राजस्थान में बारिश ने तरसाया, 693 में से सिर्फ 72 बांध ही पूरे भरे, 192 में पानी का टोटा

जयपुर. राजस्थान में मानसून ने इस बार निराश किया है. मानसून की बेरुखी के कारण प्रदेश के कई जिलों में बारिश औसत आंकड़े को भी नहीं छू पाई है. बारिश की कमी के कारण कई जिलों में फसल उत्पादन प्रभावित होगा. वहीं प्रदेश के बांध भी पानी की राह देख रहे हैं. बांधों में पर्याप्त पानी नहीं आने के कारण अगले साल सिंचाई और पीने के पानी का टोटा होना लगभग तय है. हालांकि अभी मानसून के करीब 15 दिन बाकी है. इस दौरान अगर बादल मेहरबान हो गए तो कुछ कमी पूर्ति हो सकती है लेकिन पूरी भरपाई नहीं होगी.
राजस्थान में मानसून अब आखिरी दौर में है. लेकिन बांधों में पानी की स्थिति इस बार चिंता बढ़ा रही है. बारिश के सीजन का बड़ा हिस्सा गुजर जाने के बाद भी प्रदेश के 693 बांध अपनी कुल भराव क्षमता के 59.43 फीसदी तक ही पहुंच पाए हैं. पिछले साल इसी समय तस्वीर काफी बेहतर थी. उस वक्त प्रदेश के बांध 87.21 फीसदी तक भर चुके थे. यानी इस साल बांधों में पिछले साल के मुकाबले करीब 28 फीसदी कम पानी है.
राजस्थान में बांधों में पिछले साल का पानी था इसलिए शुरुआत मजबूत थी
राजस्थान जैसे राज्य में यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है. मानसून खत्म होने के बाद यही पानी आने वाले महीनों में पीने, सिंचाई और दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल होना है. राजस्थान में बांधों में पिछले साल का पानी था इसलिए शुरुआत मजबूत थी. इस साल मानसून शुरू होने से पहले राजस्थान के बांधों में पिछले साल की अच्छी बारिश का फायदा मिला था. 15 जून से पहले ही बांधों में 44.46 फीसदी पानी मौजूद था. लेकिन 15 जून के बाद नई आवक करीब 15 फीसदी ही रही. यानी मानसून के दौरान जितनी उम्मीद थी उतना पानी बांधों तक नहीं पहुंच सका.
बड़ी संख्या में बांध अभी भी अपनी क्षमता से काफी नीचे हैंकहते हैं ‘बूंद-बूंद से घड़ा भरता है’ लेकिन इस बार परेशानी यही रही कि घड़ा भरने लायक बूंदें भी कई इलाकों में लगातार नहीं मिल पाई. 693 बांधों में 192 पूरी तरह खाली पड़े हैं. प्रदेश के बांधों की मौजूदा स्थिति सबसे ज्यादा चिंता पैदा करने वाली है. 693 बांधों में से 429 बांधों में पानी तो आया लेकिन वे पूरी क्षमता तक नहीं भर पाए. पूरे प्रदेश में सिर्फ 72 बांध ही अब तक पूरी तरह भर सके हैं. इसका मतलब साफ है कि प्रदेश के ज्यादातर बांधों में कुछ न कुछ पानी तो है, लेकिन बड़ी संख्या में बांध अभी भी अपनी क्षमता से काफी नीचे हैं.
सबसे कमजोर स्थिति जोधपुर संभाग की है
हालांकि सभी संभागों की तस्वीर एक जैसी नहीं है. कोटा संभाग में बांधों का जलभराव 74.33 फीसदी है. बांसवाड़ा संभाग में 60.79 फीसदी और जयपुर संभाग के बांधों में 59.81 फीसदी पानी आया है. भरतपुर संभाग में बांध 52.88 फीसदी तक भर पाए हैं. जबकि उदयपुर संभाग में यह आंकड़ा 44.96 फीसदी है. सबसे कमजोर स्थिति जोधपुर संभाग की है. यहां बांधों में सिर्फ 17.52 फीसदी पानी ही पहुंच पाया है. यानी कुछ इलाकों में बारिश ने राहत दी. लेकिन पश्चिमी राजस्थान के कई हिस्सों में पानी की कमी साफ दिखाई दे रही है.
बीसलपुर भी अभी पूरी क्षमता से दूर
जयपुर और आसपास के बड़े इलाके की पेयजल जरूरतों से जुड़े बीसलपुर बांध में भी इस बार पूरी क्षमता तक पानी नहीं पहुंचा है. बांध में उसकी क्षमता का 74.87 फीसदी पानी है. ईसरदा बांध में जलभराव 54.14 फीसदी है. वहीं जयपुर का रामगढ़ बांध इस मानसून में भी खाली रह गया. रामगढ़ की तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जयपुर में पानी के पुराने स्रोतों की बात होती है तो इसका नाम प्रमुखता से आता है. अब सवाल अगले साल का है. मानसून के अंतिम दौर में अगर अच्छी बारिश होती है तो बांधों की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है.
अगले साल सीमित जल भंडार के साथ आगे बढ़ना होगाअगर मानसून कमजोर ही रहा तो राजस्थान को अगले साल सीमित जल भंडार के साथ आगे बढ़ना होगा और यही सबसे बड़ी चिंता है. बांधों में कम पानी का असर सिर्फ बांध के आसपास के इलाके तक सीमित नहीं रहता. इसका सीधा असर सिंचाई, खेती, पेयजल व्यवस्था और भूजल पर भी पड़ सकता है. पानी को लेकर कहा जाता है ‘जल है तो कल है’ राजस्थान के लिए यह बात सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि जरूरत है.
मानसून की विदाई से पहले अब आखिरी उम्मीदइस समय प्रदेश के सामने दो तस्वीरें हैं. एक तरफ पिछले साल की अच्छी बारिश से मिला शुरुआती स्टोरेज है, जिसने इस साल कुछ राहत दी. दूसरी तरफ इस मानसून में अपेक्षाकृत कम नई आवक है जिसने चिंता बढ़ा दी है. अब मानसून के आखिरी दौर में नजर आसमान पर है. अच्छी बारिश होती है तो तस्वीर कुछ बदल सकती है. लेकिन अगर बारिश ने साथ नहीं दिया तो आने वाले महीनों में पानी की बचत और प्रबंधन दोनों बड़ी चुनौती होंगे. राजस्थान में पानी की कीमत किसी से छिपी नहीं है. यहां सदियों से पानी को सहेजकर रखने की परंपरा रही है. इस बार बांधों के आंकड़े जल संरक्षण कई पुरानी कहावतें याद दिला रहे हैं.



