दिव्यांग माधव की ड्रॉइंग से सात महीने बाद घर वापसी की कहानी

अक्टूबर की एक शाम वड़ोदरा रेलवे स्टेशन पर एक 14 साल का लड़का माधव (बदला हुआ नाम) अकेला घूम रहा था. न तो वह बोल सकता था और न ही सुन सकता था. यहां तक कि उसे पढ़ना लिखना भी नहीं आता था. काफी कोशिश करने के बाद भी कोई उससे बात नहीं कर पा रहा था और न ही बच्चे के घर की लोकेशन का पता चल पा रहा था. आखिरकार रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) के कर्मचारियों ने उसे दीपक फाउंडेशन के चिल्ड्रेंस होम में शरण दिलवा दी.
इस घटना को सात महीने बीत गए. एक तरफ माधव था जो अपने माता-पिता से दूर चिल्ड्रन होम में दिन बिताने को मजबूर था तो दूसरी ओर माधव के माता-पिता राजस्थान के नाथद्वारा के पास एक छोटे से गांव में रहते हैं. वे मिट्टी के बर्तन बनाकर और छोटी खेती करके गुजारा करते हैं. लेकिन बेटे के गुम होने के बाद उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक बेटा नहीं लौटेगा, सिर्फ एक समय ही खाना खाएंगे. इन महीनों में वे रोजाना रात को भूखे सोते रहे. हर दिन प्रार्थना करते, हर रात आंसू पोछते रहे.
माधव के बोल और सुन न पाने के कारण होम में उसकी काउंसलिंग मुश्किल थी. वह कुछ बता नहीं पाता था लेकिन जल्दी ही पता चला कि उसे ड्रॉइंग का बहुत शौक है. जब उसे रंग और कागज दिए गए, तो उसकी कलम से ऐसी चीजें निकलीं कि उसने बच्चे के घर का सुराग दे दिया.
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक माधव के स्कैच में राजस्थान की संस्कृति, नाथद्वारा की पारंपरिक रंग-बिरंगी झलकियां थीं घोड़े, ऊंट, लोक वेशभूषा, मंदिरों की छवियां और रंगों का वो खास अंदाज जो केवल राजस्थान में दिखता है. उसकी हर ड्राइंग में घर की याद झलक रही थी.
अधिकारियों ने सोचा शायद यही रास्ता है. उन्होंने माधव को राजस्थान के अलग-अलग जगहों की तस्वीरें दिखाईं. ज्यादातर जगहों पर वह बिना प्रतिक्रिया के देखता रहा. लेकिन जब ‘स्टैच्यू ऑफ बिलीफ’ यानी विश्वास स्वरूपम नाथद्वारा में बनी दुनिया की सबसे ऊंची (369 फीट) ऊंची भगवान शिव की प्रतिमा की तस्वीर आई, तो माधव का चेहरा चमक उठा. उसने उत्साह से इशारा किया. यह पहला ठोस क्लू था.
इतना सुराग मिलते ही चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (सीडब्ल्यूसी) ने तुरंत नाथद्वारा पुलिस से संपर्क किया. काउंसलर संध्या सपकल, सीडब्ल्यूसी स्टाफ और राजदीप नाथद्वारा पहुंचे. स्थानीय पुलिस के एएसआई उदय सिंह भी साथ थे. उन्होंने आस-पास के करीब 10 गांव घूमे.
15 अप्रैल को अचानक चमत्कार हुआ. कार से गुजरते समय माधव ने एक मोटरसाइकिल पर बैठे दंपति को देखा और उत्साह से इशारा किया. उन्हें फॉलो करो! पुलिस ने दंपति को रोका. वे माधव के पिता के रिश्तेदार निकले. उनकी आंखों में आंसू आ गए.
वे माधव को उसके गांव ले गए. मां-बाप ने बेटे को देखते ही रोना शुरू कर दिया. गले लगाकर रोए, चूमा. सात महीनों की पीड़ा एक पल में पिघल गई. मां ने कहा, ‘अब हमारी कसम पूरी हुई. अब हम दोनों समय खाएंगे.’
पुलिस को पता चला कि माधव घर से एक छोटी सी बात पर नाराज होकर चला गया था.इस कहानी में शब्द नहीं थे, लेकिन माधव की कलम ने सब कुछ कह दिया. कला ने दिव्यांगता को हराया, चुप्पी को तोड़ा और एक परिवार को फिर से जोड़ दिया.यह कहानी सिखाती है कि हर बच्चे के अंदर कोई न कोई भाषा जरूर होती है. हमें बस उसे समझने की कोशिश करनी होती है.


