Rajasthan

गैस चूल्हों के दौर में भी नहीं बदली गांवों की पहचान, आज भी देसी तरीके से तैयार होता है स्वाद का खजाना

Last Updated:June 24, 2026, 18:12 IST

Bharatpur Hindi News: आधुनिकता के इस दौर में जहां रसोईघरों में गैस चूल्हे और आधुनिक उपकरणों का उपयोग बढ़ गया है, वहीं भरतपुर के कई गांवों में आज भी पारंपरिक जीवनशैली और देसी रसोई संस्कृति जीवित है. यहां मिट्टी और गोबर से बने ‘भेगड़ा’ पर धीमी आंच में दूध गर्म करने और दलिया पकाने की परंपरा आज भी बरकरार है. ग्रामीणों का मानना है कि इस पारंपरिक तरीके से बने भोजन का स्वाद और पौष्टिकता दोनों अधिक होती हैं. भेगड़ा की धीमी आंच पर पकाया गया दूध और दलिया न केवल स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है, बल्कि यह ग्रामीण संस्कृति और विरासत का भी प्रतीक है.

ग्रामीण क्षेत्रों में दूध गर्म और पशुओं के लिए दलिया बनाने के लिए मिट्टी और गोबर से बने एक विशेष चूल्हे का उपयोग किया जाता है. जिसे स्थानीय भाषा में भेगड़ा या बरोसी कहा जाता है. यह भेगड़ा वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है.और आज भी गांवों में बड़ी संख्या में देखने को मिलता है. इसे घरों के आंगन या पशुशालाओं के पास तैयार किया जाता है. ताकि इसका उपयोग आसानी से किया जा सके.

भेगड़ा बनाने की प्रक्रिया भी पूरी तरह देसी होती है.इसे मिट्टी और गोबर को मिलाकर तैयार किया जाता है. जिससे यह मजबूत और टिकाऊ बनता है. सूखने के बाद यह एक स्थायी चूल्हे का रूप ले लेता है. जिसमें आग लंबे समय तक नियंत्रित तरीके से जलती रहती है. यह खासियत इसे अन्य आधुनिक साधनों से अलग बनाती है.

इस भेगड़े के अंदर गोबर के उपले डाले जाते हैं और उन्हें आग लगाई जाती है.उपलों की आग धीरे-धीरे सुलगती रहती है. जिससे एक समान और हल्की आंच मिलती है. इस धीमी आंच पर दूध को गर्म किया जाता है. जिससे दूध उफनता नहीं और उसकी गुणवत्ता भी बनी रहती है. ग्रामीण लोग इसे दूध को सुरक्षित और बेहतर तरीके से गर्म करने का प्रभावी तरीका मानते हैं.

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इतना ही नहीं इसी पारंपरिक व्यवस्था का उपयोग पशुओं के लिए बनने वाले दलिए या चारे को तैयार करने में भी किया जाता है. धीमी आंच पर दलिए को पकाने से उसका स्वाद और पोषण बेहतर बना रहता है. जिससे पशुओं को भी फायदा मिलता है. यह तरीका वर्षों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है.

आज के आधुनिक युग में जहां गैस चूल्हे और इलेक्ट्रिक उपकरणों का चलन बढ़ रहा है. वहीं भरतपुर के गांवों में भेगड़ा जैसी पारंपरिक व्यवस्था अब भी जीवित है. यह न केवल ग्रामीण संस्कृति को दर्शाता है. बल्कि यह भी बताता है कि पुराने तरीके आज भी उपयोगी और टिकाऊ हो सकते हैं.

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