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श्वास में छिपा है स्वस्थ जीवन का रहस्य, श्री श्री रवि शंकर ने बताया पूर्ण स्वास्थ्य का असली और वैज्ञानिक मतलब

हम सभी स्वस्थ रहना चाहते हैं. इसके लिए पौष्टिक भोजन करते हैं, एक्सरसाइज करते हैं और आवश्यक दवाइयां भी लेते हैं. लेकिन क्या केवल रोगमुक्त शरीर ही स्वस्थ होने का प्रमाण है? यदि शरीर स्वस्थ दिखाई दे, लेकिन मन तनाव से भरा हो, भावनाएं अस्थिर हों और भीतर बेचैनी बनी रहे, तो क्या उसे पूर्ण स्वास्थ्य कहा जा सकता है? भारतीय ऋषियों ने स्वास्थ्य की जो परिभाषा दी है, वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. उनके अनुसार स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति नहीं, बल्कि हमारे संपूर्ण अस्तित्व का संतुलन है. संस्कृत में ‘स्वास्थ्य’ शब्द का अर्थ है- स्व में स्थित होना. अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप में स्थापित होना. जब शरीर रोगमुक्त हो, श्वास सहज हो, मन तनाव से मुक्त हो, बुद्धि पूर्वाग्रहों से रहित हो, स्मृति नकारात्मक आग्रहों से मुक्त हो, अहंकार सीमित ‘मैं’ से ऊपर उठकर सबको अपना मानने लगे और आत्मा दुःख से मुक्त हो, तभी वास्तविक स्वास्थ्य की अनुभूति होती है.

मन और प्राण का संतुलन आवश्यकभारतीय ऋषियों ने बताया है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है. हमारा अस्तित्व पांच स्तरों में विकसित होता है. पहला है हमारा वातावरण, जो हमारे जीवन को निरंतर प्रभावित करता है. दूसरा है स्थूल शरीर. तीसरा है प्राण, अर्थात जीवन ऊर्जा. चौथा है मन, जिसमें विचार, भावनाएं और स्मृतियां रहती हैं. पांचवां है अंतर्ज्ञान का स्तर, जहां सहज ज्ञान और गहरी चेतना का अनुभव होता है. जब इन सभी स्तरों में संतुलन होता है, तभी व्यक्ति भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर स्वस्थ रहता है. आज चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार कर रहा है कि अनेक बीमारियों का संबंध केवल शरीर से नहीं, बल्कि मानसिक तनाव और भावनात्मक असंतुलन से भी है. भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले कहा था कि रोग पहले विचारों में जन्म लेता है, फिर ऊर्जा के स्तर पर परिवर्तन होता है और अंततः वह शरीर में बीमारी के रूप में प्रकट होता है. इसलिए केवल शरीर का उपचार पर्याप्त नहीं है; मन और प्राण का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है.

मन और श्वास एक-दूसरे के प्रतिबिंबपहली श्वास के साथ हमारा जन्म होता है और जीवन की अंतिम यात्रा अंतिम श्वास के साथ पूरी होती है. इन दोनों क्षणों के बीच हम लगातार श्वास लेते रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी उसके प्रति सजग होते हैं. जबकि श्वास ही शरीर और मन के बीच सबसे महत्वपूर्ण सेतु है. यदि आप अपने जीवन का थोड़ा-सा निरीक्षण करें, तो पाएंगे कि हर भावना के साथ श्वास की लय बदल जाती है. क्रोध आता है तो श्वास तेज और उथली हो जाती है. भय में श्वास रुक-रुककर चलती है. चिंता के समय उसकी गति बढ़ जाती है. इसके विपरीत, जब मन प्रसन्न, संतुष्ट और शांत होता है, तो श्वास स्वतः लंबी, गहरी और सहज हो जाती है. इसका अर्थ है कि मन और श्वास एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं. यदि मन को सीधे नियंत्रित करना कठिन लगे, तो श्वास के माध्यम से मन को संतुलित किया जा सकता है. सामान्यतः एक व्यक्ति एक मिनट में लगभग सोलह से सत्रह बार श्वास लेता है. तनाव, क्रोध या बेचैनी की स्थिति में यह संख्या पच्चीस तक पहुंच सकती है. वहीं गहरे ध्यान में यही संख्या दो या तीन प्रति मिनट रह जाती है. ध्यान जितना गहरा होगा, श्वास उतनी ही सूक्ष्म और शांत होती जाएगी. यही कारण है कि ध्यान के बाद व्यक्ति स्वयं को हल्का, ऊर्जावान और प्रसन्न अनुभव करता है.

