Karauli Goat: करौली की इस बकरी को क्यों पाल रहे हैं पशुपालक? खूबियां जानकर रह जाएंगे हैरान

Last Updated:September 27, 2026, 22:19 IST
Karauli Goat: करौली गॉट पूर्वी राजस्थान के डांग और चंबल क्षेत्र में पशुपालकों के बीच तेजी से पहचान बना रही है. दूध और मांस दोनों के लिए उपयोगी इस देसी नस्ल को कम लागत में पाला जा सकता है. साल में दो बार बच्चे देने और स्थानीय परिस्थितियों में आसानी से ढलने के कारण यह छोटे व मध्यम पशुपालकों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा जरिया बन सकती है.
पूर्वी राजस्थान के डांग और चंबल क्षेत्र में पशुपालन करने वाले लोगों के लिए बकरी पालन लंबे समय से आय का एक अहम जरिया रहा है. अब इसी क्षेत्र की देसी नस्ल करौली गॉट पशुपालकों के बीच अपनी खास खूबियों के कारण पहचान बना रही है. इस नस्ल की सबसे बड़ी खासियत इसका डुअल परपज होना है. यानी इससे दूध उत्पादन के साथ मांस उत्पादन भी किया जा सकता है.
कम लागत में पालन और स्थानीय परिस्थितियों में आसानी से ढल जाने के कारण करौली गॉट को छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए उपयोगी नस्ल माना जाता है. खासकर ऐसे परिवार, जिनके पास सीमित जमीन या आय के दूसरे साधन हैं, उनके लिए बकरी पालन अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकता है.
करौली गॉट की पहचान केवल दूध उत्पादन वाली बकरी के रूप में नहीं है. यह नस्ल मांस उत्पादन के लिहाज से भी उपयोगी मानी जाती है. करौली पशुपालन विभाग के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. ब्रह्म प्रकाश पांडे के अनुसार, अच्छी देखभाल और उचित पोषण मिलने पर मादा बकरी से करीब डेढ़ से दो लीटर तक प्रतिदिन दूध उत्पादन हो सकता है.
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इसके नर बच्चे भी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ते हैं और करीब 9 महीने की उम्र में बाजार के लिए तैयार हो सकते हैं. करौली गॉट की एक और खासियत इसका प्रजनन चक्र है. सामान्य परिस्थितियों में यह बकरी साल में दो बार बच्चे देने की क्षमता रखती है. कई बार एक बकरी एक से अधिक बच्चों को भी जन्म देती है. यही वजह है कि अच्छी नस्ल और बेहतर प्रबंधन के साथ कम समय में झुंड की संख्या बढ़ाई जा सकती है.
बकरी पालन की लागत में सबसे बड़ा हिस्सा चारे और देखभाल का होता है. करौली गॉट स्थानीय उपलब्ध चारे और वनस्पतियों पर आसानी से पाली जा सकती है. डांग क्षेत्र के पशुपालक इसे खुले चराई क्षेत्र और उपलब्ध स्थानीय संसाधनों के सहारे भी पालते हैं. हालांकि व्यावसायिक पालन में संतुलित आहार, साफ पानी, टीकाकरण और समय-समय पर पशु चिकित्सकीय जांच जरूरी है.
वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. ब्रह्म प्रकाश पांडे के अनुसार, डांग और चंबल के आसपास रहने वाले पशुपालकों के लिए स्थानीय परिस्थितियों में अनुकूल यह नस्ल उपयोगी साबित हो सकती है. खेती की सीमित जमीन वाले परिवार भी बकरी पालन को अपनी आय के अतिरिक्त साधन के रूप में अपना सकते हैं.
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September 27, 2026, 22:19 IST



