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बीकानेर की मूंग-मोठ अब अफ्रीका में उगाने की तैयारी? SKRAU पहुंचा 6 देशों का अंतरराष्ट्रीय दल

Last Updated:September 16, 2026, 10:04 IST

Bikaner Agriculture News: बीकानेर के थार रेगिस्तान में कम पानी में पैदा होने वाली मूंग-मोठ अब अफ्रीकी देशों की खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार बन सकती हैं. अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में इन फसलों की संभावनाएं तलाशने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल एसकेआरएयू बीकानेर शहर पहुंचा है. किर्कहाउस ट्रस्ट और एसकेआरएयू के बीच एमओयू के तहत विदेशी दल ने कृषि अनुसंधान व मारामा बीन प्रोजेक्ट का पूरा जायजा लिया. दल ने माना कि मूंग-मोठ का जर्मप्लाज्म जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे अफ्रीका की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है.

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थार की मूंग-मोठ पर अफ्रीका की नजर, SKRAU पहुंचा अंतरराष्ट्रीय दलZoomBikaner Moong Moth in Africa: थार की मूंग-मोठ पर अफ्रीका की नजर, SKRAU पहुंचा अंतरराष्ट्रीय दल

बीकानेर: बीकानेर के थार रेगिस्तान की विषम जलवायु और बेहद कम पानी में पैदा होने वाली मूंग और मोठ की फसलें अब वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने जा रही हैं. ये फसलें अब अफ्रीकी देशों की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने का एक बड़ा और अहम माध्यम बन सकती हैं. अफ्रीका के शुष्क और रेगिस्तानी क्षेत्रों में इन दलहनी फसलों के भारी उत्पादन की संभावनाएं तलाशने के लिए दुनिया के विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों का एक विशेष अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल बीकानेर के स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (एसकेआरएयू) पहुंचा. यूनाइटेड किंगडम (यूके) के प्रतिष्ठित किर्कहाउस ट्रस्ट और एसकेआरएयू के बीच हाल ही में हुए एक एमओयू के तहत यह विदेशी प्रतिनिधिमंडल राजस्थान के दो दिवसीय महत्वपूर्ण दौरे पर आया है.

विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एनके शर्मा ने इस विदेशी प्रतिनिधिमंडल को मूंग, मोठ सहित दूसरी दलहनी फसलों और कृषि अनुसंधान से जुड़ी तमाम नवीन गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी. इस खास बैठक के दौरान बीकानेर की बेहद शुष्क जलवायु में विकसित एवं संरक्षित की गई दलहनी फसलों के जर्मप्लाज्म के माध्यम से अफ्रीकी देशों में कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा की नई संभावनाओं पर गहन चर्चा की गई. किर्कहाउस ट्रस्ट के एसटीओएल कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. पीएन माथुर ने बताया कि अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में वर्तमान में बहुत ही सीमित दलहनी फसलों की खेती की जाती है, जिनमें चवला वहां की एक प्रमुख फसल है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण वहां के किसानों को लगातार नई और गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे कठिन समय में मूंग और मोठ बीन के जर्मप्लाज्म का आदान-प्रदान न केवल अफ्रीका की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि वहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नई दिशा प्रदान कर सकता है.

कृषि अनुसंधान और मरुस्थलीय खेती का किया गया अवलोकन

प्रतिनिधिमंडल को विश्वविद्यालय के विस्तृत कार्यक्षेत्र, मरुस्थलीय कृषि के उन्नत तरीकों और अलग-अलग फसलों पर चल रही आधुनिक शोध गतिविधियों से भी गहराई से अवगत कराया गया. कृषि वैज्ञानिकों ने बीकानेर तथा अफ्रीकी देशों की शुष्क जलवायु और कृषि परिस्थितियों में मौजूद काफी समानताओं को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया. यह माना जा रहा है कि जो फसलें बीकानेर के धोरो में पनप सकती हैं, वे अफ्रीका के रेगिस्तान में भी शानदार परिणाम दे सकती हैं.

बीकानेरी भुजिया और दाल प्रसंस्करण से समझा आर्थिक महत्व

इस खास दौरे पर प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान स्थानीय व्यवसायी आशीष अग्रवाल ने कहा कि बीकानेरी भुजिया ने बीकानेर को पूरे विश्व में एक अलग और खास पहचान दिलाई है. मूंग और मोठ के प्रसंस्करण से क्षेत्र में रोजगार के अनगिनत अवसर बढ़ने के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को भी भारी प्रोत्साहन मिला है. उन्होंने यह उम्मीद जताई कि अफ्रीका की मारामा बीन पर किया जा रहा वर्तमान अनुसंधान भविष्य में दोनों देशों के किसानों और उद्यमियों के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होगा. एक अन्य उद्यमी दीपक अग्रवाल ने भी कहा कि दाल आधारित प्रसंस्करण उद्योग आम लोगों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराने में बहुत ही प्रभावी और बड़ी भूमिका निभाता है. बीकानेर में इस औद्योगिक क्षेत्र ने स्थानीय स्तर पर हजारों रोजगार उपलब्ध करवाने और युवाओं का पलायन रोकने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

मारामा बीन अनुसंधान की जानी प्रगति और भविष्य की योजनाएं

इस अंतरराष्ट्रीय दल को कृषि अनुसंधान केंद्र, बीकानेर में विशेष रूप से संचालित किए जा रहे ‘मारामा बीन अनुसंधान’ की अब तक की प्रगति की विस्तार से जानकारी भी दी गई. विदेशी प्रतिनिधियों ने अफ्रीका से प्राप्त किए गए मारामा बीन के जर्मप्लाज्म और उसके बीज उत्पादन कार्यक्रम का मौके पर जाकर जायजा लिया. एसटीओएल कार्यक्रम के तहत दलहनी फसलों के अनुसंधान, जर्मप्लाज्म आदान-प्रदान तथा इससे भविष्य में किसानों को मिलने वाले संभावित आर्थिक और कृषि लाभों पर चर्चा हुई. गौरतलब है कि किर्कहाउस ट्रस्ट ने एसकेआरएयू को मारामा बीन पर विस्तृत अनुसंधान के लिए एक तीन वर्षीय बड़ी परियोजना भी स्वीकृत की है. इस महत्वपूर्ण शोध के माध्यम से मारामा बीन को बीकानेर की स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने और इसके व्यापक व्यावसायिक उपयोग की अनंत संभावनाओं का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है. इस प्रतिनिधिमंडल में यूनाइटेड किंगडम, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका, नामीबिया, स्विट्जरलैंड और मेडागास्कर सहित विश्व के विभिन्न देशों के जाने-माने वैज्ञानिक एवं शोधार्थी विद्यार्थी शामिल रहे. अंत में किर्कहाउस ट्रस्ट की सीईओ डॉ. क्लोडिया कैनल होलजैइस ने इस ज्ञानवर्धक भ्रमण के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का हृदय से आभार जताया.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…

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First Published :

September 16, 2026, 10:04 IST

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