आधुनिक जीवनशैली से श्वास प्रभावितदुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली ने हमारी स्वाभाविक श्वास को भी प्रभावित किया है. अधिकांश लोग अपने फेफड़ों की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं करते. हम उथली श्वास लेते हैं, जबकि शरीर की अधिकांश विषाक्त अशुद्धियाँ श्वास के माध्यम से बाहर निकलती हैं. गहरी और संतुलित श्वास शरीर को अधिक ऑक्सीजन ही नहीं देती, बल्कि प्राणशक्ति का भी संचार करती है. योग, प्राणायाम और ध्यान का वास्तविक उद्देश्य भी यही है. ये केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अभ्यास नहीं हैं, बल्कि शरीर, मन और प्राण को संतुलित करने की वैज्ञानिक विधियाँ हैं. नियमित प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया जैसे अभ्यास शरीर की प्रत्येक कोशिका को ऊर्जा प्रदान करते हैं, तनाव को कम करते हैं, प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ बनाते हैं और मन को गहरे विश्राम का अनुभव कराते हैं. यही कारण है कि आज विश्वभर में इन विषयों पर अनेक वैज्ञानिक अध्ययन किए जा रहे हैं और उनके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं. यदि आपने किसी नवजात शिशु को ध्यान से देखा हो, तो उसकी श्वास बिल्कुल स्वाभाविक होती है. श्वास भीतर जाती है तो पेट सहज रूप से बाहर आता है और बाहर निकलते समय भीतर चला जाता है. लेकिन जैसे-जैसे हम तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक दबाव से घिरते जाते हैं, हमारी श्वास का यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है. हम उल्टी और उथली श्वास लेने लगते हैं. यही असंतुलन धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों को प्रभावित करता है.

सेहत का मतलब सिर्फ अच्छा भोजन नहींस्वास्थ्य का अर्थ केवल अच्छा भोजन करना नहीं है. शरीर को ऊर्जा चार प्रमुख स्रोतों से मिलती है—संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, सही श्वास और ध्यान. यदि इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा की जाए, तो जीवन का संतुलन बिगड़ने लगता है. इसलिए प्रतिदिन कुछ समय योग, प्राणायाम और ध्यान के लिए अवश्य निकालें. यह समय खर्च नहीं, बल्कि जीवन में किया गया सबसे मूल्यवान निवेश है. साथ ही, वर्ष में कम-से-कम एक सप्ताह स्वयं को अवश्य दीजिए. जिस प्रकार हम अपनी गाड़ी की नियमित सर्विस करवाते हैं, उसी प्रकार शरीर और मन को भी विश्राम और पुनर्संतुलन की आवश्यकता होती है. उस समय प्रकृति के निकट रहें. सूर्योदय के साथ जागें. योग करें. आवश्यकता के अनुसार भोजन करें. कुछ समय मौन में रहें, कुछ समय भजन या संगीत में बिताएँ और कुछ समय केवल प्रकृति की सुंदरता का आनंद लें. प्रकृति के साथ यह पुनर्संपर्क हमारे भीतर नई ऊर्जा, नया उत्साह और नई चेतना का संचार करता है. और एक बात कभी मत भूलिए- जीवन में मुस्कुराइए. हर बात को इतना गंभीर मत बनाइए कि जीवन का आनंद ही समाप्त हो जाए. मुस्कान भी एक प्रकार का ध्यान है. प्रसन्न मन सबसे बड़ी औषधि है.

भीतर के प्रकाश को जगाना जरूरीअंततः यह समझना आवश्यक है कि प्रेम, करुणा, धैर्य, शांति और आनंद जैसे सभी सद्गुण हमारे भीतर पहले से ही मौजूद हैं. उन्हें बाहर से लाने की आवश्यकता नहीं है. केवल तनाव, अज्ञान और नकारात्मक अनुभवों की परतें उन्हें ढक देती हैं. योग, प्राणायाम, ध्यान और आत्मज्ञान उन आवरणों को हटाने की प्रक्रिया हैं. जैसे बादलों के हटते ही सूर्य स्वयं चमकने लगता है, वैसे ही जब मन का तनाव दूर होता है, तब भीतर का प्रकाश और स्वास्थ्य स्वतः प्रकट हो जाता है. इसलिए यदि जीवन में स्थायी स्वास्थ्य, ऊर्जा और प्रसन्नता चाहिए, तो केवल शरीर का नहीं, अपनी श्वास का भी ध्यान रखिए. क्योंकि श्वास बदलती है, तो मन बदलता है; मन बदलता है, तो जीवन बदल जाता है.

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