अंग्रेजों से लोहा लेने वाले आऊवा की कहानी, 10 सिर-54 हाथों वाली सुगाली माता बनीं शक्ति की पहचान, जानें इतिहास

पाली. 10 मस्तक, 54 हाथ और एक ऐसा आलौकिक तेज, जिससे 1857 की क्रांति में ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत भी थर-थर कांपने लगी थी,जी हाँ, एक ऐसी देवी, जिनका नाम सुनते ही अंग्रेजी सेना के पसीने छूट जाते थे. आज हम आपको लेकर चल रहे हैं राजस्थान के पाली जिले के ऐतिहासिक गांव आऊवा में, जहाँ विराजती हैं—माँ सुगाली. वही सुगाली माता, जिन्हें 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों की देवी कहा गया. मान्यता है कि जब भी ब्रिटिश सैनिक हमला करते, तो उन्हें रणभूमि में काली आंधी के बीच तलवारें चलाती वीरांगनाएँ नजर आती थीं. माँ का खौफ अंग्रेजों के दिलों में इस कदर बैठ गया था कि वे मूर्ति को खंडित तक कर अपने साथ ले गए थे. आखिर क्या है 54 हाथों वाली इस अनूठी प्रतिमा का रहस्य? कैसे ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने माँ के आशीर्वाद से जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन का सिर काटकर किले पर टांग दिया था? आइए, देखते हैं आऊवा के अदम्य शौर्य और माँ सुगाली की आलौकिक शक्ति की यह विशेष रिपोर्ट.
राजस्थान का मारवाड़ क्षेत्र न केवल अपनी संस्कृति, बल्कि अदम्य शौर्य, बलिदान और आध्यात्मिक शक्ति के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. पाली जिले से महज 50 किलोमीटर दूर स्थित आऊवा गाँव भक्ति और शक्ति का एक ऐसा ही अनोखा संगम स्थल है. यहाँ स्थित आऊवा राजघराने की कुलदेवी सुगाली माता का इतिहास सीधे तौर पर भारत के 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से जुड़ा हुआ है.
10 मस्तक और 54 हाथों वाली अलौकिक प्रतिमाकाले पत्थर से निर्मित सुगाली माता की यह प्राचीन प्रतिमा देश की इकलौती ऐसी प्रतिमा है, जिसके 10 मस्तक और 54 हाथ हैं. यह प्रतिमा पहले आऊवा के किले में स्थापित थी. आऊवा के महान क्रांतिकारी शासक ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत माँ सुगाली के परम भक्त थे.माँ सुगाली को एक अत्यंत शक्तिशाली, दयालु और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है. वे विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की संरक्षक के रूप में पूजी जाती हैं.
जब रणभूमि में अंग्रेजों के सामने खड़ी हो जाती थी दिव्य शक्ति1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय जहाँ कई राजे-रजवाड़े ब्रिटिश हुकूमत का साथ दे रहे थे, वहीं आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था.अंग्रेजों पर भारी पड़ी माँ की कृपा: मान्यता है कि जब भी ब्रिटिश सेना आऊवा पर आक्रमण करती, उन्हें रणभूमि में काली आंधी के साथ तलवारें चलाती औरतें दिखाई देती थीं.
पहले ही मिल जाती थी हमले की सूचनाआऊवा पर होने वाले किसी भी हमले की पूर्व सूचना ठाकुर कुशाल सिंह को देवी सुगाली की कृपा से पहले ही प्राप्त हो जाती थी.क्रांतिकारी युद्ध में उतरने से पहले माता का पूजन कर शंखनाद करते थे. इसी दिव्य शक्ति के बल पर आऊवा के वीरों ने जोधपुर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन का सिर काटकर आऊवा किले की प्राचीर पर टांग दिया था.
खौफजदा होकर अंग्रेजों ने खंडित की प्रतिमायुद्ध में लगातार मिल रही हार से ब्रिटिश सत्ता बुरी तरह तिलमिला उठी. जब उनके गुप्तचरों ने यह रहस्य उजागर किया कि आऊवा के सैनिकों की असली ताकत सुगाली माता का आशीर्वाद है, तो अंग्रेज सैनिकों ने आऊवा के किले पर हमला किया. अंग्रेजों ने भय और बौखलाहट में माता की पवित्र प्रतिमा पर गाय का रक्त चढ़ाकर उसे खंडित कर दिया और अपने साथ ले गए.
गर्दन का तिरछा होना और नई प्रतिमा की स्थापनास्वतंत्रता संग्राम के बाद आऊवा शासक के वंशज और डिंगल भाषा के विख्यात कवि ठाकुर नाहर सिंह ने पुनः सुगाली माता की प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करवाया. लेकिन पत्थर से निर्मित इस प्रतिमा की गर्दन अपने आप तिरछी हो गई, जो आज भी कौतूहल और अपार श्रद्धा का केंद्र है.
पैनोरमा में हूबहू प्रतिमा: वर्ष 2018 में आऊवा गाँव में ‘1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा’ का निर्माण कर ग्रामीणों को सौंपा गया. यहाँ सुगाली माता की 162 साल बाद हूबहू नई प्रतिमा स्थापित की गई.
एक साथ दो प्रतिमाओं का पूजन: वर्तमान में आऊवा के मुख्य मंदिर में दो प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनकी पूजा-अर्चना एक साथ की जाती है. माँ के दर्शन करने और मनोकामनाएँ माँगने के लिए दूर-दूर से और दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु यहाँ खिंचे चले आते हैं.
नवरात्रि में लगती है इस गांव में भीडआज की बात की जाए तो मुख्य मंदिर में दो प्रतिमाएं स्थापित है, जिनकी पूजा-अर्चना एक साथ की जाती है. सुगाली माता मंदिर अपनी पुरानी अवस्था में अपने इतिहास को समेटे खड़ी है. वहीं 162 साल बाद तत्कालीन बीजेपी सरकार ने 2018 में आऊवा गाँव मे 1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम पैनोरमा बना ग्रामीणों को सुपुर्द किया और पैनोरमा में सुगाली माता की हूबहू नई प्रतिमा बना स्थापित की गई. जिसको देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पर आते हैं. नवरात्रि के दिनों मे यहां पर आसपास के गांवों के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग माता के दर्शन करने के लिए पहुंचते है.



