Special Story: करमैती बाई की भक्ति से जुड़ा है खंडेला का बांके बिहारी मंदिर, जानें 600 साल पुरानी रहस्यमयी कथा

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12 साल की उम्र में छोड़ा घर, वृंदावन में किया तप, जानें करमैती बाई की कथा
Last Updated:September 13, 2026, 07:19 IST
Ancient Banke Bihari Temple Sikar: सीकर के खंडेला की ब्रह्मपुरी में स्थित बांके बिहारी मंदिर करीब 600 साल पुरानी कृष्ण भक्ति की परंपरा से जुड़ा है. मान्यता है कि यहां विराजमान श्रीकृष्ण की प्रतिमा भक्त शिरोमणि करमैती बाई की भक्ति से जुड़ी है. जन्माष्टमी पर मंदिर में 108 विशेष जड़ी-बूटियों से भगवान का अभिषेक किया जाता है, जो करीब ढाई से तीन घंटे चलता है. रात 12 बजे कृष्ण जन्मोत्सव पर विशेष पूजा और आरती होती है. मंदिर की प्राचीन कथा के अनुसार करमैती बाई बचपन से कृष्ण भक्त थीं और विवाह के बाद वृंदावन चली गई थीं. बताया जाता है कि उन्होंने 18 दिन तक कठिन तप किया, जिसके बाद भगवान कृष्ण संत के वेश में उनके सामने प्रकट हुए. बाद में उन्होंने यमुना से श्रीकृष्ण की प्रतिमा निकालकर अपने पिता के साथ आए परशुरामजी को सौंप दी, जिसे खंडेला लाकर स्थापित किया गया.
सीकर जिले के खंडेला की ब्रह्मपुरी में स्थित बांके बिहारी मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि करीब 600 साल पुरानी कृष्ण भक्ति की एक अनोखी कहानी को अपने भीतर समेटे हुए है. यहां स्थापित श्रीकृष्ण की प्रतिमा का संबंध भक्त शिरोमणि करमैती बाई से है.जन्माष्टमी पर मंदिर में होने वाली विशेष पूजा इस प्राचीन परंपरा और आस्था को और खास बना देती है.
मंदिर के पुजारी बिहारी लाल पारीक के अनुसार जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की दो बार जड़ी बूटियों सीविशेष पूजा-अर्चना होती है. सुबह मंदिर परिसर को आम के पत्तों और कंडील की डालियों से आकर्षक तरीके से सजाया जाता है. इसके बाद भगवान की प्रतिमा का 108 विशेष जड़ी-बूटियों से अभिषेक किया जाता है. यह अभिषेक करीब ढाई से तीन घंटे तक चलता है. इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है.
रात होते ही मंदिर में कृष्ण जन्मोत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. ठीक रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. घंटियों और जयकारों के बीच श्रद्धालु जन्मोत्सव मनाते हैं. लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत केवल जन्माष्टमी का उत्सव नहीं, बल्कि वह प्राचीन कथा है, जो यहां विराजमान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को भक्त शिरोमणि करमैती बाई की भक्ति से जोड़ती है.
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श्रीनाभाजी के भक्तमाल ग्रंथ में करमैती बाई की भक्ति का उल्लेख मिलता है. ग्रंथ की पंक्ति कठिन काल कलियुग में, करमैती निष्कलंक रही. उनकी कृष्ण भक्ति की गहराई को दर्शाती है. बताया जाता है कि खंडेला की ब्रह्मपुरी में जन्मी करमैती बाई बचपन से ही भगवान कृष्ण की भक्त थीं. 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सांगानेर के जोशी परिवार में हुआ, लेकिन गौने की पहली रात ही उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर वृंदावन की राह पकड़ ली.
कहा जाता है कि करमैती बाई तीर्थयात्रियों के साथ पैदल वृंदावन पहुंचीं और वहां कृष्ण भक्ति में लीन हो गईं. भक्तमाल की कथा के अनुसार उन्होंने 18 दिन तक बिना भोजन-पानी के कठिन तप किया। इसके बाद स्वयं भगवान श्रीकृष्ण संत के वेश में उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें अपने हाथ से भोजन करवाया. करमैती बाई के वृंदावन पहुंचने की जानकारी मिलने पर उनके पिता और खंडेला के शेखावत राजा के पुरोहित परशुरामजी उन्हें वापस लाने पहुंचे.
करमैती बाई ने घर लौटने से इनकार कर दिया. पिता के खाली हाथ वापस नहीं लौटने की बात कहने पर उन्होंने यमुना नदी से श्रीकृष्ण की प्रतिमा निकालकर उन्हें सौंप दी और कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया. परशुरामजी प्रतिमा को खंडेला लेकर आए और ब्रह्मपुरी में उसकी प्रतिष्ठा कर दी. मान्यता है कि इसी प्रतिमा की पूजा आज बांके बिहारी मंदिर में करीब 600 वर्षों से चली आ रही है. प्रतिमा मिलने के बाद परशुरामजी भी कृष्ण भक्ति में लीन हो गए.
कथा यहीं खत्म नहीं होती. जब शेखावत राजा को करमैती बाई की भक्ति के बारे में पता चला तो वे भी वृंदावन उनसे मिलने पहुंचे. वहां करमैती बाई यमुना किनारे कृष्ण वियोग में आंसू बहाती मिलीं. उनकी भक्ति देखकर राजा का मन भी भाव-विभोर हो गया. उन्होंने ब्रह्मकुंड के पास करमैती बाई के लिए एक कुटी बनवाई और खंडेला लौटने के बाद स्वयं भी कृष्ण भक्ति में लीन हो गए.
First Published :
September 13, 2026, 07:19 IST



