रक्षाबंधन पर जीण माता भेजती हैं भाई हर्षनाथ भैरव को राखी, 14 किमी का सफर तय कर निभता है अनोखा रिश्ता

Last Updated:August 28, 2026, 19:35 IST
सीकर की अरावली पहाड़ियों में रक्षाबंधन पर भाई-बहन के रिश्ते की अनोखी परंपरा निभाई जाती है. सिद्धपीठ जीण माता मंदिर से बहन के रूप में पूजी जाने वाली जीण माता की राखी 14 किलोमीटर दूर हर्ष पर्वत स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचाई जाती है, जहां भैरव देवता की कलाई पर यह राखी बांधी जाती है. लोकमान्यता के अनुसार जीण माता और हर्षनाथ भैरव भाई-बहन हैं.
सीकर. रक्षाबंधन के पर्व पर सिद्ध पीठ जीण माता मंदिर और हर्ष मंदिर में एक अनोखी परम्परा निभाई जाती है. इस दिन जब हर घर में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, तब अरावली पहाड़ियों पर स्थित इन दोनों मंदिरों में भी भाई और बहन के राखी की यह परम्परा अनूठी तरह से निभाई जाती है. यहां बहन के रूप में पूजी जाने वाली जीण माता अपने भाई हर्षनाथ भैरव को राखी भेजती हैं. जीण माता मंदिर से विशेष राखी लेकर पुजारी करीब 14 किलोमीटर दूर हर्ष पर्वत की चोटी पर स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचते हैं और भैरव देवता की कलाई पर राखी बांधते हैं.
रक्षाबंधन के दिन यह परम्परा जीण माता मंदिर में सुबह से ही धार्मिक आयोजन शुरू हो जाते हैं. माता का विशेष श्रृंगार और पूजा-अर्चना करने के बाद पुजारी अपने हाथों से तैयार की गई कई फिट लम्बी राखी को गर्भगृह में माता के चरणों में रखते हैं. कुछ समय बाद इसी राखी को विधि-विधान के साथ वहां से रवाना किया जाता है. गाजे-बाजे और माता के जयकारों के बीच पुजारी राखी लेकर हर्ष पर्वत की ओर निकलते हैं. पहाड़ी रास्ते से करीब 14 किलोमीटर का सफर तय कर यह राखी हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचती है.
भैरव की कलाई पर बंधती है बहन की राखी
हर्ष पर्वत स्थित हर्षनाथ भैरव मंदिर पहुंचने के बाद वहां के पुजारी विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद जीण माता की ओर से भेजी गई राखी हर्षनाथ भैरव को भेट की जाती है. इसके बाद आरती की जाती है. इस दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में भाई और बहन सहित श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. मान्यता है कि जीण माता और हर्षनाथ भैरव के दर्शन साथ करने से भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम बना रहता है और मनमुटाव दूर होते हैं.
एक लोककथा, जिसने रिश्ते को बनाया आस्था का प्रतीक
जीण माता और हर्षनाथ भैरव के भाई-बहन होने के पीछे एक प्रचलित लोककथा भी जुड़ी है. लोकमान्यता के अनुसार जीण माता और हर्ष भैरव चूरू जिले के घांघू गांव का रहने वाले थे. बचपन में माता-पिता के निधन के बाद बड़े भाई हर्ष ने बहन जीण की देखभाल की. समय बीता और हर्ष का विवाह हो गया. बताया जाता है कि भाई-बहन के गहरे प्रेम को लेकर हर्ष की पत्नी नाराज रहती थीं. एक दिन विवाद के बाद जीण घर छोड़कर सीकर की पहाड़ियों में चली गईं और तपस्या करने लगीं. भाई हर्ष भी उनके पीछे पहाड़ों तक पहुंच गए.
तपस्या के बाद देवी और भैरव बने भाई-बहन
लोककथा के अनुसार, वर्षों की तपस्या के बाद माता दुर्गा ने जीण को दर्शन देकर देवी होने का वरदान दिया, जबकि भगवान शिव ने हर्ष को भैरव बनने का आशीर्वाद दिया. इसके बाद जीण माता और हर्षनाथ भैरव की पूजा शुरू हुई. इसी मान्यता ने दोनों मंदिरों को भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जोड़ दिया. आज भी रक्षाबंधन पर इस रिश्ते को निभाने के लिए विशेष रूप से राखी भेजी जाती है.
औरंगज़ेब को सिखाया था सबक
मंदिर से जुड़ी एक ऐतिहासिक कथा के अनुसार, मुगल शासक औरंगज़ेब ने हर्षनाथ पर स्थित एक हजार साल पुराने शिव मंदिर सहित यहां बने सभी मंदिर को तहस नहस कर दिया था. इस मंदिर को तोड़ने के बाद जब जीण माता मंदिर पर हमला किया, तो माता ने मधुमक्खियों की सेना भेजकर अपने मंदिर की रक्षा की और औरंगज़ेब को सबक सिखाया. इस चमत्कार से औरंगज़ेब की सेना भाग खड़ी हुई थी. आज भी स्थानीय लोग मानते हैं कि मंदिर की सुरक्षा उन्हीं दिव्य मधुमक्खियों के हाथ में है.j
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Sikar,Rajasthan
First Published :
August 28, 2026, 19:35 IST



