करौली में बीजेपी आज तक नहीं बना पाई अपना जिला प्रमुख, क्या कांग्रेस इस बार भी फतह करेगी किला?

करौली. पंचायत चुनावों को लेकर करौली जिले में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. जिला प्रमुख की कुर्सी पर कब्जे को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने अपनी-अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है. करौली जिले में भाजपा अब तक जिला प्रमुख की कुर्सी पर अपना खाता नहीं खोल पाई है. वर्ष 1999 में जिला परिषद के गठन के बाद से ही इस पद पर कांग्रेस का दबदबा रहा है. ऐसे में इस बार सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपना पुराना सियासी वर्चस्व बरकरार रख पाएगी या भाजपा पहली बार जिला प्रमुख की कुर्सी पर कब्जा जमाकर इतिहास रचेगी?
35 वार्डों वाली करौली जिला परिषद के लिए जिले के 960763 मतदाता वोट डालेंगे. इनमें 515164 पुरुष और 445566 महिला मतदाता शामिल हैं. परिसीमन के कारण वार्डों की संख्या बढ़ जाने से राजनीतिक दलों को इस बार ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी. इसके कारण जिला परिषद ही नहीं बल्कि पंचायत समितियों में भी मुकाबला रोचक रहने की उम्मीद है. परिसीमन के बाद करौली जिला परिषद में वार्डों की संख्या 27 से बढ़कर 35 हो गई है. वहीं जिला परिषद क्षेत्र में पंचायत समितियों की संख्या भी आठ से बढ़कर 11 हो गई है.
दोनों पार्टियों के सामने उम्मीदवार चयन के ज्यादा विकल्प हैंकरौली में इस बार जिला प्रमुख का पद सामान्य है. ऐसे में पात्रता के नियमों के तहत कोई भी वर्ग का उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है. आरक्षण की बंदिश नहीं होने से दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने उम्मीदवार चयन के ज्यादा विकल्प हैं. वहीं परिसीमन के बाद जिला परिषद के वार्डों और पंचायत समितियों की संख्या बढ़ने से चुनावी मुकाबला भी पहले से अधिक बड़ा हो गया है. दोनों दलों के सामने जिला परिषद के साथ पंचायत समितियों में भी अधिक से अधिक सीटें जीतने की चुनौती होगी.
1999 से कांग्रेस के कब्जे में है जिला प्रमुख की कुर्सीकरौली कोई बहुत पुराना जिला नहीं है. इसे बने हुए करीब तीन दशक ही हुए हैं. करौली जिले का गठन 19 जुलाई 1997 को हुआ था. इससे पहले करौली सवाई माधोपुर जिले का हिस्सा था. जिला गठन के बाद यहां जिला परिषद का गठन हुआ और वर्ष 1999 में कांग्रेस के शिवदयाल मीणा जिले के पहले जिला प्रमुख बने. इसके बाद वर्ष 2000 में कांग्रेस की नर्वदा देवी जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं. नर्वदा देवी पूर्व जिला प्रमुख शिवदयाल मीणा की पत्नी थीं.
बीजेपी के सामने चुनौती कांग्रेस के इस लंबे सियासी वर्चस्व को तोड़ने की है
इसके बाद वर्ष 2005 में कांग्रेस के भरोसीलाल जाटव, वर्ष 2010 में सीताराम जांगिड़ और वर्ष 2015 में अभय कुमार मीणा जिला प्रमुख बने. वर्ष 2021 में कांग्रेस की शिमला देवी निर्विरोध जिला प्रमुख निर्वाचित हुईं. इस तरह जिला परिषद के गठन के बाद से अब तक जिला प्रमुख की कुर्सी कांग्रेस के पास ही रही है. भाजपा के सामने इस बार सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के इस लंबे सियासी वर्चस्व को तोड़ने की है.
रमेश मीणा की इस बार भी रहेगी अहम भूमिकाकरौली जिला परिषद की राजनीति में कांग्रेस के पूर्व मंत्री रमेश मीणा का प्रभाव अहम माना जाता रहा है. साल 2010 में जिला प्रमुख बने सीताराम जांगिड़ को रमेश मीणा का करीबी माना जाता है. इसके बाद वर्ष 2015 में रमेश मीणा के छोटे भाई अभय कुमार मीणा जिला प्रमुख बने. वहीं वर्ष 2021 में उनकी करीबी मानी जाने वाली शिमला बैरवा जिला प्रमुख निर्विरोध निर्वाचित हुईं. ऐसे में इस बार भी जिला प्रमुख की कुर्सी को लेकर रमेश मीणा की राजनीतिक रणनीति और प्रभाव पर भी सबकी निगाहें रहेंगी. दूसरी ओर भाजपा इस बार जिला परिषद में अपना बोर्ड बनाने के लिए पूरा जोर लगाने की तैयारी में है.
नगर निकाय चुनाव के नतीजों से बढ़ा मुकाबले का रोमांचहाल ही में संपन्न नगर निकाय चुनावों के नतीजे भी पंचायत चुनाव के सियासी समीकरणों के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं. करौली जिले में करौली और मंडरायल निकाय में कांग्रेस के बोर्ड बने हैं. सपोटरा, सूरौठ और हिंडौन में भाजपा ने जीत दर्ज कर बोर्ड बनाया. टोडाभीम में निर्दलीय प्रत्याशी नगर पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुईं हैं. जिले में करौली और हिंडौन दो नगर परिषदें हैं. परिसीमन के बाद मंडरायल, सपोटरा, सूरौठ और टोडाभीम नगर पालिकाएं बनी हैं.
कांग्रेस और बीजेपी दोनों कर रही है जीत के दावेनिकाय चुनावों में दोनों प्रमुख दलों को अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता मिली है. भाजपा जिलाध्यक्ष गोवर्धन सिंह को उम्मीद है कि पार्टी पंचायत चुनाव में भी नगर निकाय चुनाव जैसा प्रदर्शन दोहराएगी और जिला परिषद में अपना बोर्ड बनाएगी. वहीं कांग्रेस जिलाध्यक्ष घनश्याम महर ने जिला प्रमुख की सीट पर कांग्रेस की जीत का दावा करते हुए पार्टी के पुराने सियासी दबदबे के बरकरार रहने का भरोसा जताया है.
इन दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा रहेगी दांव परकरौली जिला परिषद का चुनाव कांग्रेस और भाजपा के कई प्रमुख नेताओं के लिए प्रतिष्ठा का सवाल माना जा रहा है. कांग्रेस के पूर्व मंत्री रमेश मीणा, कांग्रेस जिलाध्यक्ष एवं टोडाभीम विधायक घनश्याम महर, करौली विधायक दर्शन सिंह गुर्जर और सपोटरा विधायक हंसराज मीणा की राजनीतिक रणनीति भी इस चुनाव में अहम रहेगी. कांग्रेस जहां जिला प्रमुख की कुर्सी पर अपने पुराने कब्जे को बरकरार रखने की कोशिश करेगी. वहीं भाजपा पहली बार जिला परिषद में अपना बोर्ड बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में जुटी है.



