रहस्यमयी प्रतिमा और 5 नागों का मुकुट, पाली के ‘बल्लालेश्वर गणपति’ का पौराणिक इतिहास जानकर रह जाएंगे हैरान

पाली. गणपति बप्पा मोरया,दोस्तों, देशभर में भगवान गणेश के यूं तो कई प्रसिद्ध धाम हैं, लेकिन राजस्थान के पाली शहर में एक ऐसा प्राचीन और सिद्ध पीठ मौजूद है, जिसका नाता सीधे पौराणिक काल और एक सच्चे भक्त की अटूट तपस्या से जुड़ा है. हम बात कर रहे हैं पाली शहर में रेलवे स्टेशन मार्ग पर, लोर्डिया तालाब के पास नागा बाबा बगेची में स्थित बल्लालेश्वर गणपति मंदिर की. मान्यता है कि यहां भगवान गणेश अपने परम भक्त ‘बल्लाल’ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं प्रकट हुए थे.
यही वजह है कि इस पावन धाम का नाम उनके भक्त के नाम पर ही ‘बल्लालेश्वर’ पड़ा. इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है, जिसका जिक्र पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में जब पाली से होकर सिंध प्रांत का मार्ग गुजरता था, तब से यह मंदिर यात्रियों और श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है. इस मंदिर की सबसे खास बात है यहां विराजमान भगवान गणेश की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा,लाल सिंदूर से सुशोभित इस प्रतिमा की कमर पर जहां नाग लिपटा हुआ है.
श्रद्धालुओं की आस्था का बना हुआ केन्द्र14 सितंबर को आने वाले गणेश चतुर्थी के पावन पर्व से पहले पाली शहर का माहौल पूरी तरह से धर्ममय हो चुका है. रेलवे स्टेशन मार्ग पर स्थित लोर्डिया तालाब के पास, नागा बाबा की बगेची में बना बल्लालेश्वर गणपति मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है. मंदिर के महंत सुरेश गिरी महाराज ने इस प्राचीन सिद्ध पीठ के इतिहास और इसकी पौराणिक मान्यताओं के बारे में जानकारी साझा की है.
महंत सुरेश गिरी महाराज के अनुसार मंदिर का इतिहास और महत्वभक्त बल्लाल के नाम से प्रसिद्ध पीठ: महंत सुरेश गिरी महाराज ने बताया कि यह मंदिर भगवान गणेश की अति प्रसिद्ध सिद्ध पीठ है. यह मंदिर बप्पा के अनन्य भक्त बल्लालेश्वर के नाम से विख्यात है, जिन्होंने अपनी कठोर तपस्या और अगाध श्रद्धा से भगवान गणेश को प्रसन्न किया था.
भक्त के हाथों बनी प्राचीन प्रतिमा: महाराज जी के अनुसार, भक्त की परीक्षा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने स्वयं उन्हें दिव्य दर्शन दिए थे. मंदिर में विराजमान गणेश जी की यह अति प्राचीन प्रतिमा भक्त बल्लालेश्वर के स्वयं के हाथों से बनाई गई है, जो आज भी यहाँ साक्षात विराजमान है.
पुराणों में उल्लेख और सिंध प्रांत का मार्ग: महंत सुरेश गिरी महाराज ने बताया कि इस ऐतिहासिक मंदिर का वर्णन हमारे पौराणिक ग्रंथों तक में मिलता है. प्राचीन काल में जब श्रद्धालु और साधु-संत सिंध प्रांत की ओर यात्रा करते थे, तब वे पाली स्थित इस सिद्ध पीठ पर रुककर भगवान गणेश का आशीर्वाद लिया करते थे.
भगवान गणेश की प्रतिमा की खास विशेषताएंअद्भुत स्वरूप: मंदिर में विराजमान गणेश जी की प्रतिमा पर सिंदूर का विशेष लेप है.भगवान गणेश की कमर में नाग लिपटा हुआ है और उनके मस्तक पर पांच नागों का मुकुट सुशोभित है, जो इस प्रतिमा को देश के अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाता है. वर्ष 2017 में मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण किया गया था. निर्माण के दौरान प्राचीन मूल प्रतिमा को बिना हटाए ही नए मंदिर का निर्माण किया गया, जहाँ अब शिव परिवार और माँ अंबे की मूर्तियां भी स्थापित हैं.
14 सितम्बर को होंगे विशेष आयोजनइस मंदिर में में वैसे तो हर बुधवार मेले जैसा माहौल रहता है मगर जब 14 सितम्बर को गणेश चतुर्थी के बाद यहां पर प्रतिदिन लाखो की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते है. गणेश चतुथी्र पर यहां पर महिला सत्संग मंडल पाली द्वारा विशेष आयोजन भी किया जाएगा. इस महापर्व में प्रसाद एवं महाप्रसादी का भी आयोजन होगा. जिसमें बडी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे.



