11 साल बाद पलटा पूरा केस, 82 गवाह भी नहीं दिला सके सजा, डांगावास हत्याकांड में सभी 40 आरोपी बरी

नागौर. राजस्थान के बहुचर्चित डांगावास दलित हत्याकांड में करीब 11 साल बाद बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है. नागौर जिले के मेड़ता स्थित विशेष एससी-एसटी कोर्ट ने इस मामले में सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ऐसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिनके आधार पर दोष सिद्ध किया जा सके. कोर्ट ने यह भी माना कि सुनवाई के दौरान पेश किए गए अधिकांश गवाह आरोपियों की पहचान नहीं कर पाए. ऐसे में संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया. यह मामला 14 मई 2015 को नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए खूनी संघर्ष से जुड़ा है, जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी.
मृतकों में पांच दलित शामिल थे और आरोप था कि तीन लोगों को ट्रैक्टर से कुचलकर मार दिया गया था. इस घटना ने पूरे राजस्थान को झकझोर दिया था. प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. अब विशेष अदालत के फैसले के बाद एक ओर आरोपियों के परिजनों में राहत है, वहीं पीड़ित परिवारों ने न्याय नहीं मिलने की बात कहते हुए फैसले पर सवाल उठाए हैं. दूसरी तरफ अभियोजन पक्ष ने राजस्थान हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है.
23 बीघा जमीन के विवाद से शुरू हुआ था खूनी संघर्ष
जांच के अनुसार डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद चल रहा था. आरोप था कि दलित परिवारों को जमीन से हटाने के लिए उन पर हमला किया गया. हिंसा के दौरान गोलीबारी, लाठी-डंडों और कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल हुआ. कई वाहनों में आग लगा दी गई और पूरे गांव में तनाव फैल गया. इस घटना में छह लोगों की जान चली गई थी.
82 गवाह पेश हुए, लेकिन आरोप साबित नहीं हो सके
सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत में 82 गवाह पेश किए, जबकि परिवादी पक्ष ने 8 अतिरिक्त गवाहों के बयान दर्ज कराए. अदालत ने पाया कि अधिकांश गवाह आरोपियों की स्पष्ट पहचान नहीं कर सके. कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य किसी भी आरोपी के खिलाफ अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. इसी आधार पर सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया गया.
बचाव पक्ष ने जांच पर उठाए सवाल
आरोपियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सीबीआई की जांच शुरू से ही सही दिशा में नहीं थी. उनका दावा है कि घटना की मूल वजह जमीन के नामांतरण से जुड़ा विवाद था, लेकिन जांच एजेंसी ने वास्तविक तथ्यों की अनदेखी करते हुए ऐसे लोगों को आरोपी बना दिया, जिनका घटना से कोई संबंध नहीं था. सरकारी पक्ष के अधिवक्ता महिपाल लोट्टियां ने कहा कि अदालत के विस्तृत फैसले का अध्ययन किया जाएगा. इसके बाद कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी. उन्होंने कहा कि आदेश की प्रति मिलने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी.
पीड़ित परिवारों में नाराजगी, कई सवाल बाकी
फैसले के बाद पीड़ित परिवारों ने गहरी निराशा जताई. उनका कहना है कि यदि सभी आरोपी बरी हो गए तो छह लोगों की हत्या किसने की. परिजनों का कहना है कि उन्हें अब भी न्याय मिलने का इंतजार है. फैसले के समय मेड़ता कोर्ट परिसर के बाहर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे. अदालत का निर्णय आने के बाद समर्थकों ने खुशी जताई, जबकि पीड़ित पक्ष ने इसे न्याय की अधूरी लड़ाई बताते हुए आगे कानूनी संघर्ष जारी रखने की बात कही.



