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इजराइल के स्कूलों में गूंजती है वीरता, पर राजस्थान के सिलेबस से बाहर क्यों हैं मेजर दलपत सिंह?

पाली. कहते हैं कि ‘वीर भोग्या वसुंधरा’, लेकिन जब उसी वसुंधरा के शूरवीर को अपनों के बीच सम्मान न मिले, तो सवाल उठना लाजिमी है. आज हम बात कर रहे हैं ‘हाइफा हीरो’ मेजर दलपत सिंह की. वो वीर योद्धा, जिनकी तलवार ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजराइल की धरती पर वो इतिहास रचा कि आज भी वहां के स्कूली बच्चे उनकी वीरता का पाठ पढ़ते हैं. लेकिन अफसोस! जिस शूरवीर को दुनिया सलाम करती है, उसे अपने ही राजस्थान में पाठ्यक्रमों में जगह नहीं मिल पाई. आज उनकी वंशज मनीषा पंवार ने एक बार फिर सरकार और शिक्षा विभाग को आईना दिखाते हुए आग्रह किया है कि मेजर दलपत सिंह की शौर्य गाथा को राजस्थान की स्कूली किताबों में शामिल किया जाए.

मनीषा पंवार ने कहा कि हम अपने आप को बहुत गौरवान्वित महसूस करते हैं कि हम मेजर दलपत सिंह, जिनको हाईफा हीरो कहते हैं, उने वंशज है. उन्होने जिस तरह से हाईफा शहर को आजाद करवाया वह भी कम संसाधनो में. राजस्थान जोधपुर जो उनका ननिहाल है और पाली देवली जो उनका ददियाल है हम अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं. देश के प्रधानमंत्री जाकर इजराइल में तारीफ करते हैं तो यह अच्छी बात है.

पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने गठित किया था बोर्ड मनीषा पंवार कहती हैं कि मैं यही कहूंगी कि हाईफा हीरो को पढ़ना भी चाहिए और उनसे प्रेरणा भी लेनी चाहिए. उन्होंने छोटी सी उम्र में जोधपुर की टुकड़ी का नेतृत्व भी किया और हाईफा शहर जाकर उसको आजाद करवाने का काम किया. मैं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से कांग्रेस सकार में लिख चुकी हूं कि इनको विस्तृत रूप से बोर्ड में पढ़ाया जाना चाहिए और एनसीईआरटी के पाठ्यक्रमों में भी शामिल करना चाहिए. इस बात पर उन्होंने विश्वास जताया थी कि इसपर काम करेंगे. जिसके चलते उन्होने इसको लेकर बोर्ड भी बनाया था.

पाठ्यक्रम में शामिल करना ही होगी असली श्रद्धांजलि मनीषा पंवार प्रधानमंत्री से आग्रह करते हुए कहती हैं कि बातों से काम नहीं चलता है. मेजर दलपत सिंह विश्व हीरो हैं. विश्व हीरो को तो पूरी दुनिया को जानना चाहिए. यहां अजमेर में आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनको श्रद्धांजलि दी है. मैं मानती हूं कि वास्तविक श्रद्धांजलि तभी होगी जब एनसीईआरटी में और राजस्थान बोर्ड के पाठ्यक्रम में उनकी वीरगाथा को शामिल किया जाए. अभी डबल इंजन की सरकार है तो मैं चाहती हूं कि इनकी वीरता की कहानी हर पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए.

जानें कौन है महान मेजर दलपत सिंहमेजर दलपत सिंह शेखावत, जिन्हें ‘हाइफा के नायक’ के रूप में जाना जाता है, भारतीय इतिहास के अद्वितीय वीरता के प्रतीक हैं. उनकी शहादत और साहस ने न केवल भारतीय सेना की वीरता को उजागर किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत के गौरव को बढ़ाया. मेजर दलपत सिंह को प्रथम विश्व युद्ध में इजराइल के हाइफा नगर को आजाद कराने का श्रेय जाता है. मेजर दलपत सिंह का जन्म 26 जनवरी 1892, राजस्थान के जोधपुर में हुआ था. वहीं पाली का देवली गांव उनका ददियाल है. रावणा राजपूत शेखावत परिवार से संबंधित माने जाते हैं.

