Pitru Paksha 2026: श्राद्ध में कौवा नहीं दिखे तो न हों परेशान, इन जीवों को भोजन कराने से पूरी होगी परंपरा

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कौवा नहीं मिला तो श्राद्ध का भोजन किसे खिलाएं, जानें क्या कहती है मान्यता
Last Updated:October 04, 2026, 08:50 IST
Shraddh Paksha 2026: श्राद्ध पक्ष में पितरों की शांति के लिए कौवे को भोजन कराने की परंपरा है. लेकिन शहरों में कौवे आसानी से नहीं मिलते. भीलवाड़ा के पंडित कमलेश व्यास के अनुसार, कौवे न मिलने पर गाय, कुत्ते, चींटियों और अन्य पक्षियों को भोजन कराया जा सकता है. यह जीवों के प्रति दया, सेवा और परोपकार का प्रतीक है. भोजन कराते समय सफाई का ध्यान रखें और ऐसा भोजन दें जो जीवों को नुकसान न पहुंचाए. इससे भी पितरों को तृप्ति मिलती है.
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भीलवाड़ा: श्राद्ध पक्ष में पितरों की शांति और तृप्ति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध के दौरान कौवे को भोजन कराने की परंपरा सदियों पुरानी है. ऐसा माना जाता है कि पितर कौवे का रूप धारण करके धरती पर आते हैं और अपने परिजनों द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण करते हैं. हालांकि, बदलते समय और बढ़ते शहरीकरण के कारण आज के दौर में शहरों और कस्बों में कौवे आसानी से दिखाई नहीं देते हैं. कई बार तो लोग घंटों तक कौवे की तलाश करते रहते हैं, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगती है. यह आज के समय की एक आम समस्या बन चुकी है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर कौवा न मिले तो श्राद्ध का भोजन किसे खिलाएं.
इस समस्या का समाधान बताते हुए भीलवाड़ा मुख्यालय के नगर व्यास पंडित कमलेश व्यास ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है. उन्होंने बताया कि श्राद्ध पक्ष का पवित्र समय चल रहा है, जिसमें पितरों के प्रति श्रद्धा और सेवा भाव का सबसे ज्यादा महत्व होता है. हालांकि कौवे को भोजन कराना विशेष माना गया है, लेकिन अगर किसी जगह पर कौवा उपलब्ध न हो, तो श्रद्धालुओं को परेशान होने की जरूरत नहीं है. वे अन्य जीवों को भी श्राद्ध का भोजन करा सकते हैं. श्राद्ध के दौरान गाय को रोटी या चारा, कुत्ते को भोजन और चींटियों के लिए आटा या शक्कर मिला दाना डाला जा सकता है. इसके अलावा आसपास रहने वाले अन्य पक्षियों के लिए बाजरा, ज्वार या अनाज के दाने छत पर या खुले मैदान में रखे जा सकते हैं.
जीवों के प्रति दया और सेवा है असल उद्देश्यपंडित कमलेश व्यास के अनुसार, इन जीवों को भोजन कराने का उद्देश्य सिर्फ धार्मिक कर्मकांड पूरा करना नहीं है. इसके पीछे का मुख्य भाव जीवों के प्रति दया, सेवा और परोपकार को बढ़ावा देना है. सनातन धर्म में प्रकृति और जीवों की सेवा को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है. जब हम किसी बेजुबान जानवर या पक्षी की भूख मिटाते हैं, तो इससे मिलने वाला पुण्य सीधे हमारे पितरों को प्राप्त होता है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है. कई परिवारों में तो पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है कि श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा विशेष रूप से जीव-जंतुओं के लिए पहले ही अलग निकाल लिया जाता है.
भोजन कराते समय रखें इन बातों का ध्यानजीवों को भोजन कराते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है. सबसे महत्वपूर्ण बात साफ-सफाई की है. जीवों को दिया जाने वाला भोजन शुद्ध और सात्विक होना चाहिए. ऐसा कोई भी भोजन जानवरों या पक्षियों को न डालें जो खराब हो चुका हो या जिससे उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता हो. पंडित व्यास ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध से जुड़ी परंपराओं में थोड़ा बहुत बदलाव देखने को मिल सकता है. इसलिए लोग अपने परिवार की कुल परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ही श्राद्ध कर्म कर सकते हैं. पूरे श्रद्धा भाव से किया गया अन्न दान और जीवों की निस्वार्थ सेवा पितरों के प्रति सच्चा सम्मान प्रकट करने का सबसे अच्छा माध्यम है. इससे समाज में परोपकार की भावना भी मजबूत होती है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bhilwara,Bhilwara,Rajasthan
First Published :
October 04, 2026, 08:50 IST



