लाइट-मीटर की वजह से आउट हुए जयसूर्या, अंपायर ने बल्लेबाजों की अपील क्यों नहीं मानी, क्या है खराब रोशनी तय करने का पैमाना?

नई दिल्ली. दूसरे टेस्ट के पहले दिन जहां यशस्वी जायसवाल और असिथा के बीच टकराव चर्चा का विषय रहा वहीं दूसरे दिन मैच खत्म होने से पहले श्रीलंकाई खिलाड़ियों ने जिस तरह से खराब रोशनी को लेकर बवाल किया वो हर किसी को हैरान कर गया. कोलंबो का सिंहली स्पोर्ट्स क्लब मैदान एक बार फिर खराब रोशनी और लाइटमीटर विवाद का गवाह बना जहाँ भारत और श्रीलंका के बीच चल रहे दूसरे टेस्ट मैच के दौरान मैदान पर भारी ड्रामा देखने को मिला.
श्रीलंका के बल्लेबाजों ने कम रोशनी में बल्लेबाजी कराने पर अंपायरों के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया, लेकिन जब नाइटवॉचमैन के रूप में आए प्रभात जयसूर्या स्पिनर मानव सुथार की गेंद पर एलबीडब्ल्यू आउट हुए, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वह चिल्लाते व नाराजगी जताते हुए ड्रेसिंग रूम की तरफ लौटे. क्रिकेट के इस तनावपूर्ण माहौल के बीच आइए समझते हैं कि आखिर यह ‘लाइटमीटर’ क्या बला है, इसका काम क्या होता है और मैदान पर खेल जारी रखने के लिए कितनी लाइट होनी जरूरी है.
क्रिकेट में क्या है लाइटमीटर का काम?
लाइटमीटर एक छोटा, हाथ में पकड़ने वाला डिजिटल उपकरण होता है, जिसका उपयोग मैच रेफरी और ऑन-फील्ड अंपायर मैदान पर रोशनी की तीव्रता को मापने के लिए करते हैं. इसका मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि खेल के दौरान रोशनी का स्तर दोनों टीमों के लिए एक समान और सुरक्षित हो. जब भी अंपायरों को लगता है कि रोशनी कम हो रही है, वे लाइटमीटर से ‘लक्स’ या किसी तय यूनिट में रीडिंग ले लेते हैं. इस रीडिंग को एक बेंचमार्क मान लिया जाता है. यदि मैच में आगे रोशनी उस दर्ज की गई रीडिंग से नीचे जाती है, तो अंपायर खिलाड़ियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए खेल को तुरंत रोक देते हैं.
मैदान पर कितनी होनी चाहिए लाइट?
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के नियमों के अनुसार, लाइटमीटर की कोई एक वैश्विक या निश्चित संख्या तय नहीं है कि कितनी लाइट होनी ही चाहिए. इसके बजाय, यह पूरी तरह से मैच की परिस्थितियों और ऐतिहासिक बेंचमार्क पर निर्भर करता है. मैच के पहले दिन या जब पहली बार रोशनी खराब होती है और खिलाड़ी बल्लेबाजी करने में असमर्थता जताते हैं, तब अंपायर लाइटमीटर से जो रीडिंग लेते हैं, वही उस पूरे मैच के लिए ‘गाइडिंग लाइट’ बन जाती है. आमतौर पर लाल गेंद से खेले जाने वाले टेस्ट क्रिकेट में रोशनी का स्तर 1000 से 2000 लक्स के बीच रहने पर खेल को सुरक्षित माना जाता है. यदि रोशनी इससे कम होती है, तो लाल गेंद को देखना (खासकर तेज गेंदबाजों के खिलाफ) बल्लेबाजों और फील्डरों के लिए बेहद खतरनाक हो जाता है.
तेज गेंदबाज बनाम स्पिनर
यदि लाइटमीटर की रीडिंग खराब रोशनी की ओर इशारा करती है, तो अंपायर फील्डिंग कर रही टीम के कप्तान से कह सकते हैं कि वे तेज गेंदबाजों को हटाकर केवल स्पिन गेंदबाजों से ओवर करवाएं, क्योंकि स्पिनरों की गेंद से चोट लगने का खतरा कम होता है. कोलंबो टेस्ट में भी जब रोशनी कम थी, तब स्पिनर मानव सुथार गेंदबाजी कर रहे थे, जिसके खिलाफ श्रीलंका के बल्लेबाजों का तर्क था कि लाइट बल्लेबाजी के अनुकूल बिल्कुल नहीं थी.
कोलंबो में क्यों भड़के प्रभात जयसूर्या?
सिंहली स्पोर्ट्स क्लब (SSC) मैदान पर यह विवाद तब बढ़ा जब श्रीलंका के बल्लेबाजों ने अंपायरों से शिकायत की कि उन्हें गेंद देखने में परेशानी हो रही है. खेल को रोकने के बजाय अंपायरों ने खेल जारी रखा. इसी बीच नाइटवॉचमैन प्रभात जयसूर्या स्पिनर मानव सुथार के पहले ओवर की अंतिम गेंद पर चकमा खा गए और एलबीडब्ल्यू आउट हो गए. जयसूर्या का मानना था कि कम रोशनी के कारण वह गेंद की लाइन और लेंथ को सही से नहीं भांप पाए. आउट होने के बाद उनका यह गुस्सा अंपायरों के फैसले और खराब लाइट के खिलाफ था, जिसके कारण वह मैदान से ड्रेसिंग रूम जाते समय खुद पर काबू नहीं रख पाए और चिल्लाते हुए बाहर निकले. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या जायसवाल, असिथा के बाद अब लाइट के चक्कर में जयसूर्या की बत्ती गुल होने वाली है.