कैवलरी ब्रिगेड के मेजर के रूप में किया था जोधपुर लांसरों का नेतृत्व मेजर दलपत सिंह शेखावत 1910 में ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए. 15वीं (इम्पीरियल सर्विस) कैवलरी ब्रिगेड के मेजर के रूप में जोधपुर लांसरों का नेतृत्व किया. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हाइफा की लड़ाई के दौरान उन्होंने 23 सितंबर 1918 को तुर्की और जर्मन सेना का सामना किया. जोधपुर लांसर्स सहित एक संयुक्त ब्रिटिश-भारतीय सेना ने ओटोमन सेना से हाइफा के महत्वपूर्ण बंदरगाह पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया लेकिन युद्ध के दौरान, दलपत सिंह शहीद हो गए.

क्यों इजरायल आज भी उनके आगे सिर झुकाता है?साल 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजरायल का खूबसूरत शहर ‘हाइफाट ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) के कब्जे में था. दुश्मन की सेना पहाड़ियों पर मशीनगनों, तोपों और आधुनिक हथियारों के साथ मोर्चा संभाले बैठी थी. वहीं दूसरी तरफ भारत की ‘जोधपुर लांसर्स’ और ‘मैसूर लांसर्स’ की टुकड़ियां थीं, जिनकी कमान मेजर दलपत सिंह के हाथों में था. सैन्य रणनीति के हिसाब से घोड़ों पर सवार होकर मशीनगनों का मुकाबला करना आत्महत्या जैसा था. लेकिन मेजर दलपत सिंह के पास वो जज्बा था जो मौत को भी मात दे दे. 23 सितंबर 1918 की सुबह, दलपत सिंह ने अपने जांबाज घुड़सवारों के साथ पहाड़ियों पर सीधा हमला बोल दिया.

जब गोलियों की बौछार पर भारी पड़ी ‘राजपूती तलवार’जब दुश्मन ऊपर से गोलियों की बौछार कर रहा था, लेकिन मेजर दलपत सिंह अपनी घोड़ी पर सवार होकर बिजली की रफ्तार से आगे बढ़े. उनके हाथ में सिर्फ एक भाला और कमर में लटकी तलवार थी. उन्होंने दुश्मन की पोस्टों को तहस-नहस कर दिया और अपनी टुकड़ी के साथ हाइफा शहर के अंदर घुस गए. कहा जाता है कि उस दिन हाइफा की गलियों में भारतीय सैनिकों के शौर्य का ऐसा तांडव मचा कि दुश्मन सेना हथियार डालकर भागने लगी. मेजर दलपत सिंह ने अदम्य साहस दिखाते हुए हाइफा को आजाद करा लिया, लेकिन इस महान जीत की कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई. युद्ध के मैदान में वो वीरगति को प्राप्त हुए, पर मरते-मरते वह इजरायल को आजादी का तोहफा दे गए. जिसको आज भी इजराइल याद करता है.

इजराइल में आज भी बच्चे पढ़ते हैं हाइफा के हीरो की कहानी मेजर दलपत सिंह को इजरायल में ‘हीरो’ की तरह पूजा जाता है. वहां के स्कूलों में बच्चों को बताया जाता है कि कैसे दूर देश से आए एक भारतीय योद्धा ने उनकी जमीन को आजाद कराया था. पीएम मोदी ने संसद में इसी दोस्ती का जिक्र किया. उन्होंने याद दिलाया कि भारत और इजरायल का रिश्ता सिर्फ आज के व्यापार पर नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के खून से सींची गई उस मिट्टी पर टिका हुआ है.

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