Rajasthan

आधुनिकता की दौड़ में लुप्त होने के कगार पर, गिने-चुने कारीगरों के भरोसे टिकी सांसें

Last Updated:October 28, 2026, 06:52 IST

Jaipur Kalai Art History: जयपुर की सदियों पुरानी परंपरागत कलई कला आज आधुनिकता और स्टील-एल्युमिनियम बर्तनों के बढ़ते चलन के कारण लुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी है. तांबे और पीतल के बर्तनों पर रांगे की परत चढ़ाने वाले ‘कलईगर’ अब जयपुर के बाजारों में गिने-चुने ही बचे हैं. आयुर्वेद में स्वास्थ्यवर्धक मानी जाने वाली यह अनूठी कला आज अपनी अंतिम सांसें ले रही है. यदि समय रहते इस हस्तशिल्प और कारीगरों को उचित संरक्षण नहीं मिला, तो अगले दशक तक यह विरासत पूरी तरह समाप्त हो सकती है.

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जयपुर: जयपुर शहर जितना अपने किलों, महलों, हवेलियों और इमारतों के लिए मशहूर है, उतना ही अपनी बेहतरीन हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं के लिए दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान रखता है. चाहे मूर्तिकला हो, पेंटिंग कला हो या कोई अन्य कला, यह शहर आज भी अपनी स्थापत्य कला के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है. लेकिन इन कलाओं में कुछ ऐसी खास कलाएं हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं. ऐसी ही जयपुर की सदियों पुरानी परंपरागत कलाओं में से एक जयपुर की कलई कला है, जो आज भट्टी की तपिश में अपनी आखिरी सांसें गिन रही है. जब जयपुर शहर की बसावट हुई थी, तब देश के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न कलाओं में निपुण कारीगरों को यहां लाकर बसाया गया था. इन्हीं पारंपरिक कलाओं में तांबे और पीतल के बर्तनों पर कलई करने की कला भी शामिल है.

कभी जयपुर की गलियों में भट्टियों की तपिश और बर्तनों की खनक के बीच यह कला खूब फलती-फूलती थी, लेकिन आज आधुनिक दौर में स्टील, एल्युमिनियम और नॉन स्टिक बर्तनों के बढ़ते चलन ने कलई कला को लगभग समाप्त कर दिया है. साथ ही इस कला से जुड़े कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. भले ही जयपुर की वर्षों पुरानी कलई कला अब आधुनिक बर्तनों के चलन से पीछे छूट रही है, लेकिन आज भी जयपुर के चारदीवारी बाजार की सड़कों पर कारीगर कलई कला से बर्तनों को चमकाते हुए नज़र आ जाते हैं. खासतौर पर जयपुर के त्रिपोलिया बाजार और हवामहल बाजारों के आसपास आज भी कुछ कलई करने वाले कारीगर सड़कों पर बर्तनों को चमकाते हुए मिल जाते हैं, जिन्हें ‘कलईगर’ के नाम से पहचाना जाता है. ये कारीगर अपनी पुश्तैनी कला को जीवित रखे हुए हैं और सड़क किनारे जलती भट्टी के साथ तपते हुए तांबे-पीतल के बर्तन को चमकाते नज़र आते हैं.

कलई करने की पारंपरिक प्रक्रिया और इसके फायदेलोकल-18 से बात करते हुए कलई कला के कारीगर बताते हैं कि कलई की पारंपरिक प्रक्रिया में तांबे या पीतल के बर्तन की अंदरूनी सतह को अच्छी तरह साफ किया जाता है. इसके बाद उसे भट्टी में तेज आग पर तपाया जाता है. इसके बाद रांगे यानी टिन की पतली परत बर्तन की अंदरूनी सतह पर चढ़ाई जाती है और हल्का तेजाब डालकर उसकी अंदरूनी सतह की गंदगी को साफ किया जाता है. इसके बाद बर्तनों पर जमी तांबे और पीतल की सतह पर अम्लीय या खट्टी खाद्य सामग्री से बर्तनों में चमक आ जाती है. तांबे के बर्तनों में दही, नींबू और टमाटर जैसी खट्टी चीजों को रखने में यह कलई बहुत आसानी देती है. यह परत बर्तनों में भोजन और धातु के बीच एक सुरक्षात्मक अवरोध का काम करती है. कलई के कारीगरों का कहना है कि तांबे-पीतल के बर्तनों में कलई करने के बाद उसमें रखा भोजन स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक होता है, जिसका उल्लेख आयुर्वेद में भी मिलता है.

आधुनिक बर्तनों का चलन और विलुप्त होने का खतरायही वजह है कि सदियों से लोग तांबे और पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं और उनमें कलई कराने के बाद ही उनका उपयोग किया जाता रहा है. इसलिए जयपुर में वर्षों से कलई के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं. कारीगरों का कहना है कि दशकों पहले जयपुर में कलई कला के हजारों कारीगर हुआ करते थे, लेकिन आज केवल 10 से 12 कारीगर ही सड़कों पर दिखाई देते हैं. तांबे और पीतल के बर्तनों की जगह अब स्टील, एल्युमिनियम और नॉन स्टिक बर्तनों ने ले ली है, जिसके चलते नई पीढ़ी अब इस काम को बिल्कुल नहीं करना चाहती है. अब केवल गिने-चुने परिवार ही इस पारंपरिक काम को जीवंत रखे हुए हैं. यदि इसी तरह से हालात रहे, तो आने वाले 8 से 10 सालों में यह अनूठी कला पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगी और इसका जिक्र सिर्फ किताबों में ही मिलेगा.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…

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Jaipur,Jaipur,Rajasthan

First Published :

October 28, 2026, 06:52 IST

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