कमरे में जब तैरने लगे सौरव गांगुली के सूटकेस…सचिन तेंदुलकर ने सुनाया दोस्ती का अनूठा किस्सा, दादा को यारी पड़ी थी भारी

नई दिल्ली. जून की वह तपती दोपहरी इंदौर के अंडर-15 क्रिकेट कैंप की एक गहरी याद में तब्दील होने वाली थी. कमरे के भीतर भारतीय क्रिकेट का एक भविष्य सौरव गांगुली गहरी नींद में सो रहा था. बेखबर कि बाहर उसके कुछ साथी एक बड़ी खुराफात की योजना बना चुके हैं. अचानक, सचिन तेंदुलकर ने अपने साथी जतिन परांजपे और केदार गोडबोले के साथ मिलकर सौरव के कमरे के दरवाजे के नीचे से पानी की बाल्टियां उड़ेलनी शुरू कर दीं. जब सौरव की आंख खुली, तो नजारा हैरान करने वाला था. कमरे में चारों ओर पानी भर चुका था और उनके सूटकेस उस पानी में तैर रहे थे. सौरव को कुछ पल तो समझ ही नहीं आया कि यह कोई सपना है या हकीकत. बाद में जब उन्हें पता चला कि यह सचिन और उनके दोस्तों की शरारत थी, तो गुस्सा होने के बजाय पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा. सूटकेस वाली वह घटना सिर्फ एक बचकानी शरारत नहीं थी, बल्कि यह उस अटूट रिश्ते की बुनियाद थी, जिसने आगे चलकर भारतीय क्रिकेट के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया.
साढ़े तीन दशकों से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) और सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) की दोस्ती आज भी उतनी ही तरोताजा और गहरी है. इस लंबे सफर में सचिन ने सौरव को कई रूपों में देखा है. एक घुंघराले बालों वाला शर्मीला किशोर, मैदान पर आक्रामक बल्लेबाजी करने वाला ‘महाराजा’, भारतीय टीम का एक साहसी कप्तान और फिर बीसीसीआई का एक व्यस्त प्रशासक. लेकिन सचिन के लिए सौरव इन सभी औहदों से कहीं ऊपर एक सच्चे और बेहद करीबी दोस्त हैं. इंटरनेशनल क्रिकेट के मैदान को अलविदा कहने के बाद भी, जब भी ये दोनों दिग्गज मिलते हैं, तो उम्र और वक्त के सारे फासले मिट जाते हैं और वे फिर से इंदौर के उसी कैंप वाले शरारती लड़के बन जाते हैं. उनकी पहली मुलाकात कानपुर में आयोजित एक जूनियर टूर्नामेंट में हुई थी, लेकिन इंदौर में दिवंगत वासु परांजपे की देखरेख में लगे कैंप ने उन्हें एक-दूसरे को करीब से समझने का मौका दिया.
सचिन तेंदुलकर ने जब सुनाया गांगुली का किस्सा.
हंसी-मजाक तक सीमित नहीं रही सचिन-गांगुली की दोस्तीयह दोस्ती सिर्फ मैदान के बाहर के हंसी-मजाक तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने मैदान पर उतरकर विश्व क्रिकेट में तहलका मचाया। जब ये दोनों सलामी जोड़ीदार के रूप में क्रीज पर उतरते थे, तो विपक्षी गेंदबाजों के माथे पर पसीना आ जाता था. इस जोड़ी ने वनडे क्रिकेट में रिकॉर्ड 26 बार शतकीय साझेदारियां कीं, जिनमें से 21 बार उन्होंने पारी की शुरुआत करते हुए विरोधी टीमों के हौसले पस्त किए. सचिन तेंदुलकर ने एक बार बताया था कि जब वे दोनों मैदान पर होते थे, तो उनका एकमात्र लक्ष्य भारत को जीत दिलाना होता था. उस दौर में आज की तरह न तो मोबाइल फोन थे और न ही सोशल मीडिया. फिर भी 1991-92 के दौरों के बाद जब वे अलग होते थे, तो उनके दिलों की दूरी कभी नहीं बढ़ी. आपसी समझ और गहरे तालमेल ने उनकी दोस्ती को हर इम्तिहान में पास कराया.
जब सचिन तेंदुलकर ने कप्तानी छोड़ने का मन बना लिया थाभारतीय क्रिकेट में एक ऐसा मोड़ भी आया जब सचिन तेंदुलकर ने कप्तानी छोड़ने का मन बना लिया था. साल 1999 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सचिन ने सौरव के भीतर छिपे एक लीडर को पहचान लिया था. सचिन ने तब बताया कि उन्होंने खुद चयनकर्ताओं और बोर्ड के सामने सौरव गांगुली को टीम का उपकप्तान बनाने का ठोस सुझाव दिया था. सचिन को पूरा भरोसा था कि सौरव में भारतीय क्रिकेट को एक नई दिशा में ले जाने का माद्दा है. सौरव ने जब कमान संभाली, तब भारतीय क्रिकेट बदलाव के दौर से गुजर रहा था और मैच फिक्सिंग के काले साए से जूझ रहा था. ऐसे नाजुक वक्त में सौरव को ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत थी जो बेखौफ होकर खेल सकें. सौरव एक महान कप्तान साबित हुए क्योंकि उन्हें बखूबी पता था कि टीम में संतुलन कैसे बनाया जाता है. वह खिलाड़ियों को अपने हुनर का प्रदर्शन करने की पूरी आजादी देते थे, लेकिन साथ ही उन्हें उनकी जिम्मेदारियों का अहसास भी कराते थे.
सचिन के भरोसे को सौरव ने पूरी तरह सच साबित कियासचिन के उस भरोसे को सौरव ने पूरी तरह सच साबित किया. गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम को वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, जहीर खान, हरभजन सिंह और आशीष नेहरा जैसे मैच-विजेता खिलाड़ी मिले। ये सभी युवा खिलाड़ी बेहद प्रतिभाशाली थे, लेकिन इन्हें करियर के शुरुआती दौर में जिस सहारे और विश्वास की जरूरत थी, वह सौरव गांगुली ने दिल खोलकर दिया.सौरव ने इन युवाओं को खुलकर खेलने की आजादी दी, जिसके दम पर भारत ने विदेशों में मैच जीतना शुरू किया. सौरव ने भारतीय टीम को एक आक्रामक और जुझारू दल में बदल दिया, जिसने लॉर्ड्स की बालकनी में टी-शर्ट लहराने की हिम्मत दिखाई.
सौरव ने कप्तान बनने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखाआज जब सौरव गांगुली अपने जीवन के एक और पड़ाव पर हैं, सचिन तेंदुलकर पुरानी यादों को समेटते हुए गर्व से मुस्कुराते हैं. वे कहते हैं कि सौरव ने कप्तान बनने के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनकी उपलब्धियां आज पूरी दुनिया के सामने हैं. कानपुर के एक साधारण जूनियर टूर्नामेंट से शुरू हुआ यह सफर, इंदौर के कैंप की सूटकेस वाली पानी की शरारत से होता हुआ, क्रिकेट के सबसे ऐतिहासिक पन्नों में दर्ज हो चुका है. यह कहानी सिर्फ रनों और शतकों की नहीं है, बल्कि यह दो दोस्तों के अटूट विश्वास, कप्तानी के दौर में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और भारतीय क्रिकेट को शीर्ष पर ले जाने वाले उस जज्बे की है जो आज के युवाओं के लिए एक बेमिसाल मिसाल है.



