आधुनिक फर्नीचर के बीच नहीं भूला यह परिवार अपना पुश्तैनी हुनर, पाली में आज भी हाथों से बुने जाते हैं ‘माचे’

पाली। क्या आपको याद है वो बचपन की सर्द या गर्मियों की रातें, जब आंगन में बिछे देशी माचे पर बैठकर पूरे परिवार ने कहानियाँ सुनी थीं? बदलते वक्त के साथ आज भले ही हमारे घरों में मखमली और गद्देदार पलंग आ गए हों, लेकिन आज भी हमारे गांवों की असली पहचान वे पारंपरिक ‘देशी माचे’ ही हैं. पाली जिले के कई गांवों में आज भी कुछ हुनरमंद परिवार अपने हाथों की कला से इस पुरानी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं.
आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में जहाँ एक तरफ माचे बनाने वाले कारीगर अब हर घर में नहीं मिलते, वहीं दूसरी तरफ रीढ़ की हड्डी के लिए वरदान माने जाने वाले इन देशी माचों का क्रेज आज भी कम नहीं हुआ है. आखिर कैसे हाथों से बुने जाते हैं ये खास माचे? और आधुनिकता के बीच कौन बचा रहा है हमारी इस अनमोल विरासत को?
कैसे तैयार होता है पारंपरिक देशी माचा?एक मजबूत और टिकाऊ माचे को तैयार करना किसी कला से कम नहीं है. इसकी शुरुआत होती है मजबूत लकड़ी के चयन से, जिसमें आमतौर पर कीकर (बबूल), रोहिड़ा या नीम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है. कारीगर सबसे पहले लकड़ी के चार पायों (पायें) और दो लंबी तथा दो छोटी पटरियों को तराशकर एक ढांचा तैयार करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘खाट का चौखट’ कहा जाता है.
इन रस्सियों का होता है इस्तेमालइसके बाद शुरू होती है इसकी बुनाई का मुख्य चरण. पहले के समय में सूत या मूंज (घास) का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब रंग-बिरंगी नायलॉन की रस्सियों (बाट) या सूती पट्टियों का उपयोग किया जाता है. कारीगर अपने हाथों की उंगलियों के जादू से एक निश्चित लय और मजबूती के साथ रस्सी को चौखट पर कसते चले जाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में घंटों की कड़ी मेहनत और शारीरिक श्रम लगता है, तब जाकर एक सुंदर, कलात्मक और कसकर बुना हुआ माचा तैयार होता है.
स्वास्थ्य के लिहाज से क्यों वरदान है देशी माचा?आज के आधुनिक स्पंज और फोम के गद्दों पर लंबे समय तक सोने से रीढ़ की हड्डी (Spine) और कमर दर्द की शिकायत आम हो चुकी है, जबकि पारंपरिक माचे का कंसेप्ट वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है.
पीठ को मिलता है सही सपोर्ट: माचे की बुनाई लचीली और हवादार होती है, जिससे शरीर का वजन समान रूप से बंटता है. यह पीठ और रीढ़ की हड्डी को एकदम सीधा और प्राकृतिक सपोर्ट देता है.
हवा का संचार (Ventilation): गर्मियों के दिनों में फोम के गद्दे पसीना और गर्मी पैदा करते हैं, जबकि माचे पर सोने से नीचे से हवा पास होती रहती है, जिससे शरीर ठंडा और तरोताजा रहता है.
दवा और डॉक्टरों से दूर: बुजुर्गों का मानना है कि पारंपरिक माचे पर सोने से उठने-बैठने की कसरत प्राकृतिक रूप से होती रहती है, जिससे जोड़ मजबूत रहते हैं.
ढाबों से लेकर फाइव-स्टार होटलों तक बढ़ रहा है ‘माचा कल्चर’यह बेहद दिलचस्प है कि एक तरफ जहां लोग अपने घरों में मॉड्यूलर फर्नीचर अपना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आधुनिकता के इस दौर में ‘माचा कल्चर’ एक नए और स्टाइलिश ट्रेंड के रूप में लौट रहा है. आज हाईवे के बड़े-बड़े ढाबों, लग्जरी रिसॉर्ट्स और हेरिटेज होटलों में आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक विशेष रूप से इन देशी माचों पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेना और पारंपरिक भोजन का आनंद उठाना पसंद करते हैं. ग्रामीण परिवेश का अहसास कराने के लिए फाइव-स्टार होटल भी अपनी आउटडोर सिटिंग में इन रंग-बिरंगे माचों को गर्व से जगह दे रहे हैं.
विलुप्त होती कला और आजीविका की चुनौतीहालांकि, इस कला के सामने आज अस्तित्व का संकट भी खड़ा हो गया है. मशीन से बनी आधुनिक चीजों के बाजार में आने से पाली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में अब गिने-चुने परिवार ही इस काम से जुड़े हैं. नई पीढ़ी इस पुश्तैनी हुनर से दूर होती जा रही है, क्योंकि इसमें मेहनत के मुकाबले उतनी आमदनी नहीं बची है. इसके बावजूद, पाली के इन समर्पित कारीगरों की बदौलत आज भी माचे की खनक गांवों से लेकर शहरों और होटलों तक गूंज रही है. जरूरत इस बात की है कि हम अपनी इस समृद्ध लोक-संस्कृति और हुनरमंद हाथों को सरंक्षण दें, ताकि मशीनों के शोर में हमारे पुरखों की यह सुंदर विरासत कहीं खो न जाए.



