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एसी स्टूडियो नहीं, बिहार-झारखंड के मेलों-शादियों से निकला ये गाना, जिसमें ताना भी, शिकायत भी पर शरारत है भरपूर

नई दिल्ली. कुछ गाने सिर्फ सुने नहीं जाते, वे अपने साथ पूरा माहौल लेकर आते हैं. उनमें किसी शहर की चमक नहीं होती, बल्कि मिट्टी की खुशबू, लोगों की बोली और जिंदगी की छोटी-बड़ी कहानियां घुली होती हैं. ऐसा ही एक गाना है, जिसने करीब डेढ़ दशक बाद भी अपनी अलग पहचान कायम रखी है. इसकी आवाज में मस्ती है, लेकिन उसके पीछे छिपी बातों को समझें तो कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है. यह उन औरतों की दुनिया से निकलता है, जो अपनी शिकायत भी करती हैं, ताना भी मारती हैं और अपनी शरारत से महफिल भी जमा देती हैं.

यह गाना है अनुराग कश्यप की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का ‘ओ वुमनिया’. इसकी खासियत सिर्फ इसके देसी अंदाज में नहीं, बल्कि इसे तैयार खास तरह से किया गया. फिल्म के म्यूजिक के लिए स्नेहा खानवलकर ने सिर्फ स्टूडियो में बैठकर धुनें तैयार नहीं की थीं.

लंबी रिसर्च के बाद तैयार हुआ ‘ओ वुमनिया’

स्नेहा खानवलकर ने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के संगीत के लिए महीनों तक बिहार और झारखंड की जमीन पर रहकर रिसर्च की थी. उन्होंने स्थानीय लोगों से मुलाकात की. अलग-अलग जगहों की आवाजें रिकॉर्ड कीं और फिर उन अनुभवों को फिल्म के संगीत में ढाला. शायद इसलिए ‘ओ वुमनिया’ सुनते हुए ऐसा नहीं लगता कि कोई गाना बनाया गया है. लगता है जैसे किसी गांव की शादी, किसी मेले या महिलाओं की बैठकी से कोई आवाज उठकर सीधे फिल्म के पर्दे तक पहुंच गई हो. यही वजह है कि इतने साल बाद भी यह गाना ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की सबसे यादगार संगीत विरासत में शामिल है.

स्नेहा खानवलकर के संगीत और वरुण ग्रोवर ने लिखे बोल

‘ओ वुमनिया’ इसी लोक-संसार से निकली उस आवाज का हिस्सा है, जिसमें महिलाओं के बीच गाए जाने वाले गीतों का रंग साफ नजर आता है. यहां प्रेम की बात भी है, शिकायत भी और रिश्तों में होने वाली नोकझोंक भी. लेकिन इन सबके बीच एक शरारत है, जो गाने को और खास बना देती है. यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है. गाने को खुसबू राज और रेखा झा ने आवाज दी है, जबकि इसका संगीत स्नेहा खानवलकर ने तैयार किया और बोल वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं.

महिलाओं का सच्चा सेलिब्रेशन

‘ओ वुमनिया’ केवल एक गाना नहीं है, बल्कि यह औरतों के एक साथ आने, हंसने और उनके बेबाक एक्सप्रेशन का सच्चा सेलिब्रेशन है. इस गाने में ताना भी है, अपनों से शिकायत भी है, लेकिन सबसे ज्यादा शरारत भरी हुई है. यह उन तमाम बातों को कहने का जरिया है, जो औरतें अकसर खुलेआम या समाज के सामने नहीं कह पातीं, लेकिन गानों और बोलियों के जरिए मुस्कुराते हुए बयां कर देती हैं.

क्या है फिल्म की कहानी

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ वासेपुर (धनबाद) के कोयला माफिया, खानदानों की दुश्मनी, बदले की आग और ताकत के खूनी खेल की कहानी है. जहां एक तरफ सरदार खान (मनोज बाजपेयी) और फैजल खान (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) जैसे किरदार बंदूक की नोक पर अपनी सत्ता और खौफ कायम करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस हिंसक और मर्दवादी माहौल में घर की महिलाएं- जैसे नगमा खातून (रिचा चड्ढा) और मोहसिना (हुमा कुरैशी) अपनी एक अलग, चुलबुली और मजबूत दुनिया जीती हैं.

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