मान्यता के अनुसार पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे, जिसके चलते गांव की पुरानी पहचान पांडवाला से जुड़ी मानी जाती है. गांव में सिद्धमुनी महाराज, चूणसिद्ध महाराज, ठाकुरजी और जगन्नाथ महाराज के मंदिर हैं. सिद्धमुनी महाराज के मंदिर में वर्षों से अखंड ज्योत जल रही है. नारू रोग से जुड़े पारंपरिक झाड़े की मान्यता के कारण भी दूर-दराज से लोग यहां पहुंचते हैं. अब गांव की नई पहचान जल संरक्षण से बन रही है. पुराने बांध की क्षमता कम होने के बाद ग्रामीणों ने करीब 1.25 करोड़ रुपये की लागत से नया बांध बनाने का काम शुरू किया है.
जयपुर जिले के विराटनगर विधानसभा क्षेत्र में बसा पाछूडाला गांव अपने आप में इतिहास, आस्था और जनसहयोग की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है. यह पांडवों से जुड़ा होने के कारण यह बाकी गांवों से अलग पहचान रखता है. स्थानीय लोगों के अनुसार पांडवों के अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे. कारण इस क्षेत्र को कभी पांडवाला कहा जाता था. समय के साथ नाम बदलते-बदलते पाछूडाला हो गया. जबकि राजस्व रिकॉर्ड में यह पाछोडाला दर्ज है. यह गांव पहाड़ियों की तलहटी में बसा है. पाछूडाला गांव आज भी पुरानी पहचान को बचाए हुए है.
पाछूडाला सिर्फ इतिहास के किस्सों के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था के लिए भी खास माना जाता है. गांव में सिद्धमुनी महाराज और चूणसिद्ध महाराज के मंदिर मौजूद है. यहां आम लोगों के साथ-साथ संत महात्मा भी आते हैं. इसके अलावा यहां ठाकुरजी और जगन्नाथ महाराज के भी बड़े मंदिर यहां मौजूद है. इस मंदिरों में सिद्धमुनी महाराज का मंदिर सबसे खास है. इस मंदिर में वर्षों से अखंड ज्योत जल रही है. ग्रामीण इसे आस्था का प्रतीक मानते हैं और पीढ़ियों से इसकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
गांव की एक और पुरानी परंपरा आज भी लोगों को यहां खींच लाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार नारू रोग से पीड़ित लोगों के लिए यहां पारंपरिक तरीके से झाड़ा लगाया जाता है. इसी विश्वास के चलते आसपास के क्षेत्रों के साथ दूर-दराज से भी लोग पाछूडाला पहुंचते हैं. आधुनिक दौर में भी यह गांव आज भी अपनी पुरानी परंपरा को कायम रखे हुए है. नारू रोग से ग्रसित लोग और उनके परिजन यहां कुछ दिन रुकते भी हैं.
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अब पाछूडाला की सबसे बड़ी पहचान उसकी जल संरक्षण की मुहिम बनती जा रही है. गांव में वर्षों पुराना एक बांध मौजूद था, जिसकी भराव क्षमता 20 फीट से ज्यादा थी. लेकिन समय के साथ बांध में पानी रुकना कम हो गया और बारिश का पानी बहकर बिलाली की तरफ जाने लगा. इसका सीधा असर गांव के जल संकट पर पड़ने लगा. ऐसे में ग्रामीणों ने समस्या का इंतजार करने के बजाय खुद समाधान तलाशने का फैसला किया.
ग्रामीणों ने मिलकर करीब 1.25 करोड़ रुपए की लागत से नया बांध बनाने का काम शुरू किया है. खास बात यह है कि इस काम में सरकारी मदद के भरोसे बैठने के बजाय जनसहयोग को आधार बनाया गया है. नया बांध तैयार होने के बाद इसकी भराव क्षमता करीब 30 फीट है. यानी पुराने बांध की तुलना में ज्यादा पानी को रोककर उसका उपयोग गांव और आसपास के क्षेत्र के लिए किया जा सकेगा.
इस बांध की पाल करीब 500 मीटर लंबी होगी, जबकि इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 3 किलोमीटर तक फैला रहेगा. पहाड़ियों से आने वाले बारिश के पानी को रोकने की यह कोशिश भूजल स्तर बढ़ाने में भी मददगार हो सकती है. ग्रामीणों का मकसद केवल एक बांध बनाना नहीं, बल्कि बारिश के पानी को गांव में रोककर आने वाले वर्षों के लिए पानी की सुरक्षा मजबूत करना है. यही सोच पाछूडाला को जल संरक्षण की दिशा में एक खास उदाहरण बना रही है.
एक तरफ पाछूडाला अपनी पांडवों से जुड़ी लोककथाओं, मंदिरों और पुरानी परंपराओं को संभालकर बैठा है, तो दूसरी तरफ ग्रामीण भविष्य की जरूरत को समझते हुए जल संरक्षण का रास्ता अपना रहे हैं. इतिहास की विरासत और वर्तमान की जरूरतों का यह मेल गांव की सबसे बड़ी ताकत बन रहा है. करीब 1.25 करोड़ की लागत से बन रहा बांध आने वाले समय में पाछूडाला की नई पहचान बन सकता है.
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August 14, 2026, 07:03 IST



