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राजेश खन्ना-जया बच्चन का करियर चमकाने वाले डायरेक्टर, आम इंसान की कहानी को पर्दे पर उतारकर रचते थे इतिहास

Last Updated:August 27, 2026, 04:01 IST

27 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है. यह उस फिल्मकार को याद करने का दिन है, जिसने हिंदी सिनेमा को देखने और उसे पर्दे पर दिखाने का अपना अलग अंदाज बनाया. बात हो रही है मशहूर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री और उनके चाहने वाले प्यार से ‘ऋषि दा’ कहते थे. 27 अगस्त 2006 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन उनकी फिल्में आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही ताजा हैं.

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राजेश खन्ना-जया बच्चन का करियर चमकाने वाले डायरेक्टर, फ्लॉप से की थी शुरुआत Zoomऋषिकेश मुखर्जी ने करियर में कई हिट दी है.

नई दिल्ली. ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की सबसे खास बात यह थी कि उन्हें देखकर लगता था जैसे पर्दे पर कोई फिल्म नहीं, बल्कि हमारे अपने घर की कहानी चल रही है. उन्होंने बड़े-बड़े सेट, ग्लैमर या भारी-भरकम एक्शन के बजाय आम लोगों की जिंदगी और उनकी छोटी-छोटी खुशियों को अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया.

मध्यमवर्गीय परिवार, रिश्तों की उलझन, दोस्ती, प्यार, उम्मीद और जिंदगी के उतार-चढ़ाव जैसे विषय उनकी फिल्मों में बेहद सहज तरीके से नजर आते थे. यही वजह थी कि दर्शकों को उनके किरदार अपने जैसे लगते थे. उनकी कहानियों में आम आदमी की परेशानियां भी थीं और उन्हीं के बीच हंसने-मुस्कुराने की वजह भी.

फ्लॉप फिल्म से की करियर की शुरुआत

30 सितंबर 1922 को कोलकाता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री की पढ़ाई की थी. कुछ समय तक उन्होंने शिक्षक के तौर पर भी काम किया, लेकिन फिल्मों की दुनिया उन्हें ज्यादा अट्रेक्ट करती थी. उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एडिटर के तौर पर की. न्यू थिएटर्स में काम करने के बाद उन्हें मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय के साथ काम करने का मौका मिला. 1957 में ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म ‘मुसाफिर’ से बतौर निर्देशक अपनी शुरुआत की. हालांकि, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं कर पाई. इसके दो साल बाद 1959 में आई ‘अनाड़ी’ ने उन्हें पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से थे सम्मानित

ऋषिकेश मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा को ‘बावर्ची’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘चुपके-चुपके’ और ‘गोलमाल’ जैसी कई यादगार फिल्में दीं. ‘गोलमाल’ की कॉमेडी आज भी दर्शकों को खूब हंसाती है, वहीं ‘अभिमान’ जैसे सिनेमा में रिश्तों की नजाकत और भावनाओं को उन्होंने बेहद खूबसूरती से पेश किया. ‘आनंद’ जैसी फिल्म ने तो जिंदगी और मौत को लेकर दर्शकों को भावुक कर दिया. सिनेमा में उनके शानदार योगदान के लिए ऋषिकेश मुखर्जी को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया. चार दशक से ज्यादा लंबे अपने करियर में उन्होंने 42 फिल्मों का निर्देशन किया और हिंदी सिनेमा पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी, जिसे भुला पाना आसान नहीं है.

बता दें कि 27 अगस्त 2006 को ऋषिकेश मुखर्जी ने आखिरी सांस ली, लेकिन उनका सिनेमा आज भी हमारे बीच मौजूद है. ‘आनंद’ की भावुकता हो, ‘गोलमाल’ की शरारत, ‘चुपके-चुपके’ की मस्ती या ‘अभिमान’ में रिश्तों की कसक, ऋषि दा ने हर तरह की कहानी को अपने खास अंदाज में पर्दे पर उतारा. शायद यही वजह है कि उनके जाने के इतने साल बाद भी उनकी फिल्में देखी जाती हैं और हर पीढ़ी उन्हें अपने तरीके से महसूस करती है.

About the AuthorMunish KumarSenior sub editor

न्यूज 18 हिंदी में एंटरटेनमेंट सेक्शन में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार दिल्ली के रहने वाले हैं. डिजिटल मीडिया में उन्हें 10 साल का अनुभव है.राजधानी कॉलेज (DU) से पॉलिटिकल साइंस (ऑनर्स) की पढ…

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New Delhi,New Delhi,Delhi

First Published :

August 27, 2026, 04:01 IST

